UP Politics: 3 चुनाव में 0 सीट... BJP के लिए टेंशन बनीं ये 61 सीटें, अब RLD और राजभर का ही सहारा

UP Politics: यूपी चुनाव 2027 के लिए भाजपा ने उन 61 सीटों पर चक्रव्यूह तैयार किया है जहां पिछले 3 चुनावों से पार्टी को एक भी सीटें नहीं मिली हैं।

Update:2026-05-29 19:37 IST

UP Politics: पश्चिम बंगाल में शानदार प्रदर्शन के बाद भारतीय जनता पार्टी ने अब उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए अपनी कमर कस ली है। लगातार तीसरी बार सत्ता वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही भाजपा ने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करना शुरू कर दिया है। योगी आदित्यनाथ कैबिनेट का हालिया विस्तार इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

हालांकि, इस राह में एक सबसे बड़ी चुनौती उन 61 सीटों की है जो पिछले एक दशक से पार्टी के लिए अभेद्य किला बनी हुई हैं। साल 2012, 2017 और 2022 के लगातार तीन चुनावों में प्रचंड बहुमत हासिल करने के बावजूद भाजपा इन 61 सीटों पर जीत का स्वाद नहीं चख सकी है। यही कारण है कि अब पार्टी नेतृत्व का पूरा ध्यान इस शून्य वाले सियासी गणित को सुलझाने पर केंद्रित हो गया है। यूपी भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी ने नेताओं को साफ निर्देश दिए हैं कि चुनाव प्रचार के शुरुआती दौर में इन्हीं मुश्किल सीटों को सबसे ऊपर रखा जाए।

माइक्रो-प्लानिंग और बूथ स्तर की रणनीति हो रही तैयार

इस चक्रव्यूह को भेदने के लिए भाजपा ने एक बेहद माइक्रो लेवल की योजना तैयार की है। इसके तहत इन सभी 61 विधानसभा क्षेत्रों का विस्तृत चुनावी इतिहास के साथ वहां के सटीक जातीय समीकरण और बूथ-स्तर की बारीक जानकारियां जुटाई जा रही हैं। पार्टी का मकसद हर एक सीट की भौगोलिक और सामाजिक संरचना के हिसाब से एक अलग रोडमैप तैयार करना है जिससे 2027 के महामुकाबले से पहले जमीन पर अपनी स्थिति को पूरी तरह से पुख्ता किया जा सके। अगर इन चुनौतीपूर्ण सीटों देखा जाये तो इसमें से 22 सीटें पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़, मऊ, जौनपुर, गाजीपुर और मिर्जापुर जैसे जिलों में आती हैं।

दूसरी तरफ, वेस्ट यूपी के सहारनपुर, मुरादाबाद और बिजनौर जिलों की 13 सीटें भी इसी मुश्किल सूची में शामिल हैं। अगर केवल इन पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों की 35 सीटों का ही विश्लेषण करें तो 2022 में हुये चुनाव में समाजवादी पार्टी ने इनमें से 27 पर अपना परचम लहराया था। इन क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं की अच्छी खासी तादाद है जो भाजपा के लिए हमेशा से एक टेढ़ी खीर है। हालांकि, स्वार, रामपुर और कुंदरकी जैसी मुस्लिम बहुल सीटों पर हाल ही में संपन्न हुए उपचुनावों में मिली जीत से सत्ताधारी खेमे का हौसला काफी बुलंद हुआ है। पार्टी को लगने लगा है कि अब इन कठिन माने जाने वाले इलाकों में भी सेंधमारी की जा सकती है।

नए सहयोगियों से भाजपा को उम्मीद

इस बार राजनीतिक समीकरणों में आया बदलाव भी भाजपा की उम्मीदों को पंख लगा रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल ने समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन का असर यह हुआ था कि 2017 में 312 सीटें जीतने वाली भाजपा 2022 में 255 सीटों पर आ गई थी। उस दौरान राजभर की पार्टी ने इन्हीं चुनौतीपूर्ण सीटों में से तीन पर जीत भी दर्ज की थी। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। सुभासपा और आरएलडी दोनों ही दल वर्तमान में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का हिस्सा हैं और सरकार में शामिल हैं। इन दोनों क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ आने से भाजपा को पूरा भरोसा है कि जाट और मुस्लिम बहुल इलाकों में समाजवादी पार्टी का तिलिस्म आखिरकार टूट जाएगा। इसी सियासी गणित को साधने के लिए पार्टी ने समय रहते इन 61 सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा दिए हैं।

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