ज्योतिष प्रभाव से कल भी हम चांद के करीब थे आज भी है, जानिए क्या है चंद्रमा

ज्योतिष में सभी नौ ग्रहों में सबसे ज्यादा चलने वाला ग्रह है चंद्रमा, जो मन का कारक है। इस ग्रह का किसी  से कोई शत्रुता नहीं होती है। मतलब यह चंद्रमा का मित्र ग्रह  वैसे तो सूर्य  व बुध है लेकिन इसके अलावा भी इस ग्रह की अन्य ग्रहों से कोई शत्रुता नहीं होती है। चंद्रमा मंगल, गुरु, शुक्र व शनि से सम संबंध रखते है। चन्द्र कर्क राशि का स्वामी है।

ज्योतिष में सभी नौ ग्रहों में सबसे ज्यादा चलने वाला ग्रह है चंद्रमा, जो मन का कारक है। इस ग्रह का किसी  से कोई शत्रुता नहीं होती है। मतलब यह चंद्रमा का मित्र ग्रह  वैसे तो सूर्य  व बुध है लेकिन इसके अलावा भी इस ग्रह की अन्य ग्रहों से कोई शत्रुता नहीं होती है। चंद्रमा मंगल, गुरु, शुक्र व शनि से सम संबंध रखते है। चन्द्र कर्क राशि का स्वामी है। चन्द्र वृ्षभ राशि में उच्च स्थान प्राप्त करता है।चन्द्र वृ्श्चिक राशि में होने पर नीच राशि में होते है। चन्द्र ग्रह उत्तर-पश्चिम दिशाओं का प्रतिनिधित्व करता है।रत्न मोती है. चन्द्र ग्रह का रंग श्वेत, चांदी माना गया है. चन्द्र का शुभ अंक 2, 11,  20 है. चन्द ग्रह के लिए दुर्गा, पार्वती देवी की उपासना करनी चाहिए।

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प्रभाव: चन्द्र राशि लग्न भाव में हो या चन्द्र जन्म राशि हो,या चन्द्र लग्न भाव में बली अवस्था में हो, तो व्यक्ति को कफ रोग शीघ्र प्रभावित करते है, खूबसूरत आंखों व काया का मालिक, चंचल विचारधारा वाला व्यक्ति होता है। जिसकी कुंडली में चंद्रमा नीच व खराब होता है उस पुरुष व स्त्री के बाईं आंख, गाल, मांस, रक्त बलगम, वायु, स्त्री में दाईं आंख, पेट, भोजन नली, गर्भाशय, अण्डाशय, मूत्राशय परेशानी होती है। चन्द्र कुण्डली में कमजोर चंद्रमा व्यक्ति को ह्रदय रोग, फेफडे, दमा से प्रभावित करता है।

शुभ प्रभाव यदि कुंडली में चन्द्रमा मित्र या उच्च राशि में है तो व्यक्ति समस्त कार्यों में सफलता पाने वाला व मन से प्रसन्न रहने वाला होता है। पदोन्नति, जलोत्पन्न, तरल व श्वेत पदार्थों के कारोबार से लाभ मिलता है। यदि चन्द्रमा कृष्ण पक्ष का नीच या शत्रु राशि में हो तथा अशुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो चंद्रमा निर्बल हो जाता है। ऐसी स्थिति में निद्रा व आलस्य घेरे रहता है व्यक्ति मानसिक रुप से बेचैन, मन चंचलता से भरा रहता है मन में भय व्याप्त रहता है।

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मान्यताएं पुराणों में चंद्रमा की उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय निकले 14 रत्नों में एक के रूप में की जाती है। वह लक्ष्मी जी के साथ समुद्रमंथन से ही प्रकट हुए। शिवजी ने समुद्रमंथन के समय हलाहल विष पिया था, इसलिए उन्होंने शीतलता के लिए चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया। मान्यता है कि जब समुद्रमंथन के समय विष्णु भगवान मोहिनी अवतार धारण कर देवताओं और दानवों को अलग-अलग बैठाकर देवताओं को अमृत का पान करा रहे थे तो राक्षसों में से एक देवताओं की कतार में बैठ गया था। सूर्य और चंद्रमा ने उसे देख लिया, उन्होंने शोर मचाया तो मोहिनी अवतार लिए विष्णुजी ने राक्षस का सिर धड़ से अलग कर दिया। चंद्रमा की स्थिति का पृथ्वी पर सीधा प्रभाव पड़ता है। चंद्रमा के कारण ही पृथ्वी पर ज्वार भाटा आता है। चंद्रमा का शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में प्रभाव रहता है।