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श्रीनिवास रामानुजन जैसा महान गणितज्ञ, इतिहास ने फिर नहीं देखा: आरके श्रीवास्तव

10 वर्ष की अल्प अवस्था में स्नातक तक के सभी गणितीय सवालों को स्वयं हल करने वाले, नामगिरी देवी के अनन्य भक्त ने अपने लिए जो स्थान बनाया वो अकल्पनीय है। गणित में रामानुजन को वही सम्मान प्राप्त है जो भौतिकी के क्षेत्र में आइंस्टीन और न्यूटन को प्राप्त है ।

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MonikaBy Monika

Published on 22 Dec 2020 4:03 AM GMT

श्रीनिवास रामानुजन जैसा महान गणितज्ञ, इतिहास ने फिर नहीं देखा: आरके श्रीवास्तव
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श्रीनिवास रामानुजन जैसा महान गणितज्ञ, इतिहास ने फिर नहीं देखा
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सिर्फ 1 रूपया गुरू दक्षिणा में सैकङो निर्धन परिवार के स्टूडेंट्स को इंजीनियर बना चुके आरके श्रीवास्तव ने कहा की श्रीनिवास रामानुजन जैसा महान गणितज्ञ, इतिहास ने फिर नहीं देखा

10 वर्ष की अल्प अवस्था में स्नातक तक के सभी गणितीय सवालों को स्वयं हल करने वाले, नामगिरी देवी के अनन्य भक्त ने अपने लिए जो स्थान बनाया वो अकल्पनीय है। गणित में रामानुजन को वही सम्मान प्राप्त है जो भौतिकी के क्षेत्र में आइंस्टीन और न्यूटन को प्राप्त है ।

आज है राष्ट्रीय गणित दिवस

राष्ट्रीय गणित दिवस (National Mathematics Day) हर साल 22 दिसंबर को मनाया जाता है। यह दिन महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की जयंती (Srinivasa Ramanujan Jayanti) के रूप में मनाया जाता है। देश भर के स्कूलों, कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रीय गणित दिवस को मनाया जाता है। आज के दिन देश और दुनिया के विशेषज्ञ गणित में श्रीनिवास रामानुजन (Srinivasa Ramanujan) के योगदान को याद करते हैं। बेहद कम उम्र में मैथ्‍स के थियोरम ल‍िखने वाले रामानुजन सिर्फ भारत के लिए ही नहीं पूरी दुनिया के लिए मिसाल हैं। उन्‍होंने गणित के ऐसे-ऐसे सिद्धांत दिए जिन्‍हें आज तक सुलझाया नहीं जा सका है।उनके फॉर्मूलों कई वैज्ञानिक खोजों में मददगार साबित हुए।

ग्रैजुएशन के स्टूडेंट्स को गणित पढ़ाया

रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के इरोड में हुआ था। तब यह शहर मद्रास प्रेसिडेंसी के तहत आता था और देश पर राज था अंग्रेजों का। किसी भारतीय प्रतिभा के लिए उभरना आसान न था, लेकिन रामानुजन जैसे हीरे की चमक छिपाई नहीं जा सकती।

कहते हैं कि सातवीं में पढ़ाई के दौरान ही वे ग्रैजुएशन के स्टूडेंट्स को गणित पढ़ाते। 13 साल की उम्र में गणितज्ञ एस.एल. लोनी की किताब अडवांस्ड ट्रिग्नामिट्री को हल कर दिया। 16 साल की उम्र में जी.एस. कार की लिखी किताब 'ए सिनॉप्सिस ऑफ एलिमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर एंड अप्लाइड मैथमेटिक्स' पर फतह पा ली। रामानुजन गणित के लिए ही बने थे। कोई और विषय उन्हें रास न आते। शायद बहुतों को यकीन न हो, लेकिन वह दो बार फेल भी हुए।

सपने में आते थे गणित के सूत्र

इस महान गणितज्ञ के जीवन में बड़ा बदलाव आया 1913 में। तब उन्होंने एक दूसरे बड़े गणितज्ञ कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के जी.एच. हार्डी को लेटर लिखा। कई पेज के पत्र में बड़े-बड़े फॉर्म्युले लिखे थे। ऐसा लग रहा था कि रामानुजन एक समानांतर ब्रह्मांड की बात कर रहे हैं। इन सूत्रों की व्याख्या नहीं की गई थी। कुछ फॉर्म्युले जाने-पहचाने थे, लेकिन उनका परिणाम अलग। कुछ में असंभव-सा दावा किया गया था, लेकिन रचनात्मकता थी।

सपने में दिखते थे सूत्र

कुछ तो इतने आश्चर्यजनक थे कि हार्डी ने लिखा कि ये जरूर सही होंगे। अगर ये सही नहीं होते तो कोई भी इनका अविष्कार करने के बारे में सोच नहीं सकता था। हार्डी को कोई संदेह नहीं रहा। उन्होंने रामानुजन को कैंब्रिज बुला लिया। रामानुजन ने बाद में बताया कि उन्हें ये सूत्र सपने में दिखे थे।

यूरोप तब जंग के मुहाने पर था। कला, संगीत, साहित्य और नागरिक अधिकारों की दुनिया बदल रही थी। रामानुजन इसी माहौल में ब्रिटेन पहुंचे। अगले पांच वर्षों में उनकी और हार्डी की जोड़ी ने तहलका मचा दिया। अपने काम के लिए 1918 में उन्हें रॉयल सोसायटी का सदस्य बनाया गया।

टीबी के शिकार हुए

एक राष्ट्रीय हीरो के तौर पर रामानुजन 1919 में भारत लौटे। गणित में वह शिखर पर थे, लेकिन स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा था। डॉक्टरों ने पाया कि उन्हें टीबी हो गया है। हालांकि अब माना जाता है कि डॉक्टरों ने गलत डायग्नोस किया। खैर, अपने परिवार और पत्नी से मिलने के बाद उन्होंने अपनी सबसे बड़ी खोज की।

रामानुजन का स्वास्थ्य लगातार गिर रहा था। वह बिस्तर पर थे, लेकिन उनके दिमाग में केवल एक ही चीज घूम रही थी, गणित। उन्होंने 12 जनवरी 1920 को हार्डी को आखिरी पत्र लिखा। इसमें मॉक थीटा फंक्शन के बारे में बताया था। तब तक इस रहस्यपूर्ण थिअरी के बारे में सोचा भी नहीं गया था। इससे पहले कि हार्डी कोई जवाब दे पाते, उन्हें खबर मिली कि रामानुजन नहीं रहे। वह मनहूस तारीख थी 26 अप्रैल 1920।

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रामानुजन के हार्डी को लिखे अंतिम पत्र

बता दें, कि रामानुजन के हार्डी को लिखे उस अंतिम पत्र के सौ साल बाद भी गणितज्ञ अपना दिमाग खपाते रहे। वह उन थिअरी को समझने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें रामानुजन ने नहीं लिखा। इस महान गणितज्ञ के कामों के परिणामों की जांच कर रहे जीन-पियरे सेरे और पियरे डेलिग्ने ने बाद में गैलोज प्रतिनिधित्व का पता लगाया। इसके लिए फील्ड मेडल मिला। इस सम्मान को गणित का नोबल पुरस्कार माना जाता है।

रामानुजन के सूत्रों का विस्तार कहां तक है, हमें अब भी यह नहीं पता। सिग्नल प्रोसेसिंग से लेकर ब्लैक होल फिजिक्स तक, आज उनके फॉर्म्युला हर जगह काम आ रहे हैं। जो थिअरी उन्होंने बीमारी की हालत में दी, उसका रहस्य हम 21वीं सदी में जाकर खोल पाए और पता लगा कि मॉक थीटा फंक्शन ब्लैक होल को समझने के लिए जरूरी है।

रामानुजन के दिमाग में ऐसी कई बातें थीं। उन्हें गणित के सपने आते थे। उन सपनों ने अभी तक कई गणितज्ञों की नींद उड़ा रखी है।

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