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Best Friend Day 2021: राजनीति में दोस्ती, इन नेताओं की जोड़ी सबसे अनोखी, साथ लिया जाता है नाम

Best Friend Day 2021: चलिए Newstrack.com आपको नेशनल बेस्ट फ्रेंड डे के मौके पर ऐसे राजनेताओं की जोड़ी के बारे में बताने जा रहा है, जो सियासी गलियारों में काफी नाम रखती हैं।

Shivani

ShivaniWritten By Shivani

Published on 7 Jun 2021 11:24 AM GMT

Best Friend Day 2021: राजनीति में दोस्ती, इन नेताओं की जोड़ी सबसे अनोखी, साथ लिया जाता है नाम
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Best Friend Day 2021: 'दोस्ती वो पहला रिश्ता होता है जो कोई इंसान खुद की मर्जी से बनाता है, इसके पहले तक हमारे सारे रिलेशन फैमिली से जुड़े होते हैं, जो एक इंसान के पैदा होने के साथ ही तय हो जाते हैं।'
8 जून को नेशनल बेस्ट फ्रेंड डे (Best Friend Day) है। वैसे तो संयुक्त राज्य अमेरिका (US) में बेस्ट फ्रेंड डे मनाया जाता है लेकिन अब विश्व स्तर भी लोग अपने दोस्तों के साथ ये खास दिन मनाते हैं। कोरोना संकट के बीच दोस्त भले ही एक दूसरे से दूर हैं लेकिन सोशल साइट्स, कॉल के जरिये एक दूसरे को ये महसूस नहीं होने देते कि महामारी भी उनके बीच दूरियां ला सकती है।
वैसे तो लगभग हर किसी का कोई न कोई बेस्ट फ्रेंड या सबसे अच्छा दोस्त होता होगा। लेकिन भारत में कई ऐसी शख्सियत हैं, जिनकी दोस्ती काफी फेमस है। जो जिस फील्ड या कार्यक्षेत्र में होता है, वहां उसकी किसी न किसी से बेहद जमती है। उनकी अच्छी जोड़ी और मिल कर काम करने के तरीके से आसपास के लोग प्रभावित होते हैं लेकिन अगर इसी कांसेप्ट को राजनीति में रख कर देखा जाये तो लोगों के मन में ये सवाल जरूर उठेगा कि राजनीति में कौन किसका दोस्त है।

नेताओं की दोस्ती (Netao Ki Dosti)

चलिए Newstrack.com आपको नेशनल बेस्ट फ्रेंड डे के मौके पर ऐसे राजनेताओं की जोड़ी (Politician Friendship) के बारे में बताने जा रहा है, जो सियासी गलियारों में काफी नाम रखती हैं। वो भले ही एक ही पार्टी के हो या अलग अलग दलों के, लेकिन इनकी जोड़ी राजनीति में अपनी पहचान बना चुकी है।

मोदी -शाह राजनीति के जय-वीरू

भारत के सबसे ऊँचे पद पर आसीन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम राजनीति में जब भी लिया जाता है, उनके साथ गृह मंत्री अमित शाह एक नाम अधिकतर जोड़ा जाता है। मोदी-शाह की जोड़ी (Modi-Shah Ki Dosti) सिर्फ भारत में ही नहीं दुनिया भर में प्रसिद्ध है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की दोस्ती काफी पुरानी है। दोनों आरएसएस से जुड़े हैं। उनकी मुलाक़ात अहमदाबाद में संघ की शाखाओं के दौरान हुई। शाह ने 16 साल की उम्र में आरएसएस ज्वाइन कर लिया था। उस समय नरेंद्र मोदी संघ के प्रचारक थे। बाद में दोनों ने राजनीति में कदम रखा। 38 साल बाद आज मोदी शाह की यहीं जोड़ी भाजपा को केंद्र की सियासत तक ले पहुंची।


अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी

नरेंद्र मोदी और अमित शाह से भाजपा की पहली दमदार जोड़ी नहीं है, जो केंद्र की सत्ता में पहुंची। उनसे पहले भाजपा के दो धुरंधरों की जोड़ी ने भी राजनीति में कमाल कर दिया था। हम बात कर रहे हैं भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी की। वाजपेयी और आडवाणी की जोड़ी भी संघ की शाखाओं में बनी। दोनों की पहली मुलाक़ात राजस्थान में हुई।

फिर दोनों की एंट्री राजनीति में हुई। कहा जाता है कि दोनों एक दूसरे के साथ काफी वक्त बिताते थे, साथ खाते पीते और फिल्मे भी देखा करते थे। आडवानी ने अटल का अच्छे और बुरे हर वक्त में साथ दिया। संघ में मधोक को वायपेयी खटकते थे, वे समय समय पर उनकी शिकायत संघ प्रमुख से किया करते थे लेकिन जब आडवाणी ने आरएसएस की कमान संभाली तो अपने कार्यकाल के दौरान मधोक को निष्काषित कर दिया।


अडवाणी अटल की जोड़ी (Atal -Adwani Ki Jodi) मोरारजी देसाई की सरकार में मंत्री बनी। बाद में भाजपा का गठन हुआ तो अटल जी के बाद पार्टी में दूसरा स्थान आडवाणी का ही था। बीच में दोनों के बीच मतभेद की बाते भी सामने आई, अटल जी की सरकार बनी तो दोनों अल्थ थलग दिखे, लेकिन अटल जी के राजनीति से सन्यास लेने के बाद आडवाणी का राजनीतिक सफर भी लगभग खत्म सा हो गया।

मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह

उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी एक जोड़ी काफी चर्चा में आई। शुरुआत में इस जोड़ी को बेमेल कहा गया। एक तरफ महंगी कारों में सफर करने वाले, पांच सितारा होटलों में जश्न मनाने वाले अमर सिंह थे तो दूसरी तरफ मुलायम सिंह यादव। कहा जाता है कि मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह (Mulayam Singh-Amar Singh) की मुलाक़ात 1996 में एक फ्लाइट में हुई थीं। उसके बाद दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ी और अमर सिंह ने समाजवादी पार्टी ज्वाइन कर ली।


जमीनी राजनीति से जुड़े मुलायम की समाजवादी पार्टी को अमर सिंह ने बॉलीवुड सितारों की चमक से जगमगा दिया। अमिताभ बच्चन से लेकर जया प्रदा तक सपा से जुड़ते चले गए। कहा जाता है कि अमर सिंह मुलायम सिंह यादव पर इस कदर हावी हो चुके थे कि पार्टी के हर बड़े फैसले, मुलायम के फैसलों में अमर की दखलंदाजी रहती थीं। पार्टी में अमर की वजह से असंतोष व्याप्त होने लगा लेकिन मुलायम ने किसी की न सुनी, हालंकि साल 2010 में अमर को सपा से निष्काषित करना पड़ा और ये जोड़ी 14 साल बाद टूट गयी।

लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार

बिहार की राजनीति में दो सबसे बड़े दल एक दूसरे के सामने भले ही दुश्मनों की तरह खड़े हों, लेकिन उनकी जोड़ी की चर्चा आज भी रहती है। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार (Nitish Kumar-Lalu Yadav Ki Dosti) भले ही आज आमने सामने हैं लेकिन साल 1974 में जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के दौरान दोनों एक साथ खड़े थे। उस दौरान दोनों का मकसद सत्ता के खिलाफ आंदोलन था। लालू नीतीश में दोस्ती हुई, जो 1994 तक बरकरार रही।

साल 1985 में दोनों एक साथ विधानसभा पहुंचे थे। 1988 में कर्पूरी ठाकुर के निधन के बाद जब बिहार के नए मुख्यमंत्री चुनने का समय आया तो नीतीश लालू के सारथि बन गए। मुख्यमंत्री वाली बनता जो नेता प्रतिपक्ष में होता, ऐसे में नीतीश ने तमाम विधायकों को लालू के पक्ष में ला दिया और लालू यादव को बिहार के सीएम की कुर्सी तक पहुंचा दिया। हालंकि 20 साल की दोस्ती दलित और बिछडो पर हुई राजनीति से टूट गयी।


बाद में 19 सालों बाद मोदी लहर के खिलाफ ये दोस्ती फिर रंग लाई। दोनों ने भाजपा के खिलाफ एक साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा और लालू ने अपने दोस्त नीतीश को मुख्यमंत्री बनाया। हालांकि सालो बाद एक हुए ये लालू नीतीश की दोस्ती ज्यादा लम्बी नहीं टिकी और चार सालो में ही दोनों ने एक दूसरे पर आरोप लगाते हुए अपने रास्ते अलग कर लिए।

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