Top

पुण्यतिथि विशेष: सुलझे हुए व्यक्ति थे पंडित जवाहर लाल नेहरू

भारत के पहले प्रधानमंत्री पं जवाहरलाल नेहरू की 57वीं पुण्यतिथि आज

Pallavi Srivastava

Pallavi SrivastavaWritten By Pallavi Srivastava

Published on 27 May 2021 6:25 AM GMT

पुण्यतिथि विशेष: सुलझे हुए व्यक्ति थे पंडित जवाहर लाल नेहरू
X
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print
  • Facebook
  • Twitter
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • Print

"यदि पूंजीवादी समाज की शक्तियों को अनियंत्रित छोड़ दिया जाए तो वो अमीर को और अमीर और गरीब को और गरीब बना देंगी।" - पंडित जवाहर लाल नेहरू

पुण्यतिथि विशेष: भारतीय इतिहास के पन्नो में बहुत से महानायकों का नाम दर्ज है जो आज भी अपने द्धारा रचे इतिहास के लिए जाने जाते हैं। और हम ऐसे समाज में रहते हैं जहां उन महानायकों द्धारा किये गये कार्यों को इतिहास के पन्नों पर संजोया गया है ताकि पीढ़ी दर पीढ़ी उसे कभी भुलाया न जा सके। आज ऐसे ही महानायक की बात हम कर रहें हैं जिन्होने भारत के पहले प्रधानमन्त्री के रूप में भारत के सपने को साकार करने के लिए चल पड़े थे। भारत के लिए काफी कुछ किया था। जी हां हम बात कर रहे हैं भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की। जिनका जन्म 14 नवंबर 1889 को हुआ था और 27 मई 1964 को उनका निधन हो गया था।



27 मई पंडित जवाहरलाल की पुण्यतिथि पर विशेष

जवाहरलाल नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। जवाहरलाल नेहरू जी को बच्चे प्यार से चाचा नेहरू के नाम से बुलाते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहुत से ऐसे कार्य किये जिनकी वजह से वो हमेशा के लिए अमर हो गए है। इन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बहुत बड़ी भूमिका भी निभाई। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर, 1889 को इलाहाबाद में हुआ था। 1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद वो स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। संसदीय सरकार की स्थापना और विदेशी मामलों पर गुटनिरपेक्ष नीतियों की शुरूआत पंडित जवाहरलाल नेहरू की ओर से हुई थी।


27 मई 1964 की सुबह नेहरू की तबीयत खराब हो गई और और दोपहर दो बजे उनका निधन हो गया। पंडित नेहरु को कुल 11 बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। पंडित जवाहरलाल नेहरू जो कश्मीरी पण्डित थे और उनका बचपन शानोशौकत से भरा था। उनके पिता, मोतीलाल नेहरू एक धनी बैरिस्टर थे। मोती लाल नेहरू सारस्वत कौल ब्राह्मण समुदाय से थे, स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष चुने गए थे। उनकी माता स्वरूपरानी थुस्सू जो लाहौर में बसे एक प्रसिद्ध कश्मीरी ब्राह्मण परिवार से थीं।ये मोतीलाल नेहरू की दूसरी पत्नी थी, पहली पत्नी की प्रसव के दौरान मृत्यु हो गई थी।जवाहरलाल तीन बच्चों में से सबसे बड़े थे, जिनमें बाकी दो लड़कियां थी। बड़ी बहन, विजया लक्ष्मी, बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष बनी, सबसे छोटी बहन, कृष्णा हठीसिंग, एक उल्लेखनीय लेखिका बनी और उन्होंने अपने परिवारजनों से संबंधित कई पुस्तकें लिखीं।



उच्च शिक्षा के धनी थे पं जवाहरलाल नेहरू

जवाहरलाल नेहरू ने दुनिया के कुछ बेहतरीन स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हैरो से और कॉलेज की शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज (लंदन) से पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने अपनी लॉ की डिग्री कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पूरी की। इंग्लैंड में उन्होंने सात साल व्यतीत किए जिसमें वहां के फैबियन समाजवाद और आयरिश राष्ट्रवाद के लिए एक तर्कसंगत दृष्टिकोण विकसित किया।जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत शुरू की।1916 में उनकी शादी कमला नेहरू से हुई।


राजनीतिक परिचय

पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वतन्त्रता के पूर्व और पश्चात् की भारतीय राजनीति में केन्द्रीय वक्तित्व के रूप में थे। महात्मा गांधी के संरक्षण में वे भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के सर्वोच्च नेता के रूप में भी उभरे और उन्होंने 1947 में भारत के एक स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में स्थापना से लेकर 1964 तक अपने निधन तक, भारत का शासन किया। वे आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य दृ एक सम्प्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, और लोकतान्त्रिक गणतन्त्र के वास्तुकार माने जाते हैं। कश्मीरी पण्डित समुदाय के साथ उनके मूल की वजह से वे पण्डित नेहरू भी बुलाए जाते थे, जबकि भारतीय बच्चे उन्हें चाचा नेहरू के रूप में जानते हैं।स्वतन्त्र भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री का पद संभालने के लिए कांग्रेस द्वारा नेहरू निर्वाचित हुए, यद्यपि नेतृत्व का प्रश्न बहुत पहले 1941 में ही सुलझ चुका था, जब गांधीजी ने नेहरू को उनके राजनीतिक वारिस और उत्तराधिकारी के रूप में भी स्वीकार किया। भारत का संविधान 1950 में अधिनियमित हुआ, जिसके बाद उन्होंने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सुधारों के एक महत्त्वाकांक्षी योजना की शुरुआत की। मुख्यतः, एक बहुवचनी, बहु-दलीय लोकतन्त्र को पोषित करते हुए, उन्होंने भारत के एक उपनिवेश से गणराज्य में परिवर्तन होने का पर्यवेक्षण किया।


विदेश नीति में, भारत को दक्षिण एशिया में एक क्षेत्रीय नायक के रूप में प्रदर्शित करते हुए, उन्होंने गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में एक अग्रणी भूमिका निभाई। जवाहरलाल नेहरू 1912 में भारत लौटे और वकालत शुरू की।1916 में उनकी शादी कमला नेहरू से हुई। 1917 में जवाहर लाल नेहरू होम रुल लीग‎ में शामिल हो गए। राजनीति में उनकी असली दीक्षा दो साल बाद 1919 में हुई जब वे महात्मा गांधी के संपर्क में आए। उस समय महात्मा गांधी ने रॉलेट अधिनियम के खिलाफ एक अभियान शुरू किया था। नेहरू, महात्मा गांधी के सक्रिय लेकिन शांतिपूर्ण, सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रति खासे आकर्षित हुए नेहरू ने महात्मा गांधी के उपदेशों के अनुसार अपने परिवार को भी ढाल लिया। जवाहरलाल और मोतीलाल नेहरू ने पश्चिमी कपड़ों और महंगी संपत्ति का त्याग कर दिया। वे अब एक खादी कुर्ता और गांधी टोपी पहनने लगे। जवाहर लाल नेहरू ने 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया और इस दौरान पहली बार गिरफ्तार किए गए। कुछ महीनों के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया।नेहरू के नेतृत्व में, कांग्रेस राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय चुनावों में प्रभुत्व दिखाते हुए और 1951, 1957, और 1962 के लगातार चुनाव जीतते हुए, एक सर्वग्रहण पार्टी के रूप में उभरी। उनके अन्तिम वर्षों में राजनीतिक संकटों और 1962 के चीनी-भारत युद्ध में उनके नेतृत्व की असफलता के बाद भी वे भारत में लोगों के बीच लोकप्रिय बने रहे । भारत में, उनका जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। जवाहर लाल नेहरू ने जोसिप बरोज टिटो और अब्दुल गमाल नासिर के साथ मिलकर एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद के खात्मे के लिए एक गुट निरपेक्ष आंदोलन की रचना की। वह कोरियाई युद्ध का अंत करने, स्वेज नहर विवाद सुलझाने और कांगो समझौते को मूर्तरूप देने जैसे अन्य अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में मध्यस्थ की भूमिका में रहे।


26 मई की शाम आखिरी बार देखे गए थे

देहरादून की वो शाम आखिरी शाम थी, जब नेहरू को आखिरी बार सार्वजनिक तौर पर देखा गया था। 26 मई 1964 की शाम नेहरू जब देहरादून से रवाना हुए तो वो कमजोर नजर आ रहे थे। उन्होंने अपने चेहरे पर मुस्कुराहट के पीछे दर्द को समेटे रखा था। हेलिकॉप्टर के दरवाजे पर खड़े होकर हाथ हिलाया। तब बायां हाथ ऊपर उठाते समय नेहरू के चेहरे पर कुछ दर्द सा प्रतीत हो रहा था। उनकी बेटी इंदिरा उन्हें सहारा देने के लिए खड़ी थी। बाएं पैर के मूवमेंट में भी दिक्कत महसूस हो रही थी। नेहरू करीब आठ बजे के आसपास दिल्ली पहुचकर सीधे प्रधानमंत्री हाउस चले गए। रिपोर्ट्स की मानें तो वो थके हुए थे. पिछले कुछ समय वो अस्वस्थ चल रहे थे, लिहाजा उनके रूटीन पर भी इसका असर पड़ा था। वो रातभर करवटें बदलते रहे और पीठ के साथ कंधे में दर्द की शिकायत करते रहे। सेवक नाथूराम उन्हें दवाएं देकर सुलाने का प्रयास करते रहे द गार्जियन की 27 मई 1964 की रिपोर्ट कहती है कि सुबह 06.30 बजे उन्हें पहले पैरालिटिक अटैक हुआ और फिर हार्ट अटैक। इसके बाद वो अचेत हुो गए। डॉक्टरों ने अपनी ओर से भरपूर कोशिश की लेकिन नेहरू का शरीर कोमा में पहुंच चुका था. शरीर से कोई रिस्पांस नहीं मिल रहा था, जिससे पता लगे कि इलाज कुछ असर कर भी रहा है या नहीं। कई घंटे की कोशिश के बाद डॉक्टरों ने जवाब दे दिया।

27 मई से लोकसभा का सात दिनों का विशेष सत्र बुलाया गया था, जिसमें प्रधानमंत्री नेहरू खासतौर पर कश्मीर और शेख अब्दुल्ला के बारे में कुछ सवालों का जवाब देने वाले थे। दोपहर 02.00 बजे स्टील मंत्री कोयम्बटूर सुब्रह्मणियम राज्यसभा में दाखिल हुए, उनके चेहरे पर हवाइयां उड़ी हुईं थीं। उन्होंने बुझे हुए स्वर में केवल इतना कहा, रोशनी खत्म हो गई है, लोकसभा तुरंत स्थगित कर दी गई। कुछ घंटों बाद गुलजारी लाल नंदा को कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा की गई। शाम 04.00 बजे भीड़ प्रधानमंत्री हाउस के सामने इकट्ठा होने लगी। इसमें नेता, राजनयिक, आम जनता शामिल थी। अगले दिन उनका पार्थिव शरीर जनता के आखिरी दर्शन के लिए रखा गया। 29 मई को उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीतिर्विाजों से हुआ।


लेखन एवं प्रकाशन

जवाहरलाल नेहरू हमेशा से ही राजनीतिक विवादों से दूर एक उत्तम लेखक थे। राजनीतिक क्षेत्र में लोकमान्य तिलक के बाद जम कर लिखने वाले नेताओं में वे अलग से पहचाने जाते थे। दोनों के क्षेत्र अलग हैं, परंतु दोनों के लेखन में सुसंबद्धता पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है। पंडित नेहरू स्वभाव से ही स्वाध्यायी थे। उन्होंने महान् ग्रंथों का अध्ययन किया था सभी राजनैतिक उत्तेजनाओं के बावजूद वे स्वाध्याय के लिए रोज ही समय निकाल निकाल कर लेखन करता थे। नेहरू जी ने अनेक पुस्तकों की रचना की है। राजनीतिक जीवन के व्यस्ततम संघर्षपूर्ण दिनों में लेखन हेतु समय के नितांत अभाव का हल उन्होंने यह निकाला कि जेल के लंबे नीरस दिनों को सर्जनात्मक बना लिया जाय। इसलिए उनकी अधिकांश पुस्तकें जेल में ही लिखी गयी हैं। उनके लेखन में एक साहित्यकार के भावप्रवण तथा एक इतिहासकार के खोजी हृदय का मिला-जुला रूप सामने आया है।


नेहरू जी की प्रकाशित पुस्तके

1- पिता के पत्र रू पुत्री के नाम - 1929

2- विश्व इतिहास की झलक (ग्लिंप्सेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री) - (दो खंडों में) 1933

3- मेरी कहानी (ऐन ऑटो बायोग्राफी) - 1936

4- भारत एक खोज हिन्दुस्तान की कहानी (दि डिस्कवरी ऑफ इंडिया) - 1945

5- राजनीति से दूर

6- इतिहास के महापुरुष

7- राष्ट्रपिता

8- जवाहरलाल नेहरू वाङ्मय (11 खंडों में)

Pallavi Srivastava

Pallavi Srivastava

Next Story