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Mahatma Gandhi Ki Smritiyan: सियासत में गुम होतीं राष्ट्रपिता की स्मृतियां

Mahatma Gandhi Ki Smritiyan: उत्तर प्रदेश में भाजपा के भगवा, सपा के सपाई और मायावती के बसपाई सियासी रंगों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) का रंग न केवल तिरोहित हो गया बल्कि उनके नाम पर चलने वाली योजनाएं अब अफसरों के एजेंडे का भी हिस्सा नहीं रही।

Yogesh Mishra

Yogesh MishraWritten By Yogesh MishraShreyaPublished By Shreya

Published on 16 Oct 2021 5:17 AM GMT

सियासत में गुम होतीं राष्ट्रपिता की स्मृतियां
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महात्मा गांधी (फोटो साभार- सोशल मीडिया) 

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Mahatma Gandhi Ki Smritiyan: उत्तर प्रदेश में भाजपा ((Uttar Pradesh Me BJP) के भगवा, सपा के सपाई और मायावती के बसपाई सियासी रंगों में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) का रंग न केवल तिरोहित हो गया बल्कि उनके नाम पर चलने वाली योजनाएं अब अफसरों के एजेंडे का भी हिस्सा नहीं रही। कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल बोरा (Motilal Vora) जब राज्य में राज्यपाल थे तब उत्तर प्रदेश की सीमा में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को लेकर न केवल गांधी ग्राम योजनाएं बनी व संवाद हुए बल्कि उनकी स्मृतियों को सहेजने के काम को भी अंजाम दिया गया। लेकिन बड़ी चतुराई से क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अपनी सियासी विचारधाराओं के लोगों को लेकर इतनी बड़ी रेखाएं खींची कि उनके आगे महात्मा गांधी के नाम की योजनाएं , स्मृतियां और संवाद नेपथ्य में चले गए।

राज्य में महात्मा गांधी की याद (Mahatma Gandhi Ki Smritiyan) में बने चबूतरों (kaha hai gandhi chabutra) की भी कहानी कमोबेश गांधी ग्राम जैसी ही है। आजादी से लेकर 1958 तक ही सरकारों ने तकरीबन हर तहसीलों और ब्लाकों पर गांधी चबूतरों (Gandhi Chabutra Ka Nirman) का निर्माण करवाया। इनमें 4,961 पक्के और 5,432 कच्चे चबूतरे बने। पंचायतों की देखरेख में संरक्षित ये चबूतरे अब न जाने कहां चले गए। इलाहाबाद के एक वकील राजेश त्रिपाठी (Rajesh Tripathi) ने जनसूचना अधिकार के तहत मुख्य सचिव से इस बाबत जब जवाब मांगा, तब जाकर लोगों को गांधी चबूतरों की याद आई। अब देर इतनी हो चुकी है कि अधिकांश जगहों पर गांधी चबूतरों का नामो-निशान मिट गया है। नतीजतन, राजेश त्रिपाठी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) की शरण ली है। उन्होंने हाईकोर्ट से गांधी चबूतरों (gandhi chabutra ka itihas) के गायब होने के प्रकरण में उच्च स्तरीय जांच की मांग की है।

महात्मा गांधी (फाइल फोटो साभार- सोशल मीडिया)

स्कूल का भी नामो-निशान मिटने की कगार पर

गांधी चबूतरे (Gandhi Chabutra Govind Nagar Kanpur Uttar Pradesh) ही क्यों, राजधानी में उस स्कूल का भी नामो-निशान मिटने की स्थिति में है, जिसका शिलान्यास 1920 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने लखनऊ के ननइलाके में किया था। इस पूर्व माध्यमिक विद्यालय की इमारत को संरक्षित करने की जगह शिक्षा महकमे ने बगल में नए कक्ष बनवाकर स्कूल चलवाना बेहतर समझा। परिसर में बना वह चबूतरा जहां बापू बैठे थे, वहां नीम का पेड़ लगाया गया था। चबूतरा पूरी तरह टूट गया है। 1916 से 1936 के बीच राष्ट्रपिता महात्मा गांधी दस बार राजधानी लखनऊ पधारे। लखनऊ में गांधी जी की स्मृतियों से जुड़े ढेरों स्थल हैं। लेकिन रेलवे स्टेशन पर एक शिलापट और गोमती नदी पर बने एक गांधी और नेहरू की मूर्तियों के अलावा उनकी स्मृतियों को सहेजने की कोशिश कहीं नहीं हुई।

हरदोई (hardoi me mahatma gandhi ki jan sabha) में 10 अक्टूबर, 1929 को जिस स्थान पर महात्मा गांधी ने अपनी जनसभा (mahatma gandhi ki jan sabha) की थी, उसे न केवल गांधी मैदान (gandhi maidan kahan hai) का नाम दिया गया है। बल्कि वहीं गांधी भवन (Gandhi Bhawan) का निर्माण कराया गया। बापू की स्मृतियों में निर्मित इस भवन और मैदान को होटल की तरह किराए पर चलाया जा रहा है। अब इस मैदान को शादी समारोह (Shaadi Samaroh) के लिए किराए पर दिया जाता है। गांधी तिराहे पर लगी छोटी सी उनकी मूर्ति गांधी की शक्ल सूरत से भी नहीं मिलती। लेकिन प्रशासन इसे बदलने को तैयार नहीं है।

स्वराज आश्रम (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

गांधी ने की थी स्वराज आश्रम की स्थापना

कानपुर के सर्वोदय नगर में स्थित स्वराज आश्रम (swaraj ashram sarvodaya nagar kanpur) की स्थापना 1921 में राष्ट्रपिता ने की थी। 27 जनवरी, 1960 को इसकी अध्यक्षता का जिम्मा लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) ने लिया। उन्नाव से 30 साल तक विधायक रहे भगवती सिंह विशारद (Bhagwati Singh Visharad) उनके बाद आज तक अपनी सेवा देते रहे। श्री विशारद शहर की एक संकरी गली में एक कमरे के मकान में अपने पूरे परिवार के साथ गुमनामी का जीवन जीते हुए काल कवलित हो गये। उनके अथक प्रयास से स्वराज्य आश्रम की नौ शाखाएं- कानपुर, रमाबाई नगर, कन्नौज, फर्रूखाबाद, हरदोई, उन्नाव, बांदा, चित्रकूट और रायबरेली में कार्यरत हैं। यहां सालाना 15 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार हुआ।

स्वराज्य आश्रम की नौ शाखाएं (swaraj ashram ki 9 shakhayen) पूरे प्रदेश में सुचारु रूप से चल रही है। सालभर में ये आश्रम 15 करोड़ रुपए से ज्यादा का कारोबार कर रहे हैं। यहां युवाओं को लुभाने के लिए डिजाइनर कपड़ों के अलावा कंबल, शहद, सरसों का तेल व दवाइयों की कम दामों पर बिक्री होती है। गांधी जयंती अवसर पर 30 फीसदी छूट का डंका पीटा जाता है। इस छूट में दस फीसदी हिस्सा राज्य सरकार का होता है। बीते कई वर्षों से राज्य सरकार ने अपना हिस्सा संस्थान को नहीं दिया है। लोग पत्राचार करते-करते थक गए हैं। हद तो यह है कि मद्यनिषेध के हिमायती महात्मा गांधी की फूलबाग स्थित गांधी प्रतिमा के आस-पास ही हर साल मार्च-अप्रैल में शराब की नीलामी की जाती है।

पार्क पर भू-माफियाओं का कब्जा

मथुरा में महात्मा गांधी की याद (Mahatma Gandhi Ki Smritiyan) में चौक बाजार में एक पार्क है। यहां पुस्तकालय, व्यायामशाला और अस्पताल भी बाद में खोले गए। इस पार्क में न केवल गंदगी की भरमार रहती है बल्कि भू-माफियाओं ने भी कब्जा कर रखा है। आजमगढ़ में तो उनके नाम का कोई भी सरकारी संस्थान नहीं है। मुबारक और कोयलसा में कुछ लोगों ने जरूर गांधी जी के नाम पर निजी स्कूल खोले हैं। 11 सितंबर, 1929 को राष्ट्रपति जहां आए थे, उसे गांधी स्मारक के तौर पर विकसित किया गया। वर्ष 2006-07 में इसके लिए 93.55 लाख रुपए स्वीकृत हुए। जल निगम की निर्माण इकाई ने सार्वजनिक निर्माण विभाग की ओर से प्रस्तुत किए गए बजट 74.41 लाख रुपए में इजाफा करके यह धनराशि 19 लाख बढ़ा दी।

2007 में नगर आयुक्त रहे श्याम सिंह यादव के कार्यकाल में इस पर काम शुरू हुआ। यमुना किनारे दो गांधी चबूतरे बने। बाकी काम अभी तक अटके हुए हैं। धनराशि कहां गई, यह पूछने और बताने वाला कोई नहीं है। जौनपुर में मुफ्तीगंज बाजार के गांधी चबूतरे पर लगी महात्मा गांधी की प्रतिमा कई जगह भंग कर दी गई है। चबूतरे के आस-पास कूड़े के ढेर हैं पर रोज उधर से गुजरने वाले जिला प्रशासन के अधिकारियों को कुछ भी नहीं दिखता। गांधी जयंती पर भी नेता और हुक्मरान यहां तक नहीं आते।

इलाहाबाद के केंद्रीय विश्वविद्यालय (University of Allahabad) में 1961 में गांधी विचार (mahatma gandhi quotes) एवं शांति अध्ययन संस्थान स्थापित किया गया। 1976 में इसे विराट स्वरूप मिला। गांधी विचार (mahatma gandhi ke vichar) और शांति पर एक वर्षीय परास्नातक डिप्लोमा पाठ्यक्रम संचालित करने वाला यह संस्थान भी आर्थिक दिक्कतों से जूझ रहा है। संस्थान के प्राध्यापक डॉ. राजेश सिंह बताते हैं, 'यूजीसी से दस लाख रुपए का अनुदान मिलता है पर इससे काम नहीं चलता। धनराशि बढ़ाने के लिए कोशिश जारी है पर नतीजा नहीं निकल रहा है।'

संस्थान के निदेशक और विश्वविद्यालय के डीन एमपी द्विवेदी की मानें तो गांधी अध्ययन के प्रति युवाओं और बुजुर्गों में भी जागरुकता बढ़ी है। शहर के बालसन चौराहे पर स्थापित गांधी प्रतिमा को सात माह पहले कुछ शरारती तत्वों ने खंडित कर दिया था। जो अब तक नहीं बदली जा सकी। हालांकि गांधी जयंती के ठीक एक दिन पहले हुई बातचीत में नगर आयुक्त अशोक कुमार ने दावा किया कि दो अक्टूबर तक नई प्रतिमा लगा दी जाएगी। समाजसेवी अभय अवस्थी अपने गुस्से का इजहार कुछ इस तरह करते हैं, 'अगर किसी बसपाई प्रतीक भंजक न केवल गिरफ्तार होते बल्कि नई प्रतिमा भी लग गई होती।'

गांधी संग्रहालय (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

पुस्तकाल की हालत बदहाल

राजधानी लखनऊ के गांधी संग्रहालय (Gandhi Museum Lucknow Visiting Timings) एवं वाचनालय में आपको एक ही छत के नीचे न केवल गांधी के जीवन से जुड़ी तमाम वस्तुएं और पुस्तकें मिलेंगी बल्कि गांधी जी की वंशावली भी यहां की दीवार पर अंकित है। 28 जुलाई, 1975 को तत्कालीन राष्ट्रपति बीवी गिरी द्धारा इसका उद्घाटन किया गया था। तब से यह पुस्तकालय उप्र गांधी स्मारक निधि द्वारा संचालित है।

यहां की पुस्तकालयाध्यक्ष श्रीमती सरस्वती बताती हैं कि यहां पर गांधी जी के जीवन से जुड़ी तकरीबन 27 हजार किताबें हैं मगर पढ़ने वालों की संख्या बेहद कम है। यहां गांधी जी द्वारा लिखित कुछ लेख और पत्र भी संजोकर रखे गए हैं। गांधी चित्रावली, नेहरू चित्रावली, राजीव चित्रावली भी है। इनमें बापू से जुड़ी कई दुर्लभ तस्वीरें हैं। मगर इस जगह की हालत बदहाल हो रही है। पुस्तकालय में किताबें रखने वाली आलमारियां टूटने की कगार पर हैं। पुस्तकालय को किसी तरह की सरकारी सहायता नहीं मिलती है। केवल सोसाइटी को जो चंदा मिलता है उससे खर्च और कर्मचारियों को मानदेय दिया जाता है।

सुल्तानपुर जिला पंचायत परिसर में तकरीबन 44 साल पहले दो बिस्वा भूमि पर श्गांधी ज्ञान मंदिर्य की आधारशिला और शिलान्यास तो कर दिया गया। लेकिन बजट के अभाव में मंदिर निर्माण नहीं हो सका। अब तो शिलान्यास का पत्थर भी गायब हो गया है।अमेठी के स्थानीय बाजार में गांधी चबूबतरा और गांधी चौक पर उनकी प्रतिमा लगी है। लेकिन कोई स्मारक या संग्राहलय नहीं बनाया गया।

गांधी (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

शरारती तत्वों ने खंडित की गांधी जी की प्रतिमा

गांधी जी की कर्मभूमि रही संगम नगरी इलाहाबाद (sangam nagri prayagraj) में महात्मा गांधी की प्रतिमा (Gandhi Pratima Prayagraj) प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है। आनंद भवन के पास बालसन चौराहे (Anand Bhavan Near Balson Chauraha) पर स्थापित गांधी जी की प्रतिमा सात माह पहले कुछ शरारती तत्वों द्वारा खंडित कर दी गई थी, जिसे आज तक ठीक नहीं कराया गया। यहां के गांधी चबूतरों का भी हाल-बेहाल है। आजमगढ़ ने तो गांधी जी के नाम तक से दूरी बना ली है। तीन दशक से उनके नाम से एक भी नई संस्था की शुरुआत तो नहीं हुई पुरानी संस्थाएं भी घिसटते हुए चल रही हैं। हालांकि गांधी आश्रम, गांधी इंटर कॉलेज मुबारकपुर व गांधी गुरुकुल इंटर कॉलेज भंवरनाथ किसी तरह संचालित है। दुख इस बात का है कि हमने राष्ट्रपिता बनाकर गांधी जी को नोट पर छाप दिया पर गांधी के जीवन से जुड़ी स्मृतियां अब उत्तर प्रदेश में बेनूर होती जा रही हैं।

(यह लेख मूल रूप में गांधी जयंती पर 2019 को प्रकाशित हुआ था। )

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