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Mob Lynching Kya Hai: पहली भीड़ हिंसा कब हुई, मॉब लिंचिंग की सजा क्या है, इन मामलों से दहल गया था देश

Mob Lynching Kya Hai In Hindi : पिछले 7-8 सालों में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार देने की घटनाएं बेहद डरावनी होती गई हैं। कभी बच्चा चोरी तो कभी घर के किचन में बीफ रखे होने की अफवाह पर।

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AkshitaReport AkshitaShivaniPublished By Shivani

Published on 29 July 2021 4:04 AM GMT

Mob Lynching Kya hai
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भीड़ हिंसा कांसेप्ट इमेज 

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Mob Lynching Kya Hai In Hindi : देश के अलग अलग हिस्सों में मोब लिंचिंग (Bhid Hinsa) की घटनायें बढ़ती जा रही है। इसी संदर्भ में राजद के सांसद ने राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान सवाल किया जिसमें उन्होंने कहा कि क्या सुप्रीम कोर्ट के निर्देश अनुसार हेट क्राइम (Hate Crime), मोब लिंचिंग (Mob Voilence) में बदलाव किया गया तथा इससे संबंधित आंकड़े भी मांगे । जिसके जवाब में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा कि सरकार मौजूदा क्रिमिनल कानून (Criminal Laws) की समीक्षा कर रही है और सरकार की कोशिश है कि सभी को तय वक्त में न्याय मिल सके।

पिछले 7-8 सालों में भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार देने की घटनाएं बेहद डरावनी होती गई हैं। कभी बच्चा चोरी (Baccha Chori) तो कभी घर के किचन में बीफ रखे होने की अफवाह पर। बातें कहीं से शुरू होती हैं, आग की तरह गांव-मोहल्लों में फैल जाती हैं। फिर भड़काई भीड़ किसी व्यक्ति की जान ले लेती है। पुलिस कार्रवाई करती है, मामला दर्ज होता है और गिरफ्तारियां भी। अदालत के भीतर केस चलते हैं और आरोपी बाहर घूमते हैं।

मोब लिंचिंग क्या है (Mob Lynching Kya hai)

जब अनियंत्रित भीड़ द्वारा किसी दोषी को उसके किये अपराध के लिये या कभी-कभी मात्र अफवाहों के आधार पर ही बिना अपराध किये भी तत्काल सज़ा दी जाए अथवा उसे पीट-पीट कर मार डाला जाए तो इसे भीड़ द्वारा की गई हिंसा या मॉब लिंचिंग कहते हैं। इस तरह की हिंसा में किसी कानूनी प्रक्रिया या सिद्धांत का पालन नहीं किया जाता और यह पूर्णतः गैर-कानूनी होती है।

मोब लिंचिंग के आंकड़े (Mob Lynching Cases)

स्टेप्स फाउंडेशन द्वारा जारी किए गए आँकड़ों में सितम्बर 2015 से शुरु हुई लिंचिंग से मौत का आंकड़ा 145 से भी पार पहुंच गया है। लेकिन यह आंकड़ा भी खासा चौंकाने वाला है। लिंचिंग के शिकार हुए लोगों में 50 फीसदी मुस्लिम हैं, बाकी हिंदू थे। यह फाउंडेशन लिंचिंग पीड़ित परिवार के बच्चों को शिक्षा देने का काम करता है।


हैरियत की बात ये है कि एनसीआरबी की रिपोर्ट (NCRB report) अभी तक मोब लिंचिंग जैसी हत्याओं का विवरण ही नही है। हालांकि राज्य सरकारों ने अपने - अपने राज्य के आंकड़ों को केन्द्र सरकार को भेज दिया था। इसके बाद भी प्रभावशाली लोगों द्वारा हत्या ,खाप पंचायत द्वारा आदेशित हत्या ,धार्मिक कारणों से की गई हत्या को आज भी इसमे शामिल नही किया गया है। इसी वजह से प्रमाणिक तौर ओर आज भी कहा नही जा सकता कि हर दिन , हर साल कुल कितनी मौतें होती हैं।

मोब लिंचिंग का इतिहास (Mob Lynching History in Hindi)

22 जनवरी 1999 - उड़ीसा राज्य के मयूरभंज जिले में मोब लिंचिंग की पहली घटना हुई जिसने भारत को पूरी दुनिया मे बदनाम कर दिया। ग्राहम स्टेंस जो अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ उड़ीसा के क्योंझर में रहते थे। उनका मुख्य पेशा कुष्ठ रोगियों की सेवा करना था। एक दिन ग्राहम का परिवार ईसाइयों के मिशनरी प्रोग्राम में शामिल होने मयूरभंज निकला। रास्ते मे लौटते वक्त दारा सिंह की अगुवाई वाले 50 से 60 लोगो ने ग्राहम के परिवार पर लाठी डंडों से हमला कर दिया और अंततः ग्राहम की कार को आग के हवाले कर दिया। ग्राहम पर आरोप था कि वह लोगों का धर्मांतरण कराते थे।

भारत समेत दुनिया भर में इसकी आलोचना हुई। अलग-अलग राजनीतिक दलों, धार्मिक नेताओं, सिविल सोसायटी और पत्रकारों आदि ने इस घटना की एक सुर में निंदा की। घटना के आरोपियों के संबंध बजरंग दल से बताए गए। हालांकि हिंदूवादी संगठन इन रिश्तों को नकारते रहे। इस घटना की वजह से तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार बुरी तरह आरोपों से घिर गई। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने घटना की कड़ी आलोचना की।

इसकी जांच के लिए तीन कैबिनेट मंत्रियों की कमेटी मौके पर भेजी गई। जिसने अपनी रिपोर्ट में कई लोगों को आरोपी बताया। पुलिस और मजिस्ट्रियल जांच भी हुई। आरोपियों के खिलाफ अदालत में मुकदमा चला। निचली अदालत ने दारा सिंह को फांसी और एक अन्य शख्स महेंद्र हेमब्रोम को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह की सज़ा को उम्रकैद में बदला। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मामले में दोषियों ने जिस अपराध को अंजाम दिया, वो बेहद निंदनीय था।

यूपी का मोहम्मद अखलाख केस

28 सितंबर 2015 मोहम्मद अखलाख मामला- दादरी, उत्तरप्रदेश निवासी अखलाख व उसके परिवार को बीफ खाने का आरोप लगाया गया।रात्रि के समय 100 से अधिक भीड़ अखलाख के घर का दरवाजा तोड़कर अंदर घुस गई। उस समय अखलाख का परिवार सो रहा था पर नींद में ही अखलाख को बाहर घसीट के बाहर निकाला गया।इस हिंसा में अखलाख की मौत हो गयी जबकि उसका भाई घायल हो गया ।18 लोगो को इस मामले में गिरफ्तार किया गया ।फिलहाल सभी आरोपी जमानत पर है और कोर्ट में ट्रॉयल चल रहा है।


18 मार्च 2016 इम्तेयाज़ खान मामला -झारखंड में मॉब लिंचिंग की पहली घटना 18 मार्च 2016 को लातेहार ज़िले में हुई थी. यहां के बालूमाथ थाना क्षेत्र के झाबर गांव में भीड़ ने एक पशु व्यापारी मजलूम अंसारी और उनके 12 साल के सहयोगी इम्तेयाज ख़ान की पीटकर हत्या कर दी थी.इसके बाद उनकी लाशों को बरगद के एक पेड़ से फांसी से लटका दिया, ताकि लोगों के बीच दहशत पैदा की जा सके.

01 अप्रैल 2017 पहलू खान मामला- : 55 साल के पहलू खान नूंह हरियाणा निवासी अपने दो बेटों समेत अन्य चार लोगों के साथ राजस्थान के जयपुर से गाय खरीदकर लौट रहे थे। तभी अलवर में भीड़ ने उनकी पिटाई कर दी। इस घटना के दो दिन बाद यानी 3 अप्रैल को पहलू खान ने अस्पताल में ही दम तोड़ दिया।इस मामले के 6 आरोपियों को अगस्त 2019 में अलवर की निचली अदालत ने बरी कर दिया था। 13 मार्च 2020 को इस मामले से जुड़े दो नाबालिगों को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने तीन साल के लिए सुधार गृह भेजने का फैसला दिया था।

22 जून 2017 डीसीपी मोहम्मद अयूब पंडित मामला -श्रीनगर की जामा मस्जिद के बाहर तैनात डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था। हत्या के बाद उनके शव को पास ही के एक नाले में फेंक दिया था। घटना के वक्त डीएसपी पंडित पुलिस वर्दी में नहीं थे। मस्जिद के बाहर खड़े लोगों का आरोप था कि डीएसपी पंडित मस्जिद के बाहर तस्वीरें खींच रहे थे। डीएसपी पंडित की हत्या की जांच के लिए एसआईटी बनाई गई है। अभी तक 20 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस हमले के मास्टरमाइंड हिजबुल आतंकी साजिद अहमद गिल्कर को पुलिस ने 12 जुलाई 2017 को ही एनकाउंटर में मार दिया था।

29 जून 2017 अलीमुद्दीन अंसारी मामला - झारखंड के रामगढ़ के बाजार टांड़ में करीब 100 लोगों की उन्मादी भीड़ ने अलीमुद्दीन अंसारी नामक एक मांस व्यापारी को इतना पीटा कि अस्पताल पहुंचने से पहले ही उनकी मौत हो गई. भीड़ को शक था कि वे अपनी वैन में गाय का मांस ले जा रहे थे. यह घटना तब घटी, जब प्रधानमंत्री गौरक्षा के नाम पर हो रही कथित गुंडागर्दी के खिलाफ भाषण दे रहे थे.21 मार्च 2018 को रामगढ़ कोर्ट ने इस मामले के 11 अभियुक्तों को उम्रकैद की सजा सुनायी. इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई. अभी इस पर अंतिम निर्णय आना बाकी है।

भीड़ हिंसा के सबसे ज्यादा मामले झारखंड में (Sabse Jyada Bhid Hinda Kahan)

18 मई 2017 को झारखंड के सरायकेला खरसांवा जिले के राजनगर (शोभापुर) इलाक़े में शेख हलीम, शेख नईम, सिराज खान और मोहम्मद साजिद को भीड़ ने इसलिए पीटकर मार डाला, क्योंकि उन्हें शक था कि इनलोगों ने एक वैवाहिक समारोह के भोज के लिए बीफ की सप्लाई की थी।

18 मई 2017 को झारखंड के ही पूर्वी सिंहभूम ज़िले के बागबेड़ा थाना क्षेत्र में भीड़ ने बच्चा चोरी का आरोप लगाकर एक महिला समेत चार लोगों को पीटा. इसमें दो सगे भाइयों, गौरव वर्मा और विकास वर्मा की घटनास्थल पर ही मौत हो गई।


19 अगस्त 2017 को झारखंड के गढ़वा जिले के बरकोल खुर्द गांव के तेनडांड़ जंगल में भीड़ ने दस लोगों को कथित तौर पर मांस के साथ पकड़ा. उनकी पिटाई की. इनमें से रमेश मिंज नामक एक व्यक्ति की अस्पताल में मौत हो गई। इस मामले में भी ट्रायल चल रहा है।

6 सितंबर 2018 झारखंड के पलामू ज़िले के विश्रामपुर थाना क्षेत्र में तिसिबार गांव के लोगों ने तीन लोगों को चोर बताकर इतना पीटा कि इनमें से बबलू मुसहर नामक एक व्यक्ति की मौत अगली सुबह इलाज के दौरान हो गई। इस मामले के अभियुक्त भी ट्रायल से गुजर रहे हैं।

राजस्थान के अलवर में भीड़ हिंसा

20 जुलाई 2018 रकबर खान मामला- राजस्थान के अलवर जिले के रामगढ़ थानां क्षेत्र के अंतर्गत ललावंडी गांव मे 21 जुलाई 2018 को रकबर खान की बर्बर तरीके से पिटाई की गई थी। इसके बाद मॉब लीचिंग के कारण रकबर की मौत हो गई थी। इस मामले में रामगढ़ थानां पुलिस ने 49 दिन बाद में रामगढ़ के सिविल कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी थी। इस मामले में पुलिस ने जांच में जुर्म को प्रमाणित मानते हुए कोर्ट में धारा 302 का आरोपी माना था।हाल ही फरवरी 2021 में राजस्थान के अलवर जिले में रकबर मॉब लिंचिंग मामले में परिजनों ने डीजे कोर्ट में ट्रायल कोर्ट बदलने के लिए आवेदन किया है। उन्होंने न्यायाधीश पीठासीन अधिकारी से न्याय की उम्मीद नहीं होने का आरोप लगाया था।

12 मार्च 2019 झारखंड में पलामू ज़िले के ही हैदरनगर थाना क्षेत्र में कुछ लोगों ने कथित तौर पर वहां के वकील ख़ान और दानिश ख़ान की बहन से छेड़खानी की. दोनों ने इसका विरोध किया. जिसके बाद भीड़ ने उन्हें मारा जिसमें वकील ख़ान की मौक़े पर ही मौत हो गई. उनकी छाती पर लोहे की रोड से वार किया गया. पुलिस अभी इस मामले के जांच कर रही है.

17 जून 2019 तबरेज अंसारी मामला- राजधानी रांची से 130 किमी दूर सराईकेला-खरसांवा जिले के धातकीडीह गांव में भीड़ ने चोरी का आरोप लगाते हुए तबरेज अंसारी की पिटाई की। अगले दिन 18 जून को पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। इस दौरान तबीयत खराब होने से 22 जून को तबरेज की मौत हो गई। उसकी मौत के बाद एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें तबरेज की खंभे से बांधकर पिटाई की जा रही थी और उससे जबरन जय श्रीराम के नारे लगवाए जा रहे थे।18 सितंबर 2019 को 11 आरोपियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज हुआ। 10 दिसंबर को इनमें से 6 आरोपियों को जमानत मिल गई। फिलहाल, मुख्य आरोपी समेत 5 आरोपी जेल में हैं।


2020-महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं समेत तीन लोगों को सैकड़ों लोगों की भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। इस मामले में 9 नाबालिगों समेत 110 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

जून 2021 - असम (Assam) के तिनसुकिया जिले में शनिवार को एक 34 वर्षीय युवक को कथित तौर पर भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला.

जून 2021- बिहार के अररिया में रंगेहाथ चोरी करते पकड़े गए एक युवक को गांव के लोगों ने पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया। इससे पहले पिटाई से घायल चोर को जोकीहाट के पीएचसी में इलाज के लिए भर्ती भी कराया गया,लेकिन बहुत बेरहमी से पिटाई के चलते उसने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। इस मामले में पुलिस ने 18 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। घटना जोकीहाट थाना क्षेत्र के चकई गांव की बताई जाती है।

इसके अलावा भी जम्मू कश्मीर में भीड़ ने 8 हत्याएं की । राजधानी दिल्ली में 2 से अधिक हत्याएं हुई।मार्च 2021 में रांची में 2 और राजस्थान में अनेक घटनायें सामने आयी।

मोब लिंचिंग के कारण (Mob Lynching Ki Vajah)

भारत में धर्म और जाति के नाम पर होने वाली हिंसा की जड़ें काफी मज़बूत हैं। वर्तमान में लगातार बढ़ रहीं लिंचिंग की घटनाएँ अधिकांशतः असहिष्णुता और अन्य धर्म तथा जाति के प्रति घृणा का परिणाम है।

अक्सर यह कहा जाता है कि 'भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता' और शायद इसी कारण से भीड़ में मौजूद लोग सही और गलत के बीच फर्क नहीं करते हैं।

लिंचिंग में संलिप्त लोगों की गिरफ्तारी न होना देश में एक बड़ी समस्या है। यह न केवल पुलिस व्यवस्था की नाकामी को उजागर करता है, बल्कि अपराधियों को प्रोत्साहन देने का कार्य भी करता है।

यह कहा जा सकता है कि देश में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदाय के बीच अविश्वास की एक गहरी खाई है जो कि हमेशा एक-दूसरे को संशय की दृष्टि से देखने के लिये उकसाती है और मौका मिलने पर वे एक-दूसरे से बदला लेने के लिये भीड़ का इस्तेमाल करते हैं।

संवैधानिक प्रावधान (Mob Lynching K Liye Pravdhan)

भारतीय दंड संहिता (IPC) में लिंचिंग जैसी घटनाओं के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर किसी तरह का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और इन्हें धारा- 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 323 (जान बूझकर घायल करना), 147-148 (दंगा-फसाद), 149 (आज्ञा के विरुद्ध इकट्ठे होना) तथा धारा- 34 (सामान्य आशय) के तहत ही निपटाया जाता है।

भीड़ द्वारा किसी की हत्या किये जाने पर IPC की धारा 302 और 149 को मिलाकर पढ़ा जाता है और इसी तरह भीड़ द्वारा किसी की हत्या का प्रयास करने पर धारा 307 और 149 को मिलाकर पढ़ा जाता है तथा इसी के तहत कार्यवाही की जाती है।

CrPC में भी इस संबंध में कुछ स्पष्ट तौर पर नहीं कहा गया है।

राज्य सरकारों के कानून (Laws Against Mob Lynching)

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गए दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए सर्वप्रथम मणिपुर ने वर्ष 2018 में ही लिंचिंग के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया था।

2019 जून में मध्यप्रदेश में हुई मोब लिंचिंग की घटनायें रोकने के लिए विधानसभा के मानसून सत्र में प्रस्ताव पारित हुआ ।गौरक्षा के लिए ऐसा करने वाला मध्यप्रदेश पहला राज्य बना।

राजस्थान के बाद पश्चिम बंगाल ने भी लिंचिंग को रोकने के लिये एक विधेयक पारित किया। पश्चिम बंगाल के विधेयक में किसी व्यक्ति को घायल करने वालों को तीन साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा का प्रावधान है और यदि लिंचिंग से किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो मृत्युदंड या कठोर आजीवन कारावास का प्रावधान भी है।


मणिपुर, राजस्थान और पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त अब तक अन्य किसी भी राज्य ने इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की है।

निम्न में से हल अपनाने की जरूरत (Mob Lynching Solution)

अभी तक आम हत्या और भीड़ द्वारा की गई हत्या को कानून की दृष्टि में समान माना जाता है, आवश्यक है कि इन दोनों को कानून की दृष्टि से अलग-अलग परिभाषित किया जाए।

भीड़ द्वारा की गई हत्या या मॉब लिंचिंग की पहचान कर उसके लिये दहेज रोकथाम अधिनियम और पॉस्को की तरह एक सख्त और असरदायक कानून बनाया जाए।

सोशल मीडिया और इंटरनेट के प्रसार से भारत में अफवाहों के प्रसार में तेज़ी देखी गई है जिससे समस्या और भी गंभीर हो गई है। एक रिसर्च के मुताबिक, 40 फीसदी पढ़े-लिखे युवा खबर की सच्चाई को नहीं परखते और उसे अग्रसारित कर देते हैं, इस संदर्भ में व्यापक जागरूकता की आवश्यकता है।


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