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जानिए दहेज पर क्या कहता है विश्व बैंक की रिपोर्ट, पहले से बेहतर हुई है भारत की स्थिती, पढ़िए पूरी खबर

भारत में दहेज एक सच्चाई और इसका चलन शताब्दियों से हो रहा है। भारत में दहेज प्रथा का चलन हमारे देवी-देवताओं के समय से हीं चला आ रहा है।

Deepak Raj

Deepak RajPublished By Deepak Raj

Published on 5 July 2021 10:42 AM GMT

जानिए दहेज पर क्या कहता है विश्व बैंक की रिपोर्ट, पहले से बेहतर हुई है भारत की स्थिती, पढ़िए पूरी खबर
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Lucknow desk। भारत में दहेज एक सच्चाई और इसका चलन शताब्दियों से हो रहा है। भारत में दहेज प्रथा का चलन हमारे देवी-देवताओं के समय से ही देखा जा रहा है। उस वक्त भी भगवान राम के विवाह के समय राजा जनक ने माता सीता के विवाह के वक्त बहुत सारे धन और जन सीता के साथ अय़ोध्या में भेजे थे। अतः दहेज देने का चलन बहुत पहले से भारतीय संस्कृती का हिस्सा रहा है। वहीं वर्ल्ड बैंक ने ने एक शोध पत्र प्रकाशित किया है जिसमें भारत के विभिन्न प्रदेशों में दहेज को लेकर विभिन्न आयामों को लेकर गांव-गांव से लेकर शहर-शहर जाकर शोध पत्र तैयार किया है।


आपको बता दें की शोधकर्ताओं ने 1960 से लेकर 2008 तक ग्रामीण भारत में हुई 40,000 शादियों का अध्ययन किया है। उन्होंने पाया है कि 95% शादियों में दहेज दिया गया, जबकि 1961 से भारत में इसे ग़ैर-क़ानूनी घोषित किया जा चुका है। दहेज के कारण कई बार महिलओं को हाशिए पर धकेल दिया जाता है, उनके साथ घरेलू हिंसा होती है और कई बार तो मौत भी हो जाती है। दक्षिण एशिया में दहेज लेना और देना शताब्दियों पुरानी प्रथा है, जिसमें दुल्हन के परिजन पैसा, कपड़े, गहने आदि दूल्हे के परिजनों को देते हैं।

भारत की बहुसंख्यक आबादी गांव में रहती है

यह शोध भारत के 17 राज्यों पर आधारित है, जहाँ पर भारत की 96% आबादी रहती है। इसमें ग्रामीण भारत पर ही ध्यान केंद्रित किया गया है, जहाँ भारत की बहुसंख्यक आबादी रहती है।अर्थशास्त्री एस अनुकृति, निशीथ प्रकाश और सुंगोह क्वोन ने पैसे और सामान जैसे तोहफ़ों की क़ीमत की जानकारियाँ जुटाई हैं, जो शादी के दौरान दी या ली गईं।


प्रतिकात्मक फोटो सोशल मीड़िया से लिया गया है


उन्होंने 'कुल दहेज' का आकलन किया है। इसके लिए उन्होंने दुल्हन के परिवार की ओर से दूल्हे या उसके परिवार को दिए गए तोहफ़ों की रक़म और दूल्हे के परिवार से दुल्हन के परिवार को दी गई रक़म के बीच अंतर निकाला है। उन्होंने पाया कि 1975 से पहले और 2000 के बाद मुद्रा स्फ़ीति के कारण कुल दहेज का औसत 'उल्लेखनीय रूप से स्थिर' था। शोधकर्ताओं ने पाया है कि दूल्हे के परिवार ने दूल्हन के परिवार के लिए उपहारों में औसतन 5,000 रुपए ख़र्च किए।

दुल्हन के परिवार की ओर से आश्चर्यजनक रूप से दूल्हे के परिवार को दी गई तोहफ़ों की रक़म सात गुना थी, यानी यह तक़रीबन 32,000 रुपए की रक़म थी। इसका अर्थ हुआ है कि औसतन वास्तविक दहेज 27,000 रुपए के क़रीब था। दहेज में परिवार की बचत और आय का एक बड़ा हिस्सा ख़र्च होता है: 2007 में ग्रामीण भारत में कुल दहेज वार्षिक घरेलू आय का 14% था।

वर्ल्ड बैंक रिसर्च ग्रुप की अर्थशास्त्री डॉक्टर अनुकृति कहती हैं, "आय के हिस्से के रूप में, ग्रामीण भारत में औसत आय बढ़ने के साथ दहेज कम हुआ है।"वो कहती हैं, "लेकिन यह केवल एक औसत दावा है जबकि दहेज कितना बड़ा है, इसकी गणना हर परिवार की अलग-अलग आय से ही पता चल सकती है। हमें घरेलू आय या व्यय पर आँकड़े की आवश्यकता होगी, लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे पास ऐसा कोई आँकड़ा उपलब्ध नहीं है।"

भारत में शादियाँ

भारत में लगभग सभी विवाह मोनोगमस (यानी एक स्त्री से विवाह) होते हैं।

एक प्रतिशत से भी कम मामलों में तलाक़ की नौबत आती है।

वर/वधू चुनने में माता-पिता की अहम भूमिका होती है। 1960 से 2005 के बीच 90% से अधिक शादियों में माता-पिता ने अपने बच्चों के लिए जीवनसाथी चुना।

90% से अधिक जोड़े शादी के बाद पति के परिवार के साथ रहते हैं।

85% से अधिक महिलाएँ अपने गाँव से बाहर, किसी से शादी करती हैं।

78.3% शादियाँ अपने ही ज़िले में होती हैं।

Bank

भारत में साल 2008 से लेकर अब तक बहुत कुछ बदल गया है। लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि दहेज भुगतान के रुझान या पैटर्न में किसी परिवर्तन के संकेत नहीं हैं। क्योंकि आज भी शादी के बाज़ार को प्रभावित करने वाले कारकों में कोई ढाँचागत परिवर्तन नहीं आया है।

सभी धर्मों में दहेज प्रथा प्रचलित


प्रतिकात्मक फोटो सोशल मीड़िया से लिया गया है


अध्ययन में यह भी पाया गया कि भारत में सभी प्रमुख धर्मों में दहेज प्रथा प्रचलित है। दिलचस्प बात यह है कि ईसाइयों और सिखों में 'दहेज में ज़बरदस्त वृद्धि' देखी गई। इन समुदायों में हिंदुओं और मुसलमानों की तुलना में औसत दहेज में बढ़ोतरी हुई है। एक और दिलचस्प बात ये पता चली कि वक़्त के साथ अलग-अलग राज्यों में काफ़ी अंतर आया। अध्ययन में पाया गया कि दक्षिणी राज्य केरल ने 1970 के दशक से 'दहेज में बढ़ोतरी' दिखाई और हाल के वर्षों में भी वहाँ दहेज की औसत सर्वाधिक रही है। हरियाणा, पंजाब और गुजरात जैसे अन्य राज्यों में भी दहेज में बढ़ोतरी दर्ज की गई। दूसरी ओर, ओडीशा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र राज्यों में औसत दहेज में कमी आई है।

1975 के बाद देश में आई औसत गिरावट

डॉ। अनुकृति ने कहा, "राज्यों में दहेज को लेकर इस अंतर के बारे में हमारे पास निश्चित जवाब नहीं हैं। हम भविष्य के शोध में इस सवाल का पता लगाने की उम्मीद करते हैं।"जनवरी में प्रकाशित एक पेपर में, अर्थशास्त्री गौरव चिपलुणकर और जेफ़्री वीवर ने पिछली सदी में भारत में 74,000 से अधिक शादियों के आँकड़ों का इस्तेमाल करके ये बताया कि दहेज प्रथा वक़्त के साथ-साथ कैसे आगे बढ़ी है। शोधकर्ताओं ने पाया कि 1930 से 1975 के बीच शादियाँ और दहेज की पेमेंट दोगुनी बढ़ गई और दहेज का औसत वास्तविक मूल्य, तीन गुना बढ़ गया। लेकिन 1975 के बाद औसत दहेज में गिरावट आई। उन्होंने अनुमान लगाया कि 1950 और 1999 के बीच भारत में दहेज भुगतान का कुल मूल्य लगभग एक चौथाई ट्रिलियन डॉलर रहा।

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