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New Education Policy: केंद्र सरकार की शिक्षा नीति क्या है, राज्य सरकारें क्यों कर रहीं विरोध, पूरी डिटेल पढ़ें

New National Education Policy 2020 in Hindi : कई राज्य सरकारों का रवैया नई शिक्षा नीति के हक में नहीं। 34 साल बाद शिक्षा नीति में हुए बदलावों को सरकारें पूरी तरीके से मानने को तैयार नहीं है।

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Report NetworkPublished By Shivani
Updated on: 11 Aug 2021 7:36 AM GMT
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New National Education Policy 2020 in Hindi: भारत में नई शिक्षा नीति 2020 का एलान तो हो गया। मंत्रालय भी तैयार हो गया लेकिन इसे लागू करने में अड़चन आ सकती हैं। कई राज्य सरकारें केंद्र की नई शिक्षा नीति का विरोध कर रहे हैं। राज्य सरकारों का रवैया नई शिक्षा नीति के हक में नहीं। 34 साल बाद शिक्षा नीति में हुए बदलावों को सरकारें पूरी तरीके से मानने को तैयार नहीं है। सवाल हैं कि आखिर नई शिक्षा नीति क्या (What is New Education Policy in Hindi) है? ऩई शिक्षा नीति कब से लागू होगी (from when new education policy will be implemented) ? नई शिक्षा नीति का कौन से राज्य विरोध कर रहे (State Govts Against New Education Policy) हैं? इन ऩई शिक्षा नीति का विरोध क्यों हो रहा (Why Against New Education Policy) है?

राज्य सरकार ने किया विरोध (State Govt Kar rahi Education Policy Ka Virodh)

दरअसल, सरकार के तीन लैंग्वेज फार्मूले का कई राज्य सरकारों ने विरोध किया है। कुछ राज्य सरकारों ने तो इसे RSS का एजेंडा तक बताया है। साथ ही कई लोगों ने 3 लैंग्वेज फॉर्मूला को लेकर यह कहा है कि ऐसा करना राज्य सरकार के लिए बाध्य होगा, लेकिन ऐसा नहीं है। तीन लैंग्वेज फार्मूले का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि बच्चे अंग्रेजी नहीं पढ़ पाएंगे। इसमें केवल यह बात है कि 3 भाषाओं में से 2 भाषाएं भारतीय होंगी और जहां मातृभाषा में पुस्तकें उपलब्ध नहीं है वहां मातृभाषा में किताब छपने के प्रस्ताव भी दिए गए हैं।

नई शिक्षा नीति पर राज्य सरकारों का रवैया (New Education Policy Ka Virodh Kyun)

दिल्ली सरकार- केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई नई शिक्षा नीति पर दिल्‍ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि बहुत सालों से देश नई शिक्षा नीति का इंतजार कर रहा था। यह आगे की सोच रखने वाली एक नीति जरूर है, मगर इस नीति में कुछ समस्‍याएं हैं। पहली यह है कि यह पहले से चली आ रही पेरेंट्स के ऊपर फीस दबाव को तोड़ पाने में समक्ष नहीं है।

मनीष सिसोदिया ने कहा कि नर्सरी से 12वीं तक फ्री एजुकेशन होगी, कैसे होगी, इस पर भी पॉलिसी चुप है। पॉलिसी फंडिंग की कमी का रोना रो रही है। नई पॉलिसी में अर्ली चाइल्डहुड में दो मॉडल दिए गए हैं– एक आंगनवाड़ी और दूसरा प्री प्राइमरी। ऐसे में समान एजुकेशन कैसे मिलेगी?


पश्चिम बंगाल - पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने नई शिक्षा नीति को लेकर कहा कि यह संघीय ढांचे को कमजोर करती है और इसे फिलहाल राज्य में लागू नहीं किया जाएगा।130 करोड़ की आबादी वाले देश में आप सभी राज्यों की भाषाई पृष्ठभूमि और परंपराओं का ध्यान रखे बिना एक समान शिक्षा नीति लागू नहीं कर सकते।' साथ ही उन्होंने यह भी कहा- 'जो मणिपुर में लागू हो सकता है, जो पंजाब में प्रासंगिक है, हो सकता है, उसका पश्चिम बंगाल या तमिलनाडु में कोई मतलब ही नहीं होगा।'

झारखंड सरकार- नई शिक्षा नीति पर हेमंत सोरेन सरकार में शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो का कहना है कि, 'झारखंड में फिलहाल नई शिक्षा नीति लागू नहीं होगी। इस नीति की झारखंड सरकार समीक्षा करेगी' साथ ही उन्होंने बताया कि, 'नई शिक्षा नीति में त्रुटि नजर आ रही है, इसमें कई खामियां हैं, नई शिक्षा नीति की झारखंड कैबिनेट में समीक्षा होगी और इसके बाद इसे लागू करने पर विचार किया जायेगा।'

तमिलनाडु सरकार- नई शिक्षा नीति (एनईपी) में तीन भाषा के प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताते हुए मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी ने कहा कि- 'राज्य में कई दशक से दो भाषा की नीति का पालन किया जा रहा है और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा।' इस दौरान उन्होंने यह भी कहा, 'तमिलनाडु कभी केंद्र की तीन भाषा की नीति का पालन नहीं करेगा। राज्य अपनी दो भाषा (तमिल और अंग्रेजी) की नीति पर कायम रहेगा।' साथ ही कहा- 'एनईपी में तीन भाषा का फॉर्मूला दुखद और पीड़ादायी है। प्रधानमंत्री को तीन भाषा की नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए।'

छत्तीसगढ़ सरकार- नई शिक्षा नीति को लेकर छत्तीसगढ़ कांग्रेस में दो फाड़ नजर आए। इस दौरान सीएम और प्रदेश मंत्री दोनों की इस मामले पर अलग-अलग राय थी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जहां इसका विरोध कर रहे हैं, वहीं प्रदेश के मंत्री टीएस सिंहदेव ने समर्थन किया है।

सिंहदेव ने कहा कि कांग्रेस के घोषणा पत्र के वादों के अनुरूप बहुत सारे मुद्दों को केंद्र सरकार ने नई शिक्षा नीति में शामिल किया है। सिंहदेव ने ट्वीट करके कहा कि जनता से चर्चा के बाद तैयार कांग्रेस के जनघोषणा पत्र का असर केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति में दिखाई दे रहा है। इसे देखकर वास्तव में प्रसन्नता हो रही है।

वहीं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नई शिक्षा नीति लागू होने के बाद कहा था कि- 'शिक्षा को केंद्रीकृत किया जाना उचित नहीं है। संविधान के अनुसार शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, जो राज्य और केंद्र की अपनी-अपनी नीतियों से संचालित होता है।' 'मूलभूत शिक्षा में राज्य का प्रमुख योगदान होता है। इस वजह से प्रत्येक राज्य में अपनी अलग शिक्षा प्रणाली विकसित हुई है।' 'शिक्षा के लिए नीति नियम बनाने की राज्यों को अभी स्वतंत्रता है, लेकिन नई नीति द्वारा पूरी व्यवस्था को केंद्रीकृत करने का प्रयास किया जा रहा है।'


सत्ता के नक्शे पर सिकुड़ी बीजेपी की नई शिक्षा नीति पर राज्यों सरकारों का रवैया काफी अलग-थलग नजर आ रहा है। कोई किसी पहलु से दुखी तो कोई किसी नियम से नराज नजर आ रहा है। जहां एक ओर इस पर बीजेपी की सत्ता वाली राज्य सरकारे वाह-वाही की धार बांधती नजर आ रही है तो वहीं गैर बीजेपी राज्य सरकारे इस नीति पर अलग-अलग खामी और त्रुटियां निकाल कर इसका विरोध कर रही हैं।

नई शिक्षा नीति क्या है (Nai Shiksha Niti Kya Hai)

साल 1992 के बाद यानी 34 साल बाद देश में एक नई शिक्षा नीति को लागू किया गया है। इस नई शिक्षा नीति की नींव साल 2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के द्वारा उनके चुनावी घोषणा पत्र में रखी गई थी। भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में एक नवीन शिक्षा नीति बनाने का विषय लोगों के सामने रखा था। वहीं साल 2019 में मानव विकास मंत्रालय ने नई शिक्षा नीति के लिए जनता से सलाह मांगना शुरू कर दिया था। इस नीति को लागू करने से पहले इस पर गहन चर्चा की गई। कई लोगों से सुझाव लिए गए, जिसके बाद इस नीति को लागू किया गया।


नई शिक्षा नीति का लक्ष्य

नई शिक्षा नीति को लागू करने के लिए केंद्र सरकार ने 2030 का लक्ष्य रखा है। शिक्षा संविधान में समवर्ती सूची का विषय है, जिसमें राज्य और केंद्र सरकार दोनों का अधिकार होता है। इसलिए राज्य सरकार ना हीं तो इसे मानने के लिए बाध्य हैं और इसे पूरी तरह माने यह भी जरूरी नहीं है। ऐसे में शिक्षा नीति को लेकर जहां भी राज्य और केंद्र में टकराव की स्थिति होती है दोनों पक्षों को बातचीत और सहमति से इसे सुलझाने का सुझाव दिया गया है।

नई शिक्षा नीति 2020 की घोषणा के साथ ही मानव संसाधन मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय रख दिया गया है। इसके साथ ही मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को शिक्षा मंत्री के तौर पर संबोधित किया जाने लगा है।

बता दे नई शिक्षा नीति का मसौदा कई विशेषज्ञों के साथ बैठकर किया गया था। इसे पूर्व इसरो के प्रमुख के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक समिति द्वारा गठित किया गया। जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बाद में कैबिनेट ने मंजूरी दी। नई शिक्षा नीति में स्कूल शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कई बड़े बदलाव भी किए गए। इसमें शिक्षा के हर छोटे से बड़े स्तर को लेकर गहन चर्चा की गई और इसके बाद इसे लागू करने पर चर्चा हुई।

शिक्षा नीति में कब-कब हुआ बदलाव

भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्व के मुताबिक यह कहा गया है कि 6 से 14 साल तक के बच्चों के लिए अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। साल 1948 में डॉक्टर राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का गठन किया गया था। तभी से राष्ट्रीय शिक्षा नीति का निर्माण शुरू हुआ और यह अब तक 3 चरणों से गुजर चुका है।



गौरतलब है कि कोठारी आयोग की सिफारिशों पर आधारित 1968 में पहली बार महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्री काल के दौरान इसे पारित किया था। इसके बाद साल 1985 शिक्षा की चुनौती नामक एक दस्तावेज तैयार किया गया, जिसमें इस बात का जिक्र किया गया कि भारत के विभिन्न वर्गों ने अपनी शिक्षा संबंधी अलग-अलग टिप्पणियां दी है और साल 1986 में भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति का प्रारूप तैयार किया। इसी के साथ नई शिक्षा नीति 1986 को लागू किया गया।इस नीति की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें सारे देश के लिए एक समान शैक्षिक ढांचे को स्वीकार करते हुए मान्यता दी गई थी और अधिकांश राज्यों में 10 + 2 + 3 की संरचना का प्रारूप तैयार किया गया था। बता दें इसे राजीव गांधी ने जारी किया था। इस नीति में साल 1992 में पहली बार संशोधन हुआ।

क्या है 5+3+3+4...?

नई शिक्षा नीति में अहम बदलाव यही है। पहले स्कूली शिक्षा में किए गए बदलाव की बात करें तो 10 + 2 की परंपरा थी, लेकिन अब इसे खत्म कर दिया गया है और नई शिक्षा नीति में 5+3+3+4 की नीति को लागू किया गया है।

5+3+3+4 का अर्थ शैक्षणिक स्तर से है, जिसमें पांच का मतलब 3 साल प्रीस्कूल के और क्लास 1 और 2, उसके बाद 3 का मतलब क्लास 3, 4 और 5, उसके बाद 3 का मतलब क्लास 6, 7, 8 और उसके बाद के 4 का मतलब क्लास 9, 10, 11 और 12। यह बच्चों के शैक्षणिक क्लास स्तर को दर्शाते हैं। यानी अब बच्चे 6 साल की जगह 3 साल की उम्र में फॉर्मल स्कूल में जाने लगेंगे।

इससे पहले 6 साल में पहली क्लास में जाते थे। वहीं नई शिक्षा नीति लागू होने पर भी 6 साल का बच्चा ही पहली क्लास में कदम रखेगा, लेकिन पहले के तीन क्लास भी फॉर्मल एजुकेशन वाले ही माने जाएंगे। यानी प्ले स्कूल के शुरुआती शिक्षा स्तर को भी अब शिक्षा में जोड़ा जाएगा।

क्या है नई शिक्षा नीति का 3 लैंग्वेज फॉर्मूला?

स्कूल शिक्षा में एक बात को बेहद महत्वपूर्णता के साथ शामिल किया गया है और यह है भाषा का स्तर। नई शिक्षा नीति में तीन लैंग्वेज फार्मूले की बात कहीं गई है, जिसमें कक्षा 5 तक मातृभाषा/लोकल भाषा में पढ़ाई की बात की गई है। इसके साथ ही यह भी बात रखी गई है कि जहां संभव हो वहां कक्षा आठवीं तक भी इस प्रक्रिया को अपनाया जा सकता है। संस्कृत भाषा के अलावा तमिल, तेलुगू ,कन्नड़ जैसी कई भारतीय भाषाओं को भी इस फार्मूले में जगह दी गई है।

नई शिक्षा नीति में कैसे होंगे बोर्ड एग्जाम?

स्कूली शिक्षा में तीसरी और सबसे अहम बात यह है कि पिछले 10 सालों में बोर्ड एग्जाम में कई बदलाव किए गए। कभी दसवीं की परीक्षा को वैकल्पिक किया गया, तो कभी नंबर के बजाय ग्रेड्स के आधार पर शिक्षा का स्तर तय किया गया, लेकिन अब परीक्षा के तरीके में बदलाव करते हुए नई शिक्षा नीति में यह कहा गया है कि बोर्ड एग्जाम होंगे। खास बात यह है कि अब बोर्ड एग्जाम एक बार नहीं, बल्कि दो बार होंगे। नई शिक्षा नीति में परीक्षा के तरीके में बदलाव किया गया है। परीक्षा के तरीके में किए गए बदलाव का उद्देश्य छात्रों की क्षमताओं का आकलन करना है।


गौरतलब है कि इस दौरान खास बात यह है कि परीक्षाओं के अतिरिक्त राज्य सरकारें कक्षा 3, 5 और 8 में भी परीक्षाएं को करवाने के लिए गाइडलाइन बनाने का काम नई एजेंसी को सौंपा जाएगा। बता दे यह सभी एजेंसियां शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत ही काम करेंगी।

नई शिक्षा नीति कब से लागू होगी? (Nai shiksha niti kab lagu hogi)

बता दे सरकार द्वारा जारी की गई नई शिक्षा नीति को साल 2020 में लाया गया है, लेकिन इसे तुरंत लागू नहीं किया गया है। बता दे साल 2022-23 वाले सत्र से इसे बदलाव की नई शिक्षा नीति के तहत लागू करने की मंशा है।

अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट में क्या हुए हैं बदलाव?*

नई शिक्षा नीति के तहत ग्रेजुएशन में छात्र 4 साल का कोर्स पढ़ेंगे, जिसमें बीच में को छोड़ने की गुंजाइश भी नई शिक्षा नीति के तहत दी गई है। इसके मुताबिक पहले साल में को छोड़ने पर सर्टिफिकेट मिलेगा। दूसरे साल के बाद एडवांस सर्टिफिकेट मिलेगा और तीसरे साल के बाद डिग्री और 4 साल के बाद डिग्री के साथ शोध भी होगा।

नई शिक्षा नीति में IIT और NEET के लिए क्या है खास?

नई शिक्षा नीति में अंडरग्रैजुएट कोर्स में दाखिला लेने वालों के लिए नेशनल टेस्टिंग एजेंसी में परीक्षा कराने की बात भी कही गई है। इसके साथ ही रीजनल स्तर पर राज्य स्तर पर और राष्ट्रीय स्तर पर ओलंपियाड परीक्षा कराने के बारे में भी जिक्र किया गया है। साथ ही आईआईटी में प्रवेश के लिए इन परीक्षाओं को आधार बनाकर छात्रों को दाखिला देने की बात भी कही गई है।


बता दें कि मोदी सरकार की ओर से 34 साल बाद देश की नई शिक्षा नीति को पेश किया गया है। गहन चर्चा और लंबे समय तक के मंथन के बाद कई सुझाव पेश किए गए थे, जिन्हें एक कमेटी के गठन के साथ पास किया गया। इसके तहत शुरुआती वक्त में ही बच्चों को पढ़ाई के साथ प्रैक्टिकल शिक्षा, उच्च शिक्षा में रोजगार के अवसरों को पैदा करना जैसे बड़े फैसले लिए गए हैं।

Shivani

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