देवानंद:बेफिक्र अंदाज व कातिल मुस्कान पर लाखों थे फिदा, फिर भी सच्ची मोहब्बत थी उनसे जुदा

सुपरस्टार देवानंद जिनकी कातिल मुस्कान व ब्लैक ड्रेस पर ना जाने कितने दिल फिदा थे। आज ही के दिन उनका जन्म हुआ था। हिंदी फिल्मों के वे पहले ऐसे स्टार थे जिन्होंने दर्शकों को मोहब्बत की संजीदगी और रूमानियत सिखायी।

जयपुर:सुपरस्टार देवानंद जिनकी कातिल मुस्कान व ब्लैक ड्रेस पर ना जाने कितने दिल फिदा थे। आज ही के दिन उनका जन्म हुआ था। हिंदी फिल्मों के वे पहले ऐसे स्टार थे जिन्होंने दर्शकों को मोहब्बत की संजीदगी और रूमानियत सिखायी।जब भी बॉलीवुड के इतिहास में रोमांस, स्टाइल और दिलकश पर्सनालिटी का जिक्र होता है, तो देवानंद का नाम सबसे पहले लिया जाता है। 50-60 के दशक में भले ही दिलीप कुमार, राजकुमार जैसी हस्तियां अपनी धाक जमाए हुए थी, लेकिन इनमें भी सबसे ख़ास थे देवानंद साहब, उनका अंदाज ही अलग था।

उनका एक-एक डायलॉग आज भी याद किया जाता है। देवानंद का हेयर स्टाइल, ड्रेसिंग सेंस, उनकी चाल से लेकर उनके बल सब कुछ उस टाइम पर युवाओं में जबरदस्त तरके से छाया हुआ था। उनके गानें तो जैसे पुराने लोगों के लिए आज भी टॉनिक का काम करते हैं। 26 सितंबर 1923 में आज ही के दिन इस सुपरस्टार का जन्म हुआ था और हम आपको उनके बारे में कुछ ख़ास बातें बता रहे हैं।

कहते हैं कि उनकी पर्सनालिटी इतनी ज्यादा अट्रैक्टिव थी कि बॉलीवुड एक्ट्रेसेस भी उनके नाम से आहें भरती थी। ऐसा नहीं है कि केवल हसीनाएं ही देवानंद की दीवानी थी, बॉलीवुड के हैंडसम हंक देवानंद भी काफी आशिकमिजाज इंसान थे। वह भी कई एक्ट्रेसेस के आशिक रह चुके थे। देवानंद ने इंडियन सिनेमा को एक अलग मुकाम पर पहुंचाया।

देवानंद अपनी जिंदगी के अंतिम समय तक फिल्मों में सक्रिय रहे। बतौर निर्माता-निर्देशक वे सफल भले ही न हुए हों लेकिन उन्होंने अपनी सक्रियता कम नहीं की। अब देवानंद की जिंदगी पर उनके बेटे एक फिल्म भी बना रहे हैं।

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देवानंद ने कभी भी काम से भागना नहीं सीखा था, वे गम में ना तो बहुत दुखी होते थे और खुशी में ना ही बेहद उत्साहित। अपने इसी व्यवहार के कारण वे अपने अंतिम दिनों में भी काम को लेकर जुनूनी बने रहे।
देवानंद अपने आपको इंटरनल रो‍मांटिक व्यक्ति कहलाना ज्यादा पसंद करते थे। इन्होंदने रोमानियत की नई परिभाषा गढ़ी। देवानंद की नजर में मोहब्बत पाने का अहसास नहीं बल्कि मोहब्बत करने का अहसास है। यही कारण था उनकी आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ का अंतरराष्ट्रीय संस्करण भी जारी हुआ है।

देवानंद किसी भी किरदार को बहुत ही जल्दी ही प्रभावी बना देते थे यही उनके अभिनय की खासियत भी थी। देवानंद की कामयाबी के पीछे एक बहुत बड़ा हाथ था और वो था गुरूदत्ती का। इन्हीं के कारण देवानंद के अभिनय की प्रतिभा को पहचान उन्हें सम्मान दिया गया।

 

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सदाबहार एक्टर देव आनंद अक्सर सफ़ेद शर्ट के साथ काला कोट पहनते थे और उसमें वो कमाल लगते थे। ब्लैक कोट में जो भी उन्हें देखता बस देखता ही रह जाता।लड़कियों की दीवानगी उस वक्त देखने लायक होती थी। ऐसा पागलपन कि वो अपनी जान तक दांव पर लगा देती थी। धीरे-धीरे काला कोट देव आनंद के लिए परेशानी बनता जा रहा था, क्योंकि उन्हें उस कोट में देख कर लड़कियां छत से छलांग लगाने तक को तैयार थीं। इस समस्या का समाधान करने के लिए कोर्ट को बीच में आना पड़ा। देवानंद की फ़िल्म ‘काला पानी’ रिलीज़ हुई और हिट भी, तभी कोर्ट की तरफ़ से आदेश जारी करते हुआ कि उनके ब्लैक कपड़े पहनने पर बैन लगा दिया। एकतरफ जहां लड़कियां देव साहब की दीवानी थी वहीं देव साहब को भी किसी से प्यार हो गया था।  उनकी लव-स्टोरी भी बड़ी कमाल थी।देवानंद को सुरैया से प्यार था। दोनों एकदूसरे से बेहद प्यार करते थे, पर इन दोनों का प्रेम सफल नहीं हो पाया।

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एक किस्सा–कहते हैं कि देवानंद की सुरैया से पहली मुलाकात फ़िल्म ‘विद्या’ के सेट पर हुई थी। देवानंद ने अपना परिचय देते हुए कहा था, ”सब लोग मुझे देव कहते हैं। आप मुझे किस नाम से पुकारना पसंद करेंगी?” सुरैया ने हंसते हुए जवाब दिया था – ”देव.” इसके बाद उन्होंने सुरैया की आंखों में देखते हुए अपनी चार्मिंग मुस्कान बिखेरी थी।

देवानंद की सुरैया से मोहब्बत किसी रोमांटिक फिल्म से कम नहीं थी। दोनों के प्यार के बीच हिंदू-मुस्लिम की दीवार आ खड़ी हुई। इस दीवार के कारण इनकी मोहब्बत को कामयाबी नहीं मिल पाई। गौरतलब है कि, उनकी आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ में भी उनके और सुरैया के रिश्ते के बारे में कई खुलासे हुए हैं।इन दोनों ने लगभग सात फिल्मों ‘अफसर’, ‘नीली’, ‘विद्या’, ‘जीत’,‘शेर’, ‘सनम’ और ‘दो सितारे’ में साथ काम किया। हालांकि ब्रेकअप के बाद दोनों ने साथ में एक भी फिल्मों नहीं की।

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इस तरह बने स्टार
फिल्मों ‘हम एक हैं’ से बॉलीवुड में कदम रखने वाले देवानंद हमेशा से ही सदाबहार अभिनेताओं में गिने गए। बतौर अभिनेता देवानंद की सबसे अधिक चर्चित फिल्मा थी ‘गाइड’, ‘जिद्दी’, ‘काला पानी’, ‘हरे कृष्णा हरे रामा’, ‘मुनीम जी’।1946 से 2011 तक देवानंद ने सिनेमा की दुनिया में सक्रिय रहते हुए लगभग 19 फिल्मों का निर्देशन किया और अपनी 13 फिल्मों की कहानी खुद लिखी। देवानंद 40 के दशक में एक स्टाइलिश हीरो के रूप में उभरें। राजकपूर ने भी देवानंद के अभिनय को निखारने में बहुत मदद की। अशोक कुमार के कारण ही इन्हें फिल्म ‘जिद्दी’ में काम करने का मौका मिला। इसी फिल्म से इनकी कामयाबी की बुलंदियां शुरू हुई और इसके बाद तो जैसे देवानंद ने कभी पीछे मुड़कर ही नहीं देखा।

देवानंद को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड के साथ-साथ पद्मभूषण और दादा साहेब फाल्के जैसे पुरस्कारों से भी नवाजा गया। छह दशकों में देवानंद ने बॉलीवुड में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी दी।

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