Marathon surgery: 64 डॉक्टरों ने 24 घंटे में जुड़वां बहनों को किया अलग

इस कार्य को सकुशल निष्पादित करने में संस्थान के पीडियाट्रिक सर्जन डॉ देवेंद्र की  भूमिका महत्वपूर्ण बताई जाती है, जिनके अथक प्रयास से इस कोरोना महामारी के समय मे भी सभी कुशल चिकित्सको ने मानवता का परिचय देते हुए सफल सर्जरी करके दोनों बच्चो को अलग किया।

Marathon surgery के बाद दिल्ली एम्स के डॉक्टरों ने कूल्हे और पेट से जुड़ी दो जुड़वां बहनों को अलग करने में कामयाबी हासिल की है। दोनों बहनों की रीढ़ की हड्डी और पैरों की नसें भी एक थीं। देश में चिकित्सा जगह में यह इस तरह का नया रिकॉर्ड है। इस आपरेशन में एक दो नहीं पूरी 64 डॉक्टरों की टीम लगातार 24 घंटे तक जूझती रही।

आपरेशन के लिए सबसे पहले एम्स के पीडिएट्रिक्स सर्जरी, एनेस्थीसिया, पीडिएट्रिक्स कार्डियोलॉजी, रेडियोलॉजी, सीटीवीएस के अलावा रेजिडेंट डॉक्टर, नर्स व अन्य स्टाफ समेत 64 से ज्यादा लोगों की टीम बनाई गई। फिर इन्हें तीन अलग-अलग टीमों में बांटकर आठ-आठ घंटे की शिफ्ट के लिए तैयार की गई। हालांकि ऑपरेशन के दौरान पूरी टीम को एक साथ रहना था।

इन जुड़वां बच्चियों की सर्जरी शुक्रवार सुबह साढ़े आठ बजे शुरू हुई जो शनिवार सुबह 9 बजे तक अनवरत चलती रही। फिलहाल दोनों बहनें वेंटिलेटर पर हैं। बच्चियों की हालत अभी नाजुक है, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि दोनों बच्चियां जल्द स्वस्थ हो जाएंगी। इससे पहले दिल्ली एम्स के डॉक्टर सिर से जुड़े जग्गा और बलिया को अलग करने में कामयाब हुए थे। दो वर्षीय जुड़वां बच्ची पिछले डेढ़ साल से एम्स में भर्ती थी।

बहुत नाजुक थी बच्चियां

यूपी के जिला बदायूं की ये बच्चियां शारीरिक तौर पर जटिल ऑपरेशन के लिए तैयार नहीं थीं। इसलिए डॉक्टरों को सर्जरी के लिए एक लंबा वक्त लगा। एक और बड़ी बाधा थी बच्चियों की कम उम्र। इनकी कम आयु को देखते हुए इन्हें एनेस्थीसिया भी नहीं दिया जा सकता था। ऐसे में डॉक्टरों को इनके मजबूत होने का इंतजार था।

डॉक्टरों ने 3डी मॉडल पर लंबी प्रैक्टिस की। इस के बाद ऑपरेशन की योजना बनाई। इसके बाद कोविड महामारी के इस वक्त बच्चियों को नई जिंदगी देने का प्रयास शुरू हुआ। शुक्रवार को यह ऑपरेशन शुरू हुआ, जो शनिवार सुबह पूरा हो सका। एम्स के बालरोग सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ. मीनू वाजपेयी ने ऑपरेशन सफल होने की जानकारी दी। फिलहाल दोनो बच्चियां सघन निगरानी में हैं।

चुनौती दर चुनौती

ऑपरेशन में जुटी टीम उस समय हैरान रह गई जब उन्होंने देखा कि दोनों बच्चियों का कूल्हा और पेट तो जुड़ा ही था साथ ही उनकी रीढ़ की हड्डी और आंत भी आपस में जुड़े थे। दोनों की पैरों की नसें भी एक ही थीं, जिसकी वजह से नई नसें प्रत्यारोपित करना जरूरी था।

सबसे बड़ी समस्या थी रक्त संचार को बरकरार रखना। ऐसे में नई नस को एहतियात के साथ प्रत्यारोपित किया गया। अलग करने के बाद एक बच्ची को नई त्वचा देने की भी चुनौती थी। ऐसे में बच्ची की मां की भूमिका काम आई उनसे टिश्यू लेकर बच्चियों में प्रत्यारोपित किए गए।

इस कार्य को सकुशल निष्पादित करने में संस्थान के पीडियाट्रिक सर्जन डॉ देवेंद्र की  भूमिका महत्वपूर्ण बताई जाती है, जिनके अथक प्रयास से इस कोरोना महामारी के समय मे भी सभी कुशल चिकित्सको ने मानवता का परिचय देते हुए सफल सर्जरी करके दोनों बच्चो को अलग किया।