वैक्सीन पर आई ये बड़ी खबर, कूटनीति बनी एक बड़ी गेम चेंजर

भारत ने सीरम इंस्टीट्यूट द्वारा बनाई गयी कोविशील्ड वैक्सीन की खुराकें पूरे दक्षिण एशिया में बांटी हैं। 20 जनवरी को नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव और भूटान को मुफ्त कोरोना वैक्सीन की पहली खेप भेजी गयी।

Published by Roshni Khan Published: January 24, 2021 | 4:57 pm
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वैक्सीन पर आई ये बड़ी खबर, कूटनीति बनी एक बड़ी गेम चेंजर (PC: social media)

नई दिल्ली: 135 करोड़ लोगों के देश में कोरोना महामारी, लॉकडाउन फिर आर्थिक संकट से निपटने में भारत की सफलता के बाद वैक्सीन डेवलप करने उसका रोलआउट भी बहुत बड़ी सफलता है। अब इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए भारत ने वैक्सीन डिप्लोमेसी की एक नई नजीर पेश कर दी है। वैक्सीन डिप्लोमेसी में आगे बढ़ने की वैसे तो चीन ने भी बहुत कोशिश की और इंडोनेशिया, ब्राजील, मलेशिया आदि देशों में अपनी वैक्सीन के ट्रायल के बाद वैक्सीन देने का काम किया लेकिन भारत ने बिना ढिंढोरा पीटे वैक्सीन डिप्लोमेसी में अपने आपको सबसे आगे कर दिखाया है। एस्पेर्ट्स का मानना है कि आने वाले समय में भारत की वैक्सीन डिप्लोमेसी चीन के मुकाबले गेम चेंजर साबित होगी। दूसरे देशों को वैक्सीन देने में किसी भी अन्य देश ने दरियादिली नहीं दिखाई है।

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कोविशील्ड वैक्सीन की खुराकें पूरे दक्षिण एशिया में बांटी हैं

भारत ने सीरम इंस्टीट्यूट द्वारा बनाई गयी कोविशील्ड वैक्सीन की खुराकें पूरे दक्षिण एशिया में बांटी हैं। 20 जनवरी को नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव और भूटान को मुफ्त कोरोना वैक्सीन की पहली खेप भेजी गयी। इसके बाद तीन दिन के भीतर भारत ने अन्य देशों को 32 लाख खुराकें मुफ्त में दे दीं। इसके बाद दूर ब्राजील को 20 लाख खुराकें भेजीं गयीं। अब सेचेल्स, मारीशस, म्यांमार, श्रीलंका, अफगानिस्तान को वैक्सीन की खुराकें भेजी जायेंगी। ये काम यान्हीं नहीं रुकेगा। इसके बाद सऊदी अरब, मोरक्को और साउथ अफ्रिका का नंबर है। इस मुश्किल वक्त में अपने पड़ोसियों और अन्य देशों को कोरोना की वैक्सीन देने के काम की विश्व स्वास्थ्य संगठन और अमेरिका की बिडेन सरकार ने तारीफ की है।

चीन के वर्चस्व को चुनौती

दक्षिण एशियाई देशों को कोरोना वैक्सीन की लाखों खुराकें भेजने से जहाँ पड़ोसी देश से भारत को सराहना मिल रही है तो वहीं क्षेत्र में चीन की वचर्स्व वाली उपस्थिति को यह पीछे धकेल रहा है।

दरअसल दुनिया में जेनेरिक दवा का सबसे बड़ा निर्माता भारत है और पड़ोसी देशों को वैक्सीन देकर दोस्ती को मजबूत करना चाहता है। नेपाल के स्वास्थ्य मंत्री हृदयेश त्रिपाठी के मुताबिक, भारत सरकार ने वैक्सीन अनुदान करके सद्भावना दिखाई है। यह लोगों के स्तर पर हो रहा है क्योंकि जनता ही है जो कोविड-19 के कारण सबसे अधिक प्रभावित हुई है। भारत ऐसे समय में यह उदार रवैया अपना रहा है जब उसके संबंध नेपाल के साथ क्षेत्रीय विवाद के कारण तनावपूर्ण हुए। भारत की चिंता चीन की विस्तारवादी नीति को लेकर भी है। चीन नेपाल पर आर्थिक प्रभाव भी डालने की कोशिश में जुटा हुआ है। चीन ने नेपाल को कोरोना महामारी से निपटने के लिए मदद का वादा किया है, वह नेपाल द्वारा सिनोफार्म की मंजूरी के इंतजार में है।

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बांग्लादेश को चीन के सिनोवैक बायोटेक से कोरोना की वैक्सीन की 1,10,000 खुराकें मिलने वाली थीं लेकिन बांग्लादेश ने वैक्सीन का लागत मूल्य देने से इनकार कर दिया जिससे अब गतिरोध बन गया है। इसके बदले बांग्लादेश ने भारत की ओर रुख किया और तत्काल आपूर्ति की मांग की, इसी के तहत बांग्लादेश को उसे एस्ट्राजेनेका की कोविशील्ड की 20 लाख खुराकें बतौर उपहार मिल गयीं हैं। बांग्लादेश के एक स्वास्थ्य अधिकारी ने कहा है कि भारत एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन बना रहा है जो बाकियों से अलग है। इसे सामान्य रूप से रखा जा सकता है और तय तापमान में ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है जो बांग्लादेश जैसे देश के लिए सुविधाजनक है।

पर्यटन पर निर्भर ये देश मौजूदा समय में वैक्सीन के लिए बेताब हैं

श्रीलंका, नेपाल और मालदीव जैसे देशों में चीन बंदरगाहों, सड़कों और बिजली स्टेशनों के निर्माण के लिए निवेश कर रहा है। पर्यटन पर निर्भर ये देश मौजूदा समय में वैक्सीन के लिए बेताब हैं, जिससे इनकी अर्थव्यवस्था दोबारा उठ सके। ऐसे में भारत ने आगे आकर जो दरियादिली दिखाई है उससे चीन को धक्का जरूर पहुंचा है। भारत आने वाले समय में 2 करोड़ करोड़ वैक्सीन की खेप पड़ोसी देशों को मदद के तौर पर देने की योजना बना रहा है। यही नहीं, भारत इनमें से कुछ देशों में स्वास्थ्य कर्मचारियों के प्रशिक्षण और टीकाकरण अभियान के लिए बुनियादी ढांचे को तैयार करने में भी मदद कर रहा है।

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भारत के पक्ष में सबसे बड़ी बात ये है कि उसकी कोविशील्ड वैक्सीन सभी ट्रायल पूरे करके मंजूर हुई है। इस वैक्सीन के पीछे ऑक्सफ़ोर्ड-आस्ट्रा ज़ेनेका हैं और ये वैक्सीन गरीब देशों के लिहाज से सस्ती और सुगम है। इसमें फाइजर और मॉडर्ना जैसा तापमान का झंझट नहीं है।

रिपोर्ट- नीलमणि लाल

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