फटेहाल महाराजा को इसलिए बेचने पर मजबूर हुई मोदी सरकार

कर्ज में दबी एयर इंडिया को घाटे से उबारने के प्रयास विफल होने के बाद सरकार ने इसकी 100 फीसदी हिस्सेदारी बेचने के लिए 17मार्च तक बोलियां मांगी हैं।

अंशुमान तिवारी
नई दिल्ली: कर्ज में दबी एयर इंडिया को घाटे से उबारने के प्रयास विफल होने के बाद सरकार ने इसकी 100 फीसदी हिस्सेदारी बेचने के लिए 17मार्च तक बोलियां मांगी हैं।

एयर इंडिया पर कुल 60,074 करोड़ रुपए का कर्ज है मगर खरीदार को सिर्फ 23,286.5 करोड़ रुपए के कर्ज की जिम्मेदारी लेनी होगी। सरकार ने बिडिंग के दस्तावेज जारी कर दिए हैं और योग्य बोलीदाताओं की जानकारी 31 मार्च को दी जाएगी।

बोली की शर्तों के मुताबिक खरीदार को एयर इंडिया का मैनेजमेंट कंट्रोल भी सौंप दिया जाएगा। बीडिंग दस्तावेजों के मुताबिक एयर इंडिया एक्सप्रेस के भी 100 फीसदी शेयर बेचे जाएंगे। यह एयर इंडिया की सब्सिडियरी है, जो सस्ती उड़ानों का संचालन करती है।

वैसे एयर इंडिया को बेचने की यह दूसरी कोशिश है। दो साल पहले भी सरकार ने 73 फीसदी हिस्सेदारी बेचने के लिए बोलियां मांगी थी मगर कई खरीदार नहीं मिला। यही कारण है कि सरकार ने इस बार एयर इंडिया की बिक्री की शर्तों को आसान किया है।

अश्विनी लोहानी को फरवरी 2019 में इस मकसद से एयर इंडिया की कमान सौंपी गई थी कि डूब रही एयर इंडिया का बेड़ा पार लगाएंगे, लेकिन वह असफल रहे। यही कारण है कि सरकार लगातार घाटे में चल रही एयर इंडिया को बेचने पर मजबूर हो गई है।

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2001 के बाद नहीं हुआ मुनाफा

सन 2000 तक मुनाफे में चलने वाली सरकारी एयर इंडिया 2001 में जब पटरी से उतरी तो उसके बाद कोई साल ऐसा नहीं रहा जब इसे मुनाफा हुआ हो। पिछले 19 साल के दौरान तो एयर इंडिया की हालत बिल्कुल खस्ता हो चुकी है और आज स्थिति यह हो गई है कि इस पर कर्ज बढ़ते-बढ़ते करीब 58 हजार करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका है। हालत यह हो गई है कि घाटे से बेहाल महाराजा अब फटेहाल हो गए हैं। आज यहां काम करने वाले वेतन तक के मोहताज हो गए हैं।

सरकार ने टाटा से खरीदी थी कंपनी

सरकार ने 1953 में इस विमानन कंपनी को खरीदा था और इस तरह इस कंपनी का सफर 66 साल का हो चुका है। वैसे एयर इंडिया को सरकार ने शुरू नहीं किया था। इसकी शुरुआत दिग्गज उद्योगपति जेआरडी टाटा ने 1932 में टाटा एयरलाइंस के रूप में की थी।

1946में इसका नाम बदलकर एयर इंडिया कर दिया गया और 1953 में सरकार ने इसे टाटा से खरीद लिया था। 1953 के बाद लगातार यह सरकारी एयरलाइन मुनाफे में चलती रही और यह सिलसिला 2000 तक चला।

उसके बाद इस सरकारी एयरलाइन को न जाने कैसी जंग लगी कि घाटे का सिलसिला शुरू हो गया। 2001 में पहली बार इसे 57 करोड़ का घाटा लगा। उस समय इतने कम घाटे को ही बड़ा झटका माना गया था और इसके लिए विमानन मंत्रालय ने तत्कालीन प्रबंध निदेशक माइकल मास्केयरनहास को दोषी मानते हुए पद से हटा दिया था।

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2007 से हालत ज्यादा खराब

2001 के बाद लगातार इस सरकारी एयरलाइन को घाटे का झटका लगता रहा मगर 2007 से इसकी हालत ज्यादा खराब होने लगी। 2007 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने एयर इंडिया में इंडियन एयरलाइंस का विलय किया था।

दोनों कंपनियों का विलय के वक्त संयुक्त घाटा 770 करोड़ रुपये था, जो विलय के बाद बढक़र 7200 करोड़ रुपये हो गया। घाटे में लगातार बढ़ोतरी होने के बाद सरकार ने एसबीआई को रिकवरी के लिए अधिकृत किया था। एयर इंडिया ने घाटे की भरपाई के लिए अपने तीन एयरबस 300 और एक बोइंग 747-300 को 2009 में बेच दिया था। इसके बाद भी इस सरकारी एयरलाइन की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। मार्च 2011 में कंपनी का कर्ज बढक़र के 42600 करोड़ रुपये और परिचालन घाटा 22000 करोड़ रुपये का हुआ था।

बकाये के भुगतान का भी पैसा नहीं

अब तो इस एयरलाइन की हालत चिंतनीय स्थिति में पहुंच चुकी है। करीब 58 हजार करोड़ तक के कर्ज में दबी एयर इंडिया को 2018-19 में 8400 करोड़ रुपये का भारी घाटा हुआ है। एयर इंडिया को ज्यादा ऑपरेटिंग कॉस्ट और विदेशी मुद्रा में घाटे के चलते भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है।

हालत यह हो गई है कि इन हालातों में एयर इंडिया तेल कंपनियों को ईंधन का बकाया तक नहीं दे पा रही है। बकाया न देने के कारण हाल ही में तेल कंपनियों ने ईंधन सप्लाई रोकने तक की भी धमकी दे दी थी।

लेकिन फिर सरकार के हस्तक्षेप से ईंधन की सप्लाई दोबारा शुरू की जा सकी थी। घाटे के लगातार बढ़ते बोझ के कारण अब केंद्र सरकार एयर इंडिया में अपनी 100 फीसदी हिस्सेदारी को बेचने जा रही है।

स्टाफ ने दी इस्तीफे की धमकी

अब स्थिति ऐसी हो गई है कि कंपनी में काम करने वाले कर्मचारियों को भी समय पर वेतन नहीं मिल रहा है। ऐसे में पायलटों सहित केबिन क्रू और इंजीनियरिंग स्टाफ ने भी नौकरी से इस्तीफा देने की धमकी दी है।

एयर इंडिया को एक महीने में 300 करोड़ रुपये कर्मचारियों को वेतन के रूप में देने होते हैं। घाटे के कारण कर्मचारियों को वेतन समय पर नहीं मिल पा रहा है। इस वित्त वर्ष एयर इंडिया 1000 करोड़ रुपये के कर्ज का भुगतान करने पर काम कर रही है। इसके लिए कंपनी ने सरकार से मदद मांगी है। हालांकि उसके स्वीकार होने की संभावना कम है।

तीन सालों के दौरान एयर इंडिया का घाटा सबसे शीर्ष पर रहा। कंपनी की नेटवर्थ माइनस में 24,893 करोड़ रुपये रही, वहीं नुकसान 53,914 करोड़ रुपये का रहा। भारी उद्योग मंत्री अरविंद गणपत सावंत का कहना है कि पीएसयू विभाग ने इस सरकारी एयरलाइन के रिवाइवल और रिस्ट्रक्चरिंग पर जोर दिया है। सरकार अपनी तरफ से ऐसी कंपनियों में फिर से पैसा कमाने के नए तरीकों पर काम कर रही है।

खरीदने वाले को होंगे ये फायदे

अब केन्द्र सरकार इस सरकारी एयरलाइन में अपनी सौ फीसदी हिस्सेदारी बेचने जा रही है। इस विमानन कंपनी को खरीदने वाले को कई फायदे भी होंगे। यदि कोई निवेशक इस विमानन कंपनी को खरीदता है तो उसे बना बनाया बाजार मिलेगा।

साथ ही उसे घरेलू स्तर पर उड़ान के लिए जरूरतों की पूर्ति भी आसानी से पूरी हो जाएगी। एयर इंडिया के पास 118 एयरक्राफ्ट है और एयर इंडिया का बेड़ा इंडिगो के बाद दूसरे नंबर पर है। इसलिए इसे प्रोफेशनल अंदाज में चलाने वाला इसे पटरी पर लाने में कामयाब हो सकता है।

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