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Bhartiya Sansad Ki Takat: भारतीय संसद की असली शक्तियां क्या हैं, आखिर किन विवादों ने संसद को झकझोर दिया

Indian Parliament Members Powers: भारतीय संसद द्विसदनीय है, जिसका अर्थ है कि इसमें दो सदन हैं: राज्यसभा और लोकसभा। आइए जानते हैं इनकी प्रमुख शक्तियां और विवाद।

Akshita Pidiha
Written By Akshita Pidiha
Published on: 2 April 2025 3:51 PM IST
Bhartiya Sansad Ki Takat
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Bhartiya Sansad Ki Takat (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

Indian Parliament Powers: 1954 में, 'राज्यसभा' और 'लोकसभा' नाम क्रमशः राज्यों की परिषद और लोक सभा को संदर्भित करने के लिए अपनाए गए थे। राज्यसभा उच्च सदन है और लोकसभा निम्न सदन है। राज्यसभा भारतीय संघ के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि लोकसभा पूरे भारत के लोगों का प्रतिनिधित्व करती है।

भारत का राष्ट्रपति संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता है और संसद की बैठकों में भाग लेने के लिए संसद में नहीं बैठता है। लेकिन वह संसद का अभिन्न अंग होता है।

भारतीय संसद द्विसदनीय क्यों है?

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

भारतीय संसद द्विसदनीय है, जिसका अर्थ है कि इसमें दो सदन हैं: राज्यसभा और लोकसभा। इसके कई महत्वपूर्ण कारण हैं:-

ऐतिहासिक कारण - भारत में द्विसदनीय विधायिका की अवधारणा ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू की गई थी। 1947 में स्वतंत्रता के बाद, संविधान निर्माताओं ने इस प्रणाली को बरकरार रखा।

राजनीतिक कारण - राज्यसभा केंद्र के अनुचित हस्तक्षेप के खिलाफ राज्यों के हितों की रक्षा करके संघीय संतुलन बनाए रखती है।

व्यावहारिक कारण - देश के विशाल आकार और विविधता के कारण एक ही सदन के लिए सभी हितों और दृष्टिकोणों का प्रतिनिधित्व करना कठिन हो जाता है।

विशेषज्ञता और अनुभव - राज्यसभा में प्रतिष्ठित पेशेवरों और विशेषज्ञों को स्थान मिलता है, जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा नामित किया जाता है।

लोकसभा और राज्यसभा की शक्तियां

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

समान शक्तियां

साधारण विधेयकों, संविधान संशोधन विधेयकों का प्रस्तुतीकरण एवं पारित करना।राष्ट्रपति का चुनाव और महाभियोग प्रक्रिया।न्यायपालिका के उच्च पदों पर नियुक्ति और हटाने की सिफारिश करना। राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेशों को मंजूरी देना। आपातकालीन स्थितियों की घोषणा पर सहमति देना। प्रधानमंत्री और मंत्रियों का चयन करना। संवैधानिक निकायों की रिपोर्टों पर विचार करना।

लोकसभा की विशेष शक्तियां:

धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। लोकसभा अध्यक्ष धन विधेयक होने या न होने का अंतिम निर्णय लेता है। राज्यसभा धन विधेयक को अस्वीकार नहीं कर सकती, केवल 14 दिनों तक रोक सकती है। बजट पर केवल लोकसभा में मतदान किया जा सकता है। अविश्वास प्रस्ताव केवल लोकसभा में लाया जा सकता है। राष्ट्रीय आपातकाल को समाप्त करने का प्रस्ताव केवल लोकसभा में लाया जा सकता है।

राज्यसभा की विशेष शक्तियां:

अनुच्छेद 249 - संसद को राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार देता है।

अनुच्छेद 312 - नई अखिल भारतीय सेवाएं बनाने का अधिकार देता है।

अनुच्छेद 67 - उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव केवल राज्यसभा में पेश किया जा सकता है।

आपातकालीन स्थितियों में भूमिका - जब लोकसभा भंग हो, तो केवल राज्यसभा द्वारा स्वीकृत आपातकाल प्रभावी रह सकता है।

राज्यसभा की आलोचनाएँ:

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

पुनरीक्षण कक्ष मात्र - यह केवल लोकसभा द्वारा प्रस्तावित विधेयकों की समीक्षा और संशोधन करता है।

राज्यों का असमान प्रतिनिधित्व - उच्च सदनों में समान प्रतिनिधित्व नहीं है, जैसा कि अमेरिका में होता है।

राज्यसभा को दरकिनार करना - कुछ मामलों में, इसे नजरअंदाज कर धन विधेयकों को पारित किया जाता है।

अलोकतांत्रिक पहलू - मनोनीत सदस्य चुनाव नहीं लड़ते फिर भी मंत्री बन सकते हैं।

अधिवास आवश्यकता समाप्त - पहले राज्यसभा के लिए राज्य के निवासी होना अनिवार्य था, लेकिन अब यह समाप्त कर दिया गया है।

राज्यसभा की प्रासंगिकता:

जल्दबाजी में बनाए गए कानूनों की रोकथाम - यह जल्दबाजी में पारित विधेयकों की समीक्षा करता है।

क्षेत्रीय दलों को प्रतिनिधित्व - छोटे दलों को भी अपनी आवाज रखने का अवसर मिलता है।

संघीय संरचना को बनाए रखना - राज्यों के हितों की रक्षा करता है।

स्थायी निकाय - लोकसभा के विपरीत, राज्यसभा कभी भंग नहीं होती।

समीक्षा और पुनर्मूल्यांकन - लोकसभा की पूरक भूमिका निभाती है।

नियंत्रण और संतुलन - लोकसभा की लोकलुभावन नीतियों को संतुलित करती है।

राज्य विधान परिषद बनाम राज्यसभा:

संघीय प्रतिनिधित्व - राज्यसभा संघीय व्यवस्था का अंग है, जबकि विधान परिषद नहीं।

संरचना - राज्यसभा का गठन अधिक संगठित और समरूप होता है।

विलंबकारी भूमिका - विधान परिषद का मुख्य कार्य केवल विधेयकों में देरी करना है।

लोकसभा और राज्यसभा के कुछ प्रसिद्ध विवाद

भारतीय संसद में लोकसभा और राज्यसभा के भीतर कई महत्वपूर्ण और विवादास्पद घटनाएँ घटी हैं। ये विवाद कभी विधेयकों को लेकर हुए, कभी सांसदों के व्यवहार को लेकर, तो कभी राजनीतिक असहमति के कारण। यहाँ कुछ प्रमुख विवादों का विवरण दिया गया है:

1. संसद में कैश फॉर वोट (2008)- 22 जुलाई 2008 को मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के दौरान तीन भाजपा सांसदों ने लोकसभा में नोटों के बंडल लहराए। उन्होंने आरोप लगाया कि संप्रग सरकार ने सांसदों को पैसे देकर वोट खरीदने की कोशिश की। इस घटना के बाद संसद की कार्यवाही बाधित हो गई और मामले की जांच के लिए समिति बनाई गई। यह घटना भारतीय संसदीय राजनीति में एक बड़े घोटाले के रूप में देखी गई। हालांकि, 2011 में अदालत ने सबूतों की कमी के कारण सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

2. इंदिरा गांधी की सदस्यता रद्द (1975)- 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया और उनकी संसद सदस्यता रद्द कर दी। उन पर चुनावी धांधली और सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग करने का आरोप था। इस फैसले के बाद इंदिरा गांधी ने आपातकाल (Emergency) की घोषणा कर दी और प्रेस एवं विपक्ष पर सख्त प्रतिबंध लगा दिए। आपातकाल (1975-77) के दौरान संसद में कोई ठोस बहस या असहमति की गुंजाइश नहीं रही। 1977 में जब चुनाव हुए, तो जनता पार्टी ने इंदिरा गांधी को हराकर सत्ता हासिल की।

3. संसद पर आतंकवादी हमला (2001)- 13 दिसंबर 2001 को आतंकवादियों ने भारतीय संसद पर हमला कर दिया। पांच आतंकवादी संसद भवन में घुस गए और सुरक्षाकर्मियों पर गोलियां बरसाने लगे। इस हमले में 9 लोग मारे गए, जबकि सभी आतंकवादी भी मारे गए। इस हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव काफी बढ़ गया। संसद में इस हमले की चर्चा हुई और आतंकवाद के खिलाफ सख्त क़ानून POTA (Prevention of Terrorism Act) लागू किया गया।

4. सांसदों की खरीद-फरोख्त (झारखंड मुक़्ति मोर्चा घूस कांड - 1993)- 1993 में पीवी नरसिंह राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया।सरकार को बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के 4 सांसदों को रिश्वत देने का आरोप लगा। बाद में इस मामले में कई सांसदों को जेल हुई, लेकिन नरसिंह राव को कोई सजा नहीं हुई। इस मामले के बाद सांसदों की खरीद-फरोख्त को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सांसदों को रिश्वत लेना अपराध है, लेकिन संसद में दिया गया वोट न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आता।

5. महिला आरक्षण विधेयक पर हंगामा (2010)- 2010 में राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक (33% सीटें महिलाओं के लिए) लाने का प्रस्ताव रखा गया।समाजवादी पार्टी (SP) और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के सांसदों ने इसका विरोध किया.विरोध इतना बढ़ गया कि सांसदों ने माइक तोड़ दिए और कागज फाड़कर फेंके।राज्यसभा में विधेयक पास हो गया, लेकिन लोकसभा में इसे पेश ही नहीं किया जा सका।2023 में इसे नया स्वरूप (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) देकर संसद में फिर से पास किया गया।

6. अनुच्छेद 370 हटाने पर विवाद (2019)- 5 अगस्त 2019 को सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का प्रस्ताव रखा।विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि यह निर्णय जम्मू-कश्मीर की जनता की सहमति के बिना लिया गया।राज्यसभा और लोकसभा में इस मुद्दे पर जोरदार बहस हुई, कांग्रेस और अन्य दलों ने सरकार का विरोध किया।संसद ने बहुमत से अनुच्छेद 370 हटाने का समर्थन किया। इसके बाद जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों (J&K और लद्दाख) में विभाजित कर दिया गया।

7. अग्निपथ योजना पर हंगामा (2022)- सरकार ने अग्निपथ योजना के तहत सेना में नई भर्ती प्रक्रिया शुरू की, जिसमें चार साल की सेवा के बाद अधिकांश सैनिकों को सेवानिवृत्त कर दिया जाएगा।विपक्ष ने कहा कि यह योजना युवाओं के भविष्य को बर्बाद कर देगी।संसद में इस पर हंगामा हुआ और कई सांसदों को निलंबित कर दिया गया।सरकार ने योजना में कुछ संशोधन किए, लेकिन इसे लागू किया गया।

8. राज्यसभा में पेगासस जासूसी विवाद (2021)- 2021 में खुलासा हुआ कि सरकार ने पत्रकारों, नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के फोन की जासूसी करने के लिए पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल किया। राज्यसभा में इस मुद्दे पर जमकर हंगामा हुआ और विपक्ष ने गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग की। संसद में कोई ठोस चर्चा नहीं हो सकी और सरकार ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए एक समिति बनाई।

भारतीय संसद में लोकसभा और राज्यसभा में कई बार बड़े विवाद हुए हैं। इन विवादों के कारण कभी सरकारें गिरीं, कभी नीतियां बदलीं, और कभी सांसदों पर कार्रवाई हुई। संसद में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन कई बार यह बहस हिंसा और हंगामे में बदल जाती है, जिससे संसदीय गरिमा प्रभावित होती है।

भारतीय संसद की द्विसदनीय व्यवस्था संतुलन, समीक्षा और संघीय संरचना को मजबूत करने के लिए बनाई गई है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके।

भारतीय संसद में विभिन्न दलों के सांसदों की संख्या और लोकसभा तथा राज्यसभा में पक्ष-विपक्ष की स्थिति को समझना महत्वपूर्ण है। नीचे दिए गए आंकड़े वर्तमान समय के अनुसार प्रस्तुत किए गए हैं:-

लोकसभा में दलों के सांसदों की संख्या:

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा): 240 सांसद

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस): 99 सांसद

समाजवादी पार्टी (सपा): 37 सांसद

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी): 29 सांसद

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके): 22 सांसद

तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी): 16 सांसद

जनता दल (यूनाइटेड) [जद(यू)]: 12 सांसद

अन्य दल एवं निर्दलीय: शेष सांसद

राज्यसभा में दलों के सांसदों की संख्या:

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा): 98 सांसद

कांग्रेस: 27 सांसद

अन्य विपक्षी दल: 58 सांसद

एनडीए के सहयोगी दल: 17 सांसद

मनोनीत सदस्य: 6 सांसद

संसद में पक्ष और विपक्ष की स्थिति:

लोकसभा में: सत्तारूढ़ गठबंधन (एनडीए): 294 सांसद, विपक्षी गठबंधन (इंडिया ब्लॉक): 233 सांसद, अन्य: 15 सांसद।

राज्यसभा में: एनडीए: 115 सांसद, विपक्ष: 85 सांसद, अन्य: 36 सांसद।

इन आंकड़ों के आधार पर, भारतीय संसद में विभिन्न दलों की स्थिति स्पष्ट होती है। यह जानकारी संसद की वर्तमान संरचना और राजनीतिक संतुलन को समझने में सहायक है।

Admin 2

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