जन्मदिन विशेषः पत्रकार गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ ने मानहानि के केस में 7 महीनें काटी थी जेल

लखनऊ: आज के राजनीतिक गलियारों में चाहे कोई भी कितनी अफवाह फैलाये लेकिन सभी जानते है कि आजादी की शुरुआती लड़ाई में हिंदू और मुसलमान दोनों ही साथ थे। ये किसी एक मज़हब की नहीं बल्कि पूरे मुल्क की लड़ाई थी। अंग्रेज मुल्क के लोगों की भावनाओं से खेल रहे थे।

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धार्मिक भावनाएं भड़काईं जा रही थी। वो खेल शुरू हो गया था, जो नहीं होना चाहिए था। बंगाल विभाजन के रूप में पहला धमाका देखने को मिला चुका था। सन् 1920 के  आते-आते उन्माद बहुत बढ़ गया था। दंगे होने लगे थे। पूरा देश सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में था। इस हंगामें से एक पत्रकार बेहद परेशान था।

जो ये सब बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था और निकल पड़ा झोला उठाकर दंगीली गलियों में अमन का पैगाम लेकर। ये पत्रकार थे लेखनी के धनी गणेश शंकर विद्यार्थी। आज उसी महान साहित्यकार और पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्मदिन है।

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गणेश शंकर ’विद्यार्थी’ का जन्म 26 अक्टूबर 1890 को अपने ननिहाल अतरसुइया,इलाहाबाद में हुआ था। नाना सूरज प्रसाद श्रीवास्तव के सहायक जेलर होने के कारण अनुशासन उन्हें विरासत में मिला।

गणेश शंकर के नामकरण के पीछे एक रोचक वाक्या है- उनकी नानी ने सपने में अपनी पुत्री गोमती देवी के हाथ गणेश जी की प्रतिमा दी थी, तभी से उन्होंने यह माना था कि यदि गोमती देवी का कोई पुत्र होगा तो उसका नामकरण गणेश शंकर किया जायेगा।

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फतेहपुर जनपद के हथगाँव क्षेत्र के निवासी गणेश शंकर के पिता मुंशी जयनारायण श्रीवास्तव ग्वालियर राज्य में मुंगावली नामक स्थान पर अध्यापक थे। किताबें पढ़ने के शौक के कारण उनके दोस्त उन्हें ’विद्यार्थी’ कहते थे। बाद में उन्होंने यह उपनाम अपने नाम के साथ लिखना आरम्भ कर दिया था। विद्यार्थी जी उर्दू, फ़ारसी एवं अंग्रेज़ी के अच्छे जानकार थे।

विद्यार्थीजी की पत्रकारिता की शुरूआत

महज 16 साल की उम्र में ही विद्यार्थी ने गांधीजी से प्रभावित होकर किताब लिख डाली थी। किताब का नाम का था ‘आत्मोसर्गता’। सन् 1911 में हंस पत्रिका में एक शीर्षक लेख छपा था जिसका नाम भी ‘आत्मोसर्गता’ था। प्रताप अखबार की शुरुआत विद्यार्थी जी ने 9 नवंबर, 1913 में की थी।

विद्यार्थी जी के जेल जाने के बाद प्रताप का संपादन माखनलाल चतुर्वेदी और बालकृष्ण शर्मा नवीन जैसे बड़े साहित्यकारों ने किया। ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ गीत जो श्याम लाल गुप्त पार्षद ने लिखा था उसे भी 13 अप्रैल 1924 से जलियांवाला की बरसी पर विद्यार्थी ने गाया जाना शुरू करवाया था। ये विद्यार्थी जी के अखबार ’प्रताप’ का प्रताप था जो  तमाम महापुरुषों को आकृष्ट करता था। 1916 में लखनऊ कांग्रेस के बाद महात्मा गाँधी और लोकमान्य तिलक तो इक्के पर बैठकर प्रताप के प्रेस आये और वहाँ दो दिन तक रहे।

मानहानि के केस में 7 महीने तक जेल में रहे

गणेश शंकर विद्यार्थी अपनी पूरी जिंदगी में 5 बार जेल गए थे। 1922 में विद्यार्थी जी को आखिरी बार मानहानि के केस में जेल हुई थी । जेल में उन्हें इस बार लिखने के लिए एक डायरी भी मिली थी। विद्यार्थी जी ने जनवरी, 1921 में अपने अखबार में रायबरेली के एक ताल्लुकदार सरदार वीरपाल सिंह के खिलाफ एक रिपोर्ट छापी थी।

वीरपाल ने किसानों पर गोली चलावाई थी और उसका पूरा ब्यौरा प्रताप में छापा गया था। इसलिए प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी और छापने वाले शिवनारायण मिश्र पर मानहानि का मुकदमा हो गया था। इस मुकदमें को लड़ने में उनके 30 हजार रुपये तक खर्च हो गए थे।

इस घटना के बाद से प्रताप फेमस हो गया था। खासकर किसान विद्यार्थी जी को पहचानने लगे थे। उनको लोग प्रताप बाबा कहते थे। इसी दौरान उन पर केस चला, गवाही हुई। गवाह के रूप में इस केस में मोतीलाल नेहरू और जवाहर लाल नेहरू भी पेश हुए थे और सारी गवाही होने के बाद फैसला ताल्लुकदार के पक्ष में गया। दोनों लोगों पर दो-दो केस थे। सज़ा में दोनों लोगों को 3-3 महीने की कैद हुई थी और साथ ही साथ पांच-पांच सौ रुपये का जुर्माना लगाया गया था।

अंग्रेज भी प्रताप अखबार से परेशान थे। इसलिए मौके को भांपते ही अंग्रेजों ने प्रताप को लपेटे में लेते हुए संपादक और छापने वाले दोनों से पांच-पांच हजार का मुचलका और 10-10 हजार की जमानतें मांग ली। मुकदमे के दौरान ये उनको करना ही पड़ा, वरना गोलीकांड का पूरा खुलासा न हो पाता। फैसला आने पर विद्यार्थीजी जेल चले गए पर छपाई वाले मिश्रजी दिल की बीमारी के कारण नहीं गए।

7 महीने से अधिक विद्यार्थीजी जेल में रहे। 16 अक्टूबर, 1921 को उन्होंने खुद इसके बाद कानपुर में गिरफ्तारी दी। 10 दिन कानपुर जेल में रहे और फिर लखनऊ भेज दिए गए। अपनी डायरी में उन्होंने जनवरी के अंतिम से लेकर मई के बीत तक की जेल यात्रा के बारे में सारे किस्से लिख डालें। ये डायरी जेल जीवन झलक के नाम से छपी ये सीरिज़ काफी चर्चित रही।

दंगे रोकते-रोकते हुई थी मौत

1931 का वक्त था। पूरा कानपुर दंगे की गिरफ्त में था। मजहब पर लड़ने वालों के खिलाफ जिंदगी भर गणेश शंकर विद्यार्थी लड़ते रहे थे और वही मार-काट अब उनके आस-पास हो रही थी। इंसानियत पर मज़हब हावी था। गणेश शंकर विद्यार्थी से रहा न गया और वो निकल पड़े दंगे रोकने के लिये।

कई जगह पर उन्होंने लोगों को तो समझा दिया पर एक जगह वो दंगाइयों की भीड़ में फंस गये। ये दंगाई उन्हें पहचानते नहीं थे। बहुत खोजनें के बाद उनकी लाश एक अस्पताल की लाशों के ढेर में पड़ी हुई मिली। लाश इतनी फूल गई थी कि उसको लोग पहचान भी नहीं पा रहे थे। 29 मार्च को उनको अंतिम विदाई दी गई। ये बताता है कि जितनी तेज उनकी कलम थी उतने ही सचेत वो वास्तविक जिंदगी में भी थे।