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भाजपा की मुश्किलें बढ़ीं, उपचुनावों में कांग्रेस के हाथों मिली करारी हार

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NewstrackBy Newstrack

Published on 9 Feb 2018 6:32 AM GMT

भाजपा की मुश्किलें बढ़ीं, उपचुनावों में कांग्रेस के हाथों मिली करारी हार
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जयपुर: पिछले विधानसभा चुनावों में 200 में से 163 सीटों के रिकॉर्ड बहुमत से राजस्थान में सत्ता में आने वाली भाजपा ने शायद ही कभी सोचा होगा कि अगले चुनाव आते-आते उसको ऐसे दिन देखने को मिलेंगे। राजस्थान में भाजपा इस समय शायद अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। पिछले दिनों अलवर और अजमेर की दो लोकसभा और मांडलगढ़ की विधानसभा सीट के लिए उप चुनाव हुए।

यह तीनों ही सीटें भाजपा के पास थीं, लेकिन उपचुनावों में उसे तीनों पर ही कांग्रेस के हाथों मात खानी पड़ी। यही नहीं, इन चुनावों में मतदाता ने भाजपा को हराया ही नहीं बल्कि उसका पूरी तरह से सफाया कर दिया। दो लोकसभा क्षेत्रों में आने वाली 16 विधानसभा सीटों और मांडलगढ की विधानसभा सीट को मिलाकर कुल 17 विधानसभा क्षेत्रों में वोट पड़े थे, लेकिन भाजपा एक भी सीट पर बढ़त बनाने में नाकाम रही। यही नहीं, प्रत्येक सीट पर उसके पिछडऩे का अंतर भी बड़ा रहा। राजस्थान विधानसभा चुनाव इस साल नवंबर में होने हैं, ऐसे में उपचुनावों के ऐसे रिजल्ट भाजपा को निश्चित ही परेशानी में डाले हुए हैं।

उप चुनावों के नतीजे आने के बाद भाजपा अपनी हार का ठीकरा दूसरों के माथे पर फोड़ती नजर आ रही है। नतीजों के आने के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी महासचिव भूपेंद्र याादव, जो राजस्थान के ही हैं, और दूसरे नेताओं से फीडबैक लिया। चर्चा चली की राजस्थान में पार्टी संगठन में बदलाव किया जाएगा। प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी की जगह केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल को संगठन की कमान सौंपी जाएगी। लेकिन, इसके बाद कहीं कोई हलचल नजर नहीं आई। अशोक परनामी वसुंधरा राजे के खास है, ऐसे में उनको बदलना पार्टी के लिए आसान काम नहीं होगा। वहीं, कुछ आवाजें राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को बदलने की भी उठीं, लेकिन केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने इसकी संभावना को खारिज करते हुए इस पर भी पूर्ण विराम लगा दिया।

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पिछले करीब डेढ़ दशक से राजस्थान भाजपा की कमान वसुंधरा राजे के हाथों में है। राजे को राजस्थान में 2003 और 2014 के दो विधानसभा चुनावों में पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा को सरकार में लाने का श्रेय है। प्रदेश में राजे द्वारा कमान संभालने के बाद उनके कद को भाजपा का कोई नेता नहीं छू सका है। लेकिन एक तरफ जहां वसुंधरा राजस्थान में भाजपा का ‘एसेट’ हैं तो वहीं उनकी कार्यशैली के कारण भाजपा संकट में भी रहती आई है। वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री के रूप में दोनों ही टर्म में उनकी कार्यशैली और सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार बड़े मुद्दे रहे हैं। इस बार भी भाजपा की हालत के लिए भी कमोबेश इन्हीं वजहों को गिनाया जा रहा है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी के दूसरे आला नेताओं के साथ भी वसुंधरा के कोई मधुर संबंध नहीं रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद भाजपा वसुंधरा पर हाथ डालने से बचती रही है। पार्टी को सबसे बड़ा खतरा यह है कि वसुंधरा राजे को बदलने पर वो राजस्थान में बगावत कर सकती हैं, जिसको रोकने वाला राजस्थान में तो उसके पास कोई नेता नहीं है। यही वजह है कि इस बात की प्रबल संभावना है कि आगामी विधानसभा चुनाव भाजपा वसुंधरा राजे के नेतृत्व में ही लड़ेगी। उनकी राजस्थान भाजपा पर पकड़ कमजोर पडऩे के आसार अभी तो नजर नहीं आ रहे।

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