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गजराज की राह में आफत ही आफत, संरक्षण के लिए नई रणनीति तैयार करने का आग्रह

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seemaBy seema

Published on 29 Dec 2017 8:42 AM GMT

गजराज की राह में आफत ही आफत, संरक्षण के लिए नई रणनीति तैयार करने का आग्रह
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उत्तराखंड। हाथी हमारे देश की शान है। भारतीय हाथी मुख्यत: मध्य एवं दक्षिणी 'पश्चिमी घाट', उत्तर-पूर्व भारत, पूर्वी एवं उत्तरी भारत तथा दक्षिणी प्रायद्वीपीय के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। इसे भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत संकटग्रस्त प्रजातियों शामिल किया गया है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा इस वर्ष जारी पहले समन्वय आधारित अखिल भारतीय हाथी संख्या आकलन के प्रारंभिक परिणामों के अनुसार, भारत में हाथियों की कुल संख्या 27,312 दर्ज की गई है। देश में हाथियों की सर्वाधिक संख्या कर्नाटक (6049) में दर्ज की गई है। इस दृष्टि से असम (5719) दूसरे तथा केरल (3054) तीसरे स्थान पर है। उल्लेखनीय है कि भारत में हाथियों की पिछली गणना वर्ष 2012 में संपन्न हुई थी, जिसमें हाथियों की संख्या 29,391 और 30,711 के मध्य आंकी गई थी। हालांकि वर्ष 2012 में हुई गणना में विभिन्न राज्यों ने अलग-अलग पद्धतियों का प्रयोग कर हाथियों की संख्या का अनुमान लगाया था और उनमें कोई तालमेल नहीं था।

हाथियों की कम होती जनसंख्या को देखते हुए केंद्रीय वन मंत्री हर्षवर्धन ने लोगों से हाथियों के संरक्षण के लिए नई रणनीति तैयार करने का आग्रह किया है जिसमें हाथियों के सीमा संरक्षण, प्राकृतिक निवास स्थान की रक्षा, सुधार और विस्तार, विद्युत शक्ति से हाथियों की होने वाली मौतों को रोकने के मुद्दे प्रमुख रहेंगे। इसके अलावा उन्होंने जानकारी दी कि हाथियों की रक्षा के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान गज यात्रा भी शुरू कि गयी है जिसमें 12 राज्यों के हाथियों को कवर करने का लक्ष्य रखा गया है।

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इस परियोजना के निर्देशक आर के श्रीवास्तव के कहा कि हमें उम्मीद है कि यह अभ्यास भारत और दूसरे देशों में हाथियों की आबादी को बढ़ाने में सहायक होगा। आकड़ों के मुताबिक फिलहाल पूरे भारत में 65,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में 29 हाथी भंडार हैंँ लेकिन जंगलों में लगातार इंसानों की बढ़ती दख्लअंदाजी के कारण इनके आवासों में भारी कमी हो चुकी है, जो कि मानव-हाथी संघर्ष को बढ़ावा दे रही है। जबकि पिछले चार सालों में मानव-हाथी संघर्ष के चलते हर दिन एक आदमी को अपनी जान गंवानी पड़ती है। वर्ष 2015 व 16 में एक जानकारी के अनुसार करीब 59 हाथियों के मरने की सूचना थी।

इसी तरह हाथी के हमले के कारण 419 लोगों की मौत हुई जिसमें सर्वाधिक 92 लोगों की मौत असम में हुई। गौरतलब है कि भारत में एशिया के हाथियों के आवास और गलियारों की रक्षा और मानव-हाथी संघर्ष को संबोधित करते हुए 1992 में एक परियोजना की शुरूआत हुई थी. तब से सरकार हर चार से पांच वर्षों में हाथियों की आबादी की गिनती करती आ रही है। वहीं केंद्र और राय दोनों की सरकारें भी हाथियों की कम हो रही जनसंख्या के मुद्दे को हल करने के लिए निरंतर प्रयास कर रही हैं। वाइल्ड लाइफ सेवर्स सोसायटी के सचिव आदित्य सिंह का कहना है कि उत्तराखंड में मानव-हाथियों के मध्य संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसे में यहजरूरी है कि इस संबंध में कोई ठोस कदम उठाए जाएं।

हाथी चूंकि झुंड में चलता है इसलिए उसे अपने आवागमन के लिए लंबे चौड़े क्षेत्र की जरूरत होती है। हालत यह है कि देश में हाथियों के रास्ते लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं। कई जगह तो इनकी चौड़ाई दो तीन किलोमीटर तक रह गई है। जब हाथी का आवागमन बाधित होता है तो वह अपने क्षेत्र में अतिक्रमण को लेकर क्रुद्ध होकर मानव बस्तियों पर हमलावर हो जाता है। चूंकि उत्तराखंड में यह संघर्ष बढ़ा है इसलिए बात उत्तराखंड की ही करते हैं।

उत्तराखंड में राष्ट्रीय विरासत पशु हाथी के कुनबे में इजाफा भले ही सुकून देने वाला हो, लेकिन गजराज का स्व'छंद विचरण एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है। बात हो रही है हाथियों के परंपरागत 11 गलियारों (कॉरीडोर) की, जिनमें कहीं मानव बस्तियां उग आई हैं तो कहीं रेल और सडक़ मार्गों ने बाधाएं खड़ी की हुई हैं। सूरतेहाल, मानव और हाथी के बीच संघर्ष में भी बढ़ोत्तरी हुई है। विभागीय अधिकारी भी मानते हैं कि अब उनकी जिम्मेदारी और अधिक बढ़ गई है। हाथी गलियारों को खोलने के लिए प्रभावी पहल की जाएगी।

राज्य में यमुना से लकर शारदा नदी तक के हाथी बहुल क्षेत्र देश में हाथियों के लिए उत्तर पश्चिमी सीमा का अंतिम पड़ाव है। शिवालिक हाथी रिजर्व के रूप में घोषित इस क्षेत्र से एक दौर में हाथियों का स्वछंद विचरण यहां से बिहार तक होता था। वन महकमे के अभिलेखों में भी इसका जिक्र है। अब तस्वीर देखिये कि हाथियों के लिए राजाजी से कार्बेट टाइगर रिजर्व में भी आने-जाने में कई बाधाओं से गुजरना पड़ रहा है।

राजाजी टाइगर रिजर्व को ही लें तो यहां चीला-मोतीचूर कॉरीडोर की राह में मानव बस्ती के साथ ही राष्ट्रीय राजमार्ग और रेलवे लाइन ने भी आवाजाही के रास्ते में मुश्किलें खड़ी की हुई हैं। यही नहीं, चिह्नित अन्य 10 हाथी गलियारों का सूरतेहाल भी इससे जुदा नहीं है। इस सबके चलते हाथियों की स्वछंद विचरण की आजादी पर ग्रहण लगा है। ये बात अलग है कि राज्य बनने से लेकर अब तक हाथियों के परंपरागत गलियारों को खोलने की बात हो रही, मगर गंभीरता से पहल अब तक नहीं हो पाई है।

ऐसे में हाथियों की लंबी प्रवास यात्राएं बाधित हुई हैं। ये कई जगह दड़बों में सिमटे हैं, जिससे मानव और हाथी के बीच संघर्ष भी बढ़ा है। कार्बेट व राजाजी टाइगर रिजर्व से लगे इलाके इसके उदाहरण हैं। हरिद्वार, देहरादून, कोटद्वार समेत अन्य क्षेत्रों में हाथियों के उत्पात ने नींद उड़ाई हुई है।

नए साल में उत्तराखंड में राजाजी के गजराज राजा और देश के वन्य जीव प्रेमियों के लिए खुशी की खबर है। अब गजराज को कटने से बचाया जा सकेगा। इसके लिए डेंजर जोन कासरो से होकर गुजरने वाले ट्रैक के किनारे सेंसर लगाये गए हैं। हाथियों के इसके नजदीक आने पर सेंसर एक्टिव हो जाएगा और कंट्रोल रुम में अलार्म बजने लगेगा। फिलहाल प्रयोग के तौर पर दस अलार्म लगाए गए हैं।

नए साल से यह अलार्म काम करना शुरू कर देंगे। राजाजी टारगर रिजर्व से होकर गुजरने वाले ट्रैक पर हाथियों के कटने के अबतक करीब 25 मामले सामने आ चुके हैं। बीते वर्ष 2016 में रायवाला में रेलवे ट्रैक से कटकर एक हाथी की मौत हुई थी। 2013 में दो हाथियों की मौत हुई थी। इसके अलावा हर दूसरे तीसरे साल हाथियों के ट्रैक पर कटने के मामले सामने आते रहे हैं। हालांकि इस क्षेत्र से गुजरते समय ट्रेन की गति धीमी रहती है। हाथी संभावित स्थानों पर लगातार हार्न बजाया जाता है। पार्क प्रशासन की ओर से कर्मचारियों की गश्त भी होती रहती है। बावजूद इसके हाथियों के कटने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। अब हाथियों को कटने से बचाने के लिए सेंसर लगाने की पहल हुई है जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आने की उम्मीद है।

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सीमा शर्मा लगभग ०६ वर्षों से डिजाइनिंग वर्क कर रही हैं। प्रिटिंग प्रेस में २ वर्ष का अनुभव। 'निष्पक्ष प्रतिदिनÓ हिन्दी दैनिक में दो साल पेज मेकिंग का कार्य किया। श्रीटाइम्स में साप्ताहिक मैगजीन में डिजाइन के पद पर दो साल तक कार्य किया। इसके अलावा जॉब वर्क का अनुभव है।

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