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जंगलों में ट्रेनों की नई घुसपैठ, 13 रेलवे प्रोजेक्ट्स को मंजूरी

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 2 Aug 2019 8:13 AM GMT

जंगलों में ट्रेनों की नई घुसपैठ, 13 रेलवे प्रोजेक्ट्स को मंजूरी
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नई दिल्ली: केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने जिन १३ रेलवे प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है वे सिमटते वन्य जीवन के लिए नया खतरा ले कर आएंगे। १९४०० करोड़ रुपए के ये प्रोजेक्ट्स ८०० हेक्टयेर जमीन पर फैलेंगे और इनको वन संबंधी परमिट लेने की कोई जरूरत नहीं होगी। इसका सीधा मतलब ये है कि इन नई मंजूरियों से यूपी, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और गोवा के एक नेशनल पार्क, एक टाइगर रिजर्व और कई वन्य अभराण्यों पर विपरीत असर पड़ सकता है। ‘इंडिया स्पेंड’ के अनुसार रेल मंत्रालय का तर्क है कि ये जमीन १९८० के पूर्व रेलवे के पास ही थी। सन ८० में ही वन संरक्षण एक्ट (एफसीए) पास हुआ था। अत: ये एक्ट इन जमीनों पर लागू नहीं होता है।

वन संरक्षण एक्ट के अनुसार केंद्र सरकार की इजाजत के बगैर किसी भी वन्य भूमि पर गैर वन गतिविधियां संचालित नहीं की जा सकती हैं। इस प्रक्रिया को ‘वन मंजूरी’ या फारेस्ट क्लीयरेंस कहा जाता है।

बहरहाल, मई २०१९ में पर्यावरण मंत्रालय ने सभी राज्यों को एक सर्कुलर भेजा कि रेलवे लाइन की डबलिंग या गेज परिवर्तन के काम पर एफसीए १९८० लागू नहीं होगा। बशर्ते वह जमीन रेलवे की हो और सन ८० के पूर्व उसका इस्तेमाल गैर वन कार्यों में किया जाता रहा हो। नई रेलवे लाइन के निर्माण के लिए अब भी वन मंजूरी की आवश्यकता है।

नए प्रोजेक्ट्स को वन मंजूरी से दी गई छूट का मतलब है कि जंगल का इस्तेमाल अन्य कार्यों को करने से पूर्व कोई पड़ताल, समीक्षा आदि नहीं की जाएगी। आमतौर पर वन भूमि के इस्तेमाल के किसी भी प्रस्ताव की जांच राज्य सरकार, डिवीजनल फारेस्ट ऑफिसर और अंत में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय या उसके रीजनल आफिस द्वारा समीक्षा की जाती है। रेलवे या हाईवे जैसे प्रोजेक्ट्स की अनुमति रीजनल कमेटी देती है। इस तरह की समीक्षा से यह पता किया जाता है कि जंगल और वन जीवन पर क्या असर पड़ेगा।

अब जिन १३ प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिली है उनका जंगल क्षेत्र और वन्य जीव पर क्या असर पड़ेगा इसकी कोई समीक्षा नहीं की जाएगी। इन प्रोजेक्ट्स, जिनमें रेलवे लाइन की डबलिंग शामिल है, पर दो साल तक विचार विमर्श किया गया। दिसंबर २०१७ में सरकार ने आदेश दिया था कि रेलवे जिन वन जमीनों का इस्तेमाल डबलिंग या गेज परिवर्तन के लिए करना चाहता है उनके लिए वन मंजूरी आवश्यक है।

जून २०१४ से मई २०१८ के बीच नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्डलाइफ ने देश के संरक्षित क्षेत्र और ईको सेंसेटिव जोन में ५०० प्रोजेक्टों को मंजूरी दी थी। इससे पहले २००९ से २०१३ के बीच २६० प्रोजेक्ट मंजूर किए गए थे।

अकोला खंडवा रेलवे लाइन

२०१७ में अकोला-खंडवा गेज परिवर्तन प्रोजेक्ट का प्रस्ताव पर्यावरण मंत्रालय के पास मंजूरी के लिए आया। रेलवे ने कहा कि इसे नई वन मंजूरी की जरूरत नहीं है क्योंकि १९८० से पूर्व इस प्रोजेक्ट की जमीन रेलवे के पास ही थी। इस प्रोजेक्ट के तहत १७६ किमी मीटर गेज लाइन को ब्रॉड गेज में बदला जाना है।

जनवरी २०१७ में इसे पर्यावरण मंत्रालय ने मंजूरी दे दी। इस प्रोजेक्ट की १८ किमी लाइन मेलघाट टाइगर रिजर्व से होकर गुजरती है। इस टाइगर रिजर्व में ५० बाघ रहते हैं। प्रोजेक्ट की ४० किमी लाइन जंगल से हो कर गुजरती है। इस प्रोजेक्ट का मामला सुप्रीमकोर्ट तक गया। तमाम जिरह और बैठकेन हुईं लेकिन अंतत: सब विरोध खारिज हो गए और प्रोजेक्ट को मंजूर कर दिया गया।

नेशनल पार्कों व टाइगर रिजर्व पर असर

नए मंजूर १३ प्रोजेक्ट्स में से कम से कम चार नेशनल पार्क, टाइगर रिजर्व या वन अभराण्य में पड़ रहे हैं। २६१ किमी लंबी कटनी-सिंगरौली लाइन की डबलिंग होने से ३३ किमी रेलवे लाइन मध्य प्रदेश के संजय डुबरी नेशनल पार्क से हो कर गुजरेगी। इसके अलावा ये नेशनल पार्क को बांधवगढ़ से जोडऩे वाले टाइगर गलियारे को डिस्टर्ब भी करेगी। २०१७ में नेशनल टाइगर कन्जर्वेशन अथॉरिटी ने रेल मंत्रालय से कहा था कि २५० किमी रेल लाइन से बाघों के निवास क्षेत्र को बड़ा खतरा पैदा होगा। होसपेट-तिनाईघाट-वास्को रेलवे लाइन गोवा के भगवान महावीर अभराण्य और कर्नाटक के दंडेली अभराण्य से हो कर गुजरेगी। लखनऊ-पीलीभीत गेज परिवर्तन से ट्रैफिक बढ़ेगा और पीलीभीत टाइगर रिजर्व के भीतर निर्माण कार्य होगा।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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