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हिमाचल की झील में मिले तैरने वाले पत्थर

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raghvendraBy raghvendra

Published on 31 Aug 2018 10:26 AM GMT

हिमाचल की झील में मिले तैरने वाले पत्थर
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शिमला: हिमाचल प्रदेश की पौंग झील में पानी में तैरने वाले पत्थर मिले हैं। प्रदेश के जवाली उपमंडल के एक गांव समकेहड़ के तीन लोगों को पौंग झील में ये पत्थर मिले थे। तैरने वाले पत्थरों की खबर पा कर दूरदराज से लोग इन्हें देखने के लिए पहुंच रहे हैं। कोई इन पत्थरों को रामसेतु वाले पत्थर बता रहा है तो कोई इन पत्थरों का तैरना मात्र एक इत्तेफाक मान रहा है। तैरने वाले पत्थरों के बीच में छेदों के निशान हैं। ऐसा लगता है मानों सुईयां चुभो कर किए गए हों। हैरत की बात है कि ये पत्थर एकदम सांचेनुमा आकार में हैं। इन पत्थरों का रंग हल्का नीला है तथा यह अन्य पत्थरों से अलग लग रहे हैं। जिन घरों में ये पत्थर रखे हैं वहां लोग इनकी पूजा और भजन कीर्तन कर रहे हैं।

कुछ लोगों का मानना है कि जहां पर तैरने वाले पत्थर मिल रहे हैं, उसी के पास ही ऐतिहासिक बाथू की लड़ी भी है, जिसका निर्माण पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान स्वर्ग को जाने के लिए किया था। ऐसे में हो सकता है कि ये तैरने वाले पत्थर पांडवों द्वारा कहीं छिपाए गए हों, जो अब बाहर निकल रहे हैं। जब बाथू की लड़ी पानी से बाहर थी तब तो कहीं भी ऐसे पत्थर दिखाई नहीं दिए। जैसे ही बाथू की लड़ी पानी में डूबी तभी ऐसे तैरने वाले पत्थर मिले। वैसे, करीब तीन साल पहले भी झील में तैरने वाला पत्थर मिला था, जो कि जवाली के शनिदेव मंदिर में रखा गया है। उसका रंग भूरा था, लेकिन हाल ही में मिले पत्थरो का रंग हल्का नीला है। पहला पत्थर मुंशी राम को करीब चार दिन पहले मिला था, जिसका वजन करीब तीन किलोग्राम है। मुंशी राम ने बताया कि अब उसने टब में पानी भरकर पत्थर को पानी में डाला तो पत्थर तैरने लगा। वहीं समकेहड़ के ही कर्म चंद को मिला पत्थर करीब पांच किलोग्राम का है।

मुंशी राम और कर्म चंद झील में मछली पकडऩे का काम करते हैं। समकेहड़ के ही अभिषेक सिंह को भी ऐसा पत्थर मिला है। अभिषेक ने बताया कि वह लकडिय़ां लेने गया था तो उसको पत्थर तैरता हुआ मिला। पत्थरों पर ओम का निशान बना हुआ है, जिसको देखकर हर कोई इसे रामसेतु के पत्थरों की उपाधि दे रहा हैं।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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