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2018 के चुनाव : मेघालय में कांग्रेस को मिलेगी कड़ी टक्कर

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 22 Dec 2017 11:18 AM GMT

2018 के चुनाव : मेघालय में कांग्रेस को मिलेगी कड़ी टक्कर
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भारत के उत्तर पूर्व के चार राज्यों मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा और नागालैण्ड में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। उत्तर पूर्व में अभी तक भाजपा की बहुत अच्छी मौजूदगी नहीं रही है। काफी मेहनत के बाद असम और अरुणाचल में उसने सरकार बनाने में सफलता हासिल की है। अब पार्टी का लक्ष्य आगे बढऩे का है। इस क्षेत्र में हमेशा से क्षेत्रीय दलों का बोलबाला रहा है और ये हमेशा से राष्ट्रीय दलों को तगड़ी चुनौती देते आए हैं।

मेघालय में कांग्रेस सत्ता में है और मुकुल संगमा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हैं। पार्टी के लिए अप्रैल २०१८ के चुनाव में सता बरकरार रखना काफी कठिन होगा। हालांकि मेघालय में भाजपा ने कभी शासन नहीं किया है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उत्तर पूर्व में अपनी सरकार की ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ चलाए जाने के बावजूद उनका रास्ता आसान नहीं होगा। वैसे, भाजपा ने मेघालय समेत अन्य उत्तर पूर्वी राज्यों में कैडर का मजबूृत आधार खड़ा कर लिया है। गुजरात चुनाव के तत्काल बाद मोदी मेघालय आए जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश और उत्साह काफी बढ़ गया है।

क्या है रणनीति

मेघालय में भाजपा की रणनीति क्षेत्रीय दलों से हाथ मिलाकर सत्ता हासिल करने की है। राज्य के पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट ने कह भी दिया है कि उसके लिए कोई भी पार्टी अछूत नहीं है और वह चुनाव पूर्व गठबंधन के दरवाजे खोले हुए है।

भाजपा ने पिछले चुनाव में यहां एक भी सीट नहीं जीती थी और उसके सभी प्रत्याशी जमानत गंवा बैठे थे। लेकिन इसी राज्य में २०१४ के लोकसभा चुनावों में भाजपा सात विधानसभा क्षेत्रों में से छह में सबसे आगे रही। भाजपा को राज्य विधानसभा में इंट्री तब मिली जब दो निर्दलीय विधायक पार्टी में शामिल हो गये।

भाजपा ने राज्य के ईसाइयों को अपने पाले में करने का काफी प्रयास किया है और इसी कारण हिंदू कार्ड की बजाय ‘देशी और बाहरी’ का कार्ड खेला जा रहा है। ईसाइयों को खींचने के क्रम में मेघालय के भाजपा प्रभारी अल्फोंस कन्ननथनम राज्य के चर्च के प्रमुखों से कई राउंड बातचीत कर चुके हैं। इसाई नाराज न हों इसलिये यहां बीफ का मुद्दा छेड़ा तक नहीं गया है। भाजपा यह भी देख रही है कि हाल के कोई भी चुनाव रहे हों सबमें कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा है। सिर्फ गारो हिल्स के विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस जीती थी।

दूसरी ओर कांग्रेस का मनोबल काफी नीचे है। एक वजह तो लगातार अलग-अलग राज्यों में पराजय है। दूसरा, राज्य की जनता और कांग्रेस पार्टी में ज्यादातर लोग सीएम मुकुल संगमा की तानाशाही वाली स्टाइल से नाखुश हैं। पार्टी की स्थिति यह है कि पुराने नेताओं की कोई पूछ नहीं है।

पूर्व मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री, विधायक और कई अन्य नेता पार्टी से या तो बाहर कर दिए गए हैं या वे चुनाव लडऩे से इनकार कर चुके हैं। ताजा झटका मेघालय प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष डी.डी. लपांग दे चुके हैं जब उन्होंने चुनावी राजनीति से ही हाथ खींच लिये। पार्टी को राज्य में एंटी इंकमबैन्सी का सामना करना पड़ेगा।

विधानसभा का हाल

कुल सीटें : 60 (सामान्य - 05, एसटी - 55)

(कुल मतदाता : 15,03,907, मतदान प्रतिशत : 86.82 फीसदी) कांग्रेस 29, एचएसपीडीपी 04, यूडीपी 08, जीएनसी 01, एनसीपी 02, एनपीपी 02, एनईएसडीपी 01, निर्दलीय 13

2013 में भाजपा 13 सीटों पर लड़ी और सभी जगह जमानत जब्त हो गयी। उसे कुल 16,800 वोट मिले जो कुल वोट का 1.27 फीसदी थे। दूसरी ओर कांग्रेस 60 सीटों पर लड़ी और 29 सीटों पर जीती और तीन जगह जमानत खो बैठी। कांग्रेस को 45,8783 वोट मिले जो कुल वोट का 34.78 फीसदी थे। इसके बाद यूडीपी का वोट शेयर 17.11 फीसदी था और इसके 50 में से 8 प्रत्याशी जीते थे। निर्दलीयों का अच्छा खासा बोलबाला रहा और 122 में से 13 प्रत्याशी जीत गये। निर्दलीयों ने कुल वोट का 27.69 फीसदी हासिल किया था।

2008 का चुनाव : भाजपा 01, कांग्रेस 25, एनसीपी 15, यूडीपी 11, एचएसपीडीपी 02, केएचएनएएम 01, निर्दल 05

इस चुनाव में भाजपा 23 जगह लड़ी थी और उसे कुल 29,465 वोट मिले जो 2067 फीसदी थे। कांग्रेस 60 जगह लड़ी और 25 में जीती। उसे 362617 वोट मिले जो 32.90 फीसदी थे। इस चुनाव में एनसीपी 50 जगह लड़ी थी और 11 सीटें पायी थीं। उसे 20.76 फीसदी वोट मिले थे।

मेघालय में किस धर्म के कितने

ईसाई - 74.59 फीसदी, हिन्दू - 11.53 फीसदी, मुस्लिम - 4.40 फीसदी, अन्य - 8.71 फीसदी।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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