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प्रशांत किशोर: संयुक्त राष्ट्र से राजनीति के मैदान तक का रहा है इनका दिलचस्प सफर

चुनावी राजनीति में अपनी महारत दिखा चुके बिहार के बक्सर जिले में जन्मे प्रशांत किशोर पांडेय को जेडीयू से निकाल दिया गया है। वर्ष 2015 में उन्होंने ....

Deepak Raj

Deepak RajBy Deepak Raj

Published on 29 Jan 2020 12:41 PM GMT

प्रशांत किशोर: संयुक्त राष्ट्र से राजनीति के मैदान तक का रहा है इनका दिलचस्प सफर
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पटना। चुनावी राजनीति में अपनी महारत दिखा चुके बिहार के बक्सर जिले में जन्मे प्रशांत किशोर पांडेय को जेडीयू से निकाल दिया गया है। वर्ष 2015 में उन्होंने महागठबंधन की जीत में जो भी भूमिका निभाई, वह इतिहास हो चुका है। वर्तमान तो यह है कि सीएए और एनआरसी के मुद्दे पर वह सीधे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ऊपर हमला बोलने से नहीं चूक रहे।

प्रशांत किशोर कई राजनेताओं को अपनी रणनीतिक सूझबूझ के दम पर मुख्यमंत्री तक बना चुके हैं। 2015 में जब उन्होंने नीतीश कुमार को चुनाव जीतने में मदद की थी उसी के परिणाम स्वरूप उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया। बाद में प्रशांत किशोर को कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी दिया गया।

बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है

नीतीश कुमार के जनसंपर्क अभियान 'हर-घर दस्तक' और 'बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है' जैसे लोकप्रिय नारे के पीछे किशोर ही थे। कहा जाता है कि बिहार में धुर विरोधी जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस का महागठबंधन बनवाने में उनकी अहम भूमिका रही।

साल 1977 में प्रशांत किशोर का जन्म बिहार के बक्सर जिले में हुआ था। उनकी मां उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की हैं वहीं पिता बिहार सरकार में डॉक्टर हैं। उनकी पत्नी का नाम जाह्नवी दास है। जो असम के गुवाहाटी की एक डॉक्टर हैं।

पर्दे के पीछे रहकर अपनी चुनावी रणनीति को अंजाम देते आए हैं

प्रशांत किशोर और जाह्नवी का एक बेटा है। राजनीतिक करियर की बात करें तो 2014 में मोदी सरकार को सत्ता में लाने की वजह से वह चर्चा में आए थे। उन्हें एक बेहतरीन चुनावी रणनीतिकार के तौर पर जाना जाता है। हमेशा से वह पर्दे के पीछे रहकर अपनी चुनावी रणनीति को अंजाम देते आए हैं। इसी वजह से उन्हें सबसे ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है।

34 साल की उम्र में अफ्रीका से संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की नौकरी छोड़कर किशोर ने 2011 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की टीम से जुड़े थे। जिससे राजनीति में ब्रांडिंग का दौर शुरू हो गया। चुनाव में नेता का ऐसा प्रचार शायद ही किसी दौर में देखा गया था।

सिटीजन फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस की स्थापना की

साल 2014 में किशोर ने सिटीजन फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (कैग) की स्थापना की थी। जिसे भारत की पहली राजनीतिक एक्शन कमिटी माना जाता है। यह एक एनजीओ है जिसमें आईआईटी और आईआईएम में पढ़ने वाले युवा प्रोफेशनल्स शामिल थे।

किशोर को मोदी की उन्नत मार्केटिंग और विज्ञापन अभियान जैसे कि चाय पे चर्चा, 3डी रैली, रन फॉर यूनिटी, मंथन का श्रेय दिया जाता है। वह इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आई-पैक) नाम का संगठन चलाते हैं। यह लीडरशिप, सियासी रणनीति, मैसेज कैंपेन और भाषणों की ब्रांडिंग करता है।

2017 में वह वाईएसआर कांग्रेस से जुड़ गए

2014 में भाजपा का साथ छोड़ने के बाद प्रशांत किशोर ने 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के लिए नीतीश कुमार- लालू यादव के महागठबंधन का साथ थामा था। इसके बाद 2017 में वह वाईएसआर कांग्रेस से जुड़ गए।

पार्टी के प्रमुख जगन मोहन रेड्डी ने किशोर की मुलाकात पार्टी के बड़े नेताओं से करवाई थी। हालांकि बिहार में जिस रणनीति ने काम किया था वह आंध्र प्रदेश में कामयाबी हासिल नहीं कर पाई।

किशोर की संस्था आईपैक का लोकसभा चुनाव को लेकर एक सर्वे सामने आया था

उन्होंने उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर काम किया था लेकिन यहां भी पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। कुछ दिनों पहले ही किशोर की संस्था आईपैक का लोकसभा चुनाव को लेकर एक सर्वे सामने आया था।

इस सर्वे के अनुसार 48 प्रतिशत लोगों ने पीएम मोदी को अपना नेता माना था। वहीं कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी 11 प्रतिशत के साथ दूसरे स्थान पर रहे थे। इन आंकड़ों ने भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का एक मौका दे दिया था। यह सर्वे किशोर से जुड़ी सिटीजंस फॉर एकाउंटेबल गवर्नेंस की ओर से 2013 में कराए गए सर्वेक्षण के समान था। जिसमें मोदी को देश का सबसे पसंदीदा नेता बताया गया था।

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