मोहन भागवत पढ़ाई को छोड़ RSS में हुए थे शामिल, विरासत में मिला संघ

आपात काल के दौरान भूमिगत कार्य करने के बाद भागवत 1977 में अकोला (महाराष्ट्र) में प्रचारक बन गए और बाद में उन्हें नागपुर और विदर्भ क्षेत्रों का प्रचारक बनाया गया।

Published by Aditya Mishra Published: September 11, 2019 | 11:19 am
Modified: September 11, 2019 | 11:20 am

लखनऊ: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आरएसएस) के प्रमुख मोहनराव मधुकर राव भागवत( मोहन भागवत) का आज जन्मदिन है। मोहन भागवत किसी परिचय के मोहताज नहीं है।

वह दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संस्थान माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के छठवें प्रमुख हैं। संघ के पांचवें प्रमुख रहे के. एस. सुदर्शन ने अपनी सेवानिवृत्ति पर मोहन भागवत को अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुना था।

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पिता से विरासत में मिला संघ

मोहन राव भागवत का जन्म महाराष्ट्र के एक छोटे से कस्बे चंद्रपुर में 11 सितंबर 1950 को हुआ था। वे संघ कार्यकर्ताओं के परिवार से आते हैं।

उनके पिता मधुकर राव भागवत चंद्रपुर क्षेत्र के कार्यवाहक (सचिव) पद पर थे और उन्होंने गुजरात में प्रांत प्रचारक के तौर पर काम किया था।

मधुकर राव भागवत ने ही भाजपा के शीर्षस्थ नेता लालकृष्ण आडवाणी का परिचय संघ से कराया था। मोहनराव अपने पिता के सबसे बड़े बेटे हैं। उनके तीन भाई और एक बहिन है।

1975 में बने आरएसएस के पूर्ण कालिक प्रचारक

उन्होंने चंद्रपुर के लोकमान्य तिलक विद्यालय से स्कूली शिक्षा प्राप्त की और बाद में स्थानीय जनता कॉलेज से बी.एस-सी. की पहली वर्ष की परीक्षा पास की।

बाद में, उन्होंने अकोला के पंजाब राव कृषि विद्यापीठ से वे‍टरिनरी साइंसेज ऐंड एनीमल हस्जबेंडरी में स्नातक परीक्षा पास की।

एम.एस-सी. की पढ़ाई को बीच में ही छोड़ते हुए वे 1975 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्ण कालिक प्रचारक बन गए। उस समय देश में आपात काल लगा हुआ था जिसे तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने लगाया था।

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1999 में ‍ऐसे बने अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख

आपात काल के दौरान भूमिगत कार्य करने के बाद भागवत 1977 में अकोला (महाराष्ट्र) में प्रचारक बन गए और बाद में उन्हें नागपुर और विदर्भ क्षेत्रों का प्रचारक बनाया गया।

वर्ष 1991 में सारे देश में संघ कार्यकर्ताओं के शारीरिक प्रशिक्षण के लिए अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख बने और वे इस पद पर 1999 तक रहे।

इसी वर्ष उन्हें सारे देश में पूर्णकालिक काम करने वाले संघ कार्यकर्ताओं का प्रभारी, ‍अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख, बना दिया गया।

2009 में सरसंघचालक का ओहदा मिला

वर्ष 2000 में जब राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैय्या) और एच.वी. शेषाद्रि ने क्रमश: संघ प्रमुख-सरसंघचालक और महासचिव (सरकार्यवाहक) पद से त्याग पत्र दिए तो के.एस. सुदर्शन को नया संघ प्रमुख और मोहन भागवत को सरकार्यवाहक बनाया गया था।

वर्ष 2009 में 21 मार्च को मोहन भागवत को सरसंघचालक का ओहदा दिया गया। संघ का प्रमुख बनने वाले वे युवा नेताओं में से एक हैं।

उन्हें संघ का स्पष्ट भाषी, विनम्र और व्यवहारिक प्रमुख माना जाता है जो कि संघ को राजनीति से दूर रखने की एक स्पष्ट दूरदृष्टि रखते हैं।

 

महिलाओं के घोर विरोधी होने का लग चुका है आरोप

भागवत पर महिलाओं और पश्चिमी सभ्यता का घोर विरोधी माने जाने का आरोप कई बार लग चुका है। ऐसा इसलिए क्योंकि 6 जनवरी, 2013 को उन्होंने इंदौर में एक रैली के दौरान कहा था ‘एक पति और पत्नी एक अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) में बंधे होते हैं, जिसके तहत पति कहता है कि आपको मेरे घर का ख्याल रखना चाहिए और उसके बदले मैं आपकी सभी जरूरतों का ख्याल रखूंगा, मैं आपकी हमेशा रक्षा करूंगा।

महिलाओं से घरों का काम करने की अपेक्षा की जाती है। पत्नियों को इस कॉन्ट्रैक्ट का पालन हमेशा करना पड़ता है, जबतक कि पति साथ है।

लेकिन अगर पत्नी इस कॉन्ट्रैक्ट को तोड़ती है तो पति उसका परित्याग कर सकता है।’ उनके बयान के बाद से उन्हें महिलाओं का घोर विरोधी माने जाने लगा है।

छुआछूत पर कही थीं ये बड़ी बात

हिंदू समाज में अस्पृश्यता के सवाल पर उनका कहना था कि छुआछूत का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। उनका कहना था कि हिंदू समाज विविधता में एकता के आधार पर आधा‍रित है और इसे अपने ही लोगों के खिलाफ भेदभाव जैसी कमजोरी को मिटाना चाहिए।

उनका यह भी कहना है कि हिंदू समुदाय के लोगों को समाज में प्रचलित भेदभाव वाली मानसिकता को दूर करना चाहिए और प्रत्येक हिंदू के घर से ऐसी शुरुआत की जानी चाहिए।

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