मेजर रामास्वामी परमेश्वरन की ऐसी है वीरगाथा, शहीद की कहानी जान छलक पड़ेंगे आंसू

मेजर रामास्वामी परमेश्वरन भी उन सैनिकों में शामिल हैं जिन्होंने विदेशी धरती पर शांति स्थापित करने के लिए कुर्बानी दी है। मेजर रामास्वामी परमेस्वरन वीरता की अद्भुत मिसाल कायम करते हुए आज ही के दिन यानी 25 नवंबर, 1987 को श्रीलंका में शहीद हो गए थे।

Major Ramaswamy Parmeshwaran

मेजर रामास्वामी परमेश्वरन की ऐसी है वीरगाथा, शहीद की कहानी जान छलक पड़ेंगे आंसू (फोटो: सोशल मीडिया)

नई दिल्ली: भारत वीरों की धरती है यहां एक से बढ़कर एक योद्धाओं ने जन्म लिया है। इन वीरों ने अपने जज्बे और साहस से पूरी दुनिया में मान बढ़ाया है और देश के लिए अपनी कुर्बानी दी है। मेजर रामास्वामी परमेस्वरन ऐसे ही एक वीरे थे। परमेस्वरन ने श्रीलंका में परचम लहराया और शहीद हो गए।

श्रीलंका के ऑपरेशन पवन में मेजर रामास्वामी परमेस्वरन वीरगति को प्राप्त हो गए। भारत सरकार ने युद्ध काल में दिए वाले सर्वश्रेष्ठ सम्मान परमवीर चक्र से मरणोपरांत उनको सम्मान दिया। भारत के सैनिकों ने शांति के लिए देश की धरती के साथ ही विदेशों में भी बड़ा योगदान दिया है।

मेजर रामास्वामी परमेश्वरन भी उन सैनिकों में शामिल हैं जिन्होंने विदेशी धरती पर शांति स्थापित करने के लिए कुर्बानी दी है। मेजर रामास्वामी परमेस्वरन वीरता की अद्भुत मिसाल कायम करते हुए आज ही के दिन यानी 25 नवंबर, 1987 को श्रीलंका में शहीद हो गए थे।

मेजर रामास्वामी परमेश्वरन 13 सितंबर, 1946 को मुंबई में जन्मे थे। उनके पिता का नाम के.एस.रामास्वामी और मां का नाम जानकी था। परमेश्वरन ने एसआईईएस (साउथ इंडियन एजुकेशन सोसायटी) हाई स्कूल की पढ़ाई मुंबई से 1963 में की। इसके बाद उन्होंने 1968 में एसआईईएस कॉलेज से विज्ञान में ग्रेजुएशन की डिग्री ली।

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म्हार रेजिमेंट में कमिशंड ऑफिसर के तौर पर मिली नियुक्ति

1971 के युद्ध में पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सैनिकों ने साहस का परिचय दिया था और पड़ोसी देश को धूल चटा थी। इन्ही सैनिकों के साहस और बलिदान से मेजर रामास्वामी प्रेरित थे। इसी प्रेरणा से उन्होंने 1971 में ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडिमी में शामिल हए। वहां से वह 16 जून, 1972 में वह सफल हुए। इसके बाद भारतीय थल सेना की सबसे प्रसिद्ध 15 म्हार रेजिमेंट में उन्हें कमिशंड ऑफिसर के तौर पर नियुक्त मिली। इस रेजिमेंट में उन्होंने आठ सालों तक अपनी सेवाएं दी और बाद उनको 5 महार में ले लिया गया।

Indian Army

1987 में भेजा गया श्रीलंका

मेजर परमेश्वरन 15 महार और 5 महार बटालियन में सेवा देने के दौरान पूर्वोत्तर के क्षेत्र में कई उग्रवाद विरोधी अभियानों में शामिल हुए थे। अपने मजबूत संकल्प और नेतृत्व के लिए वह जल्द ही प्रसिद्ध हो गए। परमेश्वरन के जवान उनको प्यार से ‘परी साहिब’ कहा करते थे। वह किसी चुनौतीपूर्ण में हमेशा आगे रहे। उनकी बहादुरी और साहस की चार्च हर जजह होती थी। दृढ़ संकल्प की वजह से ही 8 म्हार बटालियन में के लिए चुना गया। श्रीलंका में भारतीय थल सेना की ओर से ऑपरेशन पवन लॉन्च किया गया था। 8 म्हार बटालियन को 1987 में श्रीलंका भेजा गया था।

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श्रीलंका और भारत में समझौता

श्रीलंका में सिंघली समुदाय की बहुसंख्यक आबादी थी। तमिल भाषी श्रीलंका में अल्पसंख्यक हैं। श्रीलंका की सिंघली बहुल सरकार में अल्पसंख्यक तमिलों की अनदेखी हो रही थी और उनका शोषण किया जाता था। इससे नाराज होकार तमिल समुदाय ने विद्रोह कर दिया। उन्होंने स्वतंत्र तमिल ईलम राज्य की मांग करते हुए आंदोलन शुरू कर दिया।

अलग तमिल ईलम राज्य की मांग को लेकर कई उग्रवादी संगठन बन गए। इन्ही में संगठन में से एक था लिब्रेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (एलटीटीई)। एलटीटीई ने अलग राज्य की मांग को लेकर सशस्त्र संघर्ष की शुरुआत कर दी। इसके जवाब में श्रीलंका की सरकार ने तमिलों को निशाना बनाने लगी। इसके बाद तमिल नागरिक श्रीलंका छोड़ने को मजबूर हो गए और वह तमिलनाडु में शरणार्थी के तौर पर रहने लगे।

भारत और श्रीलंका में शरणार्थी समस्या से निपटने के लिए 29 जुलाई, 1987 को एक समझौता हुआ। इस समझौते के मुताबिक, भारत को अपनी इंडियन पीसकीपिंग फोर्स (आईपीकेएफ) को उग्रवादियों का सामना करने के लिए श्रीलंका भेजना था। ऐसा इसलिए करना था ताकि वहां शांति स्थापित हो और शरणार्थियों भारत ना आएं।

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परमेश्वरन ऐसे हुए थे शहीद

इस समझौते कहत भारत ने आईपीकेएफ को श्रीलंका भेजा था। इसमें मेजर रामास्वामी परमेश्वरन भी शामिल थे। जिस मेजर परमेश्वरन के नेतृत्व कर रहे थे उसको 24 नवंबर, 1987 को सूचना मिली कि उडुविल शहर के करीब कांतारोडाई नाम के गांव में बड़ी मात्रा में हथियार और गोलाबारूद आ रहे हैं। मेजर परेश्वरन की टीम को वहां तलाशी अभियान की जिम्मेदारी मिली। वह एलटीई का मजबूत गढ़ था। परमेश्वन तलाशी के लिए उस गांव पहुंचे और चारों तरफ घेराबंदी कर दी।

उन्होंने फैसला लिया कि सुबह तलाशी की जाएगी। अगले दिन जब तलाशी शुरू की गई तो एलटीटीई के उग्रवादियों ने उन पर हमला बोल गिया। हमले की परवाह किए बगैर मेजर परमेश्वरन की करीब 30 सैनिकों की टीम तलाशी के लिए निकल पड़ी। उन पर चारों तरफ से फायरिंग होने लगी।

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चारों तरफ से हो रही भारी गोलीबारी के बीच बिना डरे हुए मेजर परमेश्वरन पेट के बल आगे बढ़े। जांह से एलटीटीई के उग्रवादी घात लगाकर गोलियां बरसा रहे थे। मेजर परमेश्वरन ने उग्रवादियों को चारों तरफ से घेर लिया। इसी दौरान नारियल के पेड़ पर बैठे एक स्नाइपर ने मशीन गन से हमला कर दिया। इस हमले में परमेश्वरन के हाथ में गोली लग गई। इससे बेपरवाह वह अपने करीब खड़े उग्रवादी का हथियार छिन लिया और उसे मौत के घाट उतार दिया। तब तक दूसरी गोली उनके सीने में आकर लग गई और वह शहीद हो गए।

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