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उत्तराखंड: यहां का एक ऐसा जेल, जहां आसान नहीं सजायाफ्ता कैदियों की पैरोल

पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में जेलों में बंद सजायाफ्ता कैदियों की पैरोल पर रिहाई को लेकर अजीब सी असमंजस की स्थिति खड़ी हो गई है। अभी तक सजायाफ्ता कैदियों को साल में एक बार 15-15 दिन का पैरोल मिला करता था। मुख्यमंत्री को दो माह तक पैरोल पर रिहा करने का अधिकार था। लेकिन त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तराखंड में सिद्धदोष बंदियों को पैरोल देने के लिए जो नई नीति बनाई है उसको लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।

priyankajoshi
Updated on: 4 Dec 2017 7:27 AM GMT
उत्तराखंड: यहां का एक ऐसा जेल, जहां आसान नहीं सजायाफ्ता कैदियों की पैरोल
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देहरादून: पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में जेलों में बंद सजायाफ्ता कैदियों की पैरोल पर रिहाई को लेकर अजीब सी असमंजस की स्थिति खड़ी हो गई है। अभी तक सजायाफ्ता कैदियों को साल में एक बार 15-15 दिन का पैरोल मिला करता था। मुख्यमंत्री को दो माह तक पैरोल पर रिहा करने का अधिकार था। लेकिन त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तराखंड में सिद्धदोष बंदियों को पैरोल देने के लिए जो नई नीति बनाई है उसको लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।

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पैरोल की नई नियमावली बनाने का प्रस्ताव कैबिनेट से पास होते ही लोगों को इसमें कई झोल नजर आने लगे हैं। सबसे खास बात यह है कि अधिसूचना में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि एक बंदी को साल में कितनी बार पैरोल मिलेगा। जबकि इससे पहले साल में एक ही बार पैरोल देने की व्यवस्था थी। खास बात यह है कि नई व्यवस्था में इस बात को लेकर भी असमंजस है कि पैरोल की अवधि समाप्त होने पर भी जेल न पहुंचने पर बंदी के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी।

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1973 के एक शासनादेश के तहत जिलाधिकारी और कमिश्नर कैदी को 15-15 दिन और मुख्यमंत्री दो बार में एक एक महीने का पैरोल दे सकते थे।अब आइए नई नियमावली पर इसके तहत जिलाधिकारी अब केवल तीन दिन का पैरोल दे सकेगा। वह भी तब जब कैदी के परिवार में किसी की मृत्यु हो या विवाह हो। कमिश्नर को पहले की तरह 15 दिन का पैरोल देने का अधिकार बरकरार है, लेकिन मुख्यमंत्री की पैरोल देने की अवधि के अधिकार की सीमा एक साथ दो माह के लिए बढ़ा दी गई है।

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राज्यपाल पहली बार पैरोल व्यवस्था में

नई व्यवस्था में राज्यपाल को पहली बार पैरोल देने की व्यवस्था में शामिल किया गया है। मुख्यमंत्री के बाद राज्यपाल पैरोल को बढ़ाकर 3 माह तक कर सकेंगे। लेकिन नए नियम में यह बात कहीं स्पष्ट नहीं है कि क्या एक बंदी पहले डीएम से तीन दिन, फिर कमिश्नर से 15 दिन, इसके बाद सीएम से एक साथ दो महीने और फिर राज्यपाल से तीन महीने का अलग अलग पैरोल ले सकेगा या फिर किसी एक से एक बार। साथ ही पैरोल लेने के बाद यदि वह नहीं लौटा तो क्या होगा इस पर भी नई नियमावली खामोश है।

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इन्होंने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत नई दिल्ली में एनडीटीवी से की। इसके अलावा हिंदुस्तान लखनऊ में भी इटर्नशिप किया। वर्तमान में वेब पोर्टल न्यूज़ ट्रैक में दो साल से उप संपादक के पद पर कार्यरत है।

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