मोदी साहेब! खट्टर से न हो पाएगा, इनकी विदाई में ही आपकी भलाई है

चंडीगढ़ : हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर अपने राज्य में एक बार फिर विफल साबित हुए। इसके लिए राजनैतिक और प्रशासनिक जीवन में उनका कम अनुभव जिम्मेदार हो या फिर अपनी सरकार पर उनकी पकड़ की कमी, कानून व्यवस्था के हालात से निपटने में वह असफल ही रहे हैं। खासकर उन हालातों में जब हरियाणा की आम जनता को जान-माल का खतरा हो।

वर्ष 2002 में अपनी दो महिला शिष्याओं के साथ दुष्कर्म मामले में अपराधी साबित होने के बाद डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह के अनुयायियों द्वारा मचाए गए उत्पात और आगजनी में 31 लोगों की मौत और 250 लोग घायल हो गए। इस घटना ने खट्टर को राजनीतिक रूप से अनिश्चित स्थिति में पहुंचा दिया है और उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी भी अब खतरे में नजर आ रही है।

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खट्टर का नाम कठिन परिस्थितियों से अयोग्य तरीके से निपटने का पर्याय बन गया है। चाहे वह 2016 के फरवरी में जाट आंदोलन हो जिसमें 30 लोगों की मौत हुई और 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए या फिर 2014 के नवंबर में हरियाणा के हिसार जिले के बरवाला शहर के पास स्थित आश्रम में पुलिस द्वारा अपनी गिरफ्तारी से बचाव के लिए खुद को भगवान बताने वाला रामपाल द्वारा एक निजी सेना खड़ी करना हो।

डेरा सच्चा सौदा द्वारा मचाए गए उत्पाद के बाद विपक्षी पार्टी कांग्रेस और भारतीय राष्ट्रीय लोक दल (आईएलडी) ही नहीं उनकी खुद की पार्टी में ही उनका विरोध शुरू हो गया है।

हालात को सफलतापूर्वक न संभाल पाने के कारण पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने भी खट्टर सरकार को फटकार लगाई। उच्च न्यायालय जाट आंदोलन के दौरान हुई हिंसा पर भी सरकार से नाराज थी।

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अपने तीन वर्षो के कार्यकाल के दौरान खट्टर ने राज्य के लिए कोई याद रखने लायक काम नहीं किया है, हालांकि उन्होंने अपने कार्यकाल के 1000 दिनों के पूरा होने पर बड़े-बड़े दावे किए।

खट्टर का अभी तक का सबसे बड़ा दावा ‘भ्रष्टाचार मुक्त सरकार’ और ‘सुशासन’ का रहा है।

हालांकि भ्रष्टाचार को एक साक्षेप के रूप में भी देखा जा सकता है क्योंकि भ्रष्टाचार के आरोप भुपिंदर सिंह हुड्डा के नेतृत्व वाली कांग्रेस की पिछली सरकार पर भी लगे थे। वहीं खट्टर का ‘सुशासन’ का दावा डेरा हिंसा, जाट आंदोलन और रामपाल मामले के वक्त नजर नहीं आया।

पिछले 34 महीनों में राज्य की प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था में वरिष्ठ नौकरशाहों और अधिकारियों का स्थानान्तरण एक मजाक बन कर रह गया है। मुख्यमंत्री ने अपने दफ्तर में ही प्रमुख सचिवों एवं अन्य नौकरशाहों को कई बार बदला है।

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खट्टर राज्य में निवेश को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, चीन, जापान, सिंगापुर और हांगकांग के दौरे पर गए लेकिन लगातार हो रही हिंसक गतिविधियों ने राज्य को एक ठहराव की स्थिति में पहुंचा दिया है और शायद ही कोई निवेशक राज्य में निवेश करने का जोखिम उठाएगा।

‘हैपनिंग हरियाणा’ का नारा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गलत और हिंसक कारणों से चर्चा का विषय बना हुआ है।

पिछले वर्ष फरवरी में जाट आंदोलन के दौरान जाट युवकों की भीषण हिंसा ने रोहतक को कई दिनों तक घेरे रखा और हरियाणा सरकार को 10 जिलों में सेना बुलानी पड़ी। कई जगहों पर तो सेना को शुरू में घुसने ही नहीं दिया गया।

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यहां तक कि हरियाणा के वित्त मंत्री अभिमन्यु के घर और उनके परिवार द्वारा संचालित स्कूल को भी आग लगा दी गई। प्रदर्शनकारियों द्वारा कई सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाया गया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक, खट्टर जब 26 अक्टूबर 2014 में मुख्यमंत्री बने थे, तब वह राजनीति में एक अनाड़ी थे। वह कभी विधायक भी नहीं रहे, मंत्रीपद और प्रशासनिक पद का अनुभव तो दूर की बात है। खट्टर के तीन वर्षो के कार्यकाल के बाद, भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को उन्हें एक और मौका देने से पहले दोबारा सोचने या फिर राज्य के नेतृत्व के लिए किसी नए चेहरे की तलाश करने की जरूरत है।