रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी: नोबेल जीतने वाले एशिया के पहले वैज्ञानिक थे सी. वी. रमन

रमन की पूरी शिक्षा-दीक्षा भारत में ही हुई। उन्होंने खुद २०० रु। का स्पेक्ट्रममापी डिजाइन किया था। अपनी लगन, परिश्रम और शोध के बल पर वे इतनी महत्वपूर्ण खोज कर सके।

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रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी: नोबेल जीतने वाले एशिया के पहले वैज्ञानिक थे सी. वी. रमन -(courtesy-social media)

नील मणि लाल

नई दिल्ली। आज प्रख्यात वैज्ञानिक सीवी रामन की पुण्य तिथि है। आज का दिन इस महान वैज्ञानिक को नमन करने, उनको स्मरण करने का है। चंद्रशेखर वेंकटरमन या सर सीवी रमन ने फिजिक्स यानी भौतिकी में प्रकाश के क्षेत्र में जबरदस्त काम किया था और इसके चलते उनको वर्ष 1930 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। विज्ञान के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले वो पहले एशियाई थे।

रमन प्रभाव

सर रमन ने प्रकाश के बारे में जो खोज की उसे उनके नाम पर ही रमन प्रभाव के नाम से जाना जाता है। रमन प्रभाव का उपयोग आज भी वैज्ञानिक क्षेत्रों में किया जा रहा है। जब भारत के अंतरिक्ष मिशन चंद्रयान ने चांद पर पानी होने की घोषणा की तो इसके पीछे भी ‘रमन स्पैक्ट्रोस्कोपी’ का ही कमाल था। फॉरेंसिक साइंस में भी ‘रमन प्रभाव’ काफी उपयोग साबित हो रहा है। अब यह पता लगाना आसान हो गया है कि कौन-सी घटना कब और कैसे हुई थी। असल में रमन प्रकीर्णन या रमन प्रभाव फोटोन कणों के लचीले वितरण के बारे में है।

खुद बनाया था स्पेक्ट्रममापी

रमन की पूरी शिक्षा-दीक्षा भारत में ही हुई। उन्होंने खुद 200 रु का स्पेक्ट्रममापी डिजाइन किया था। अपनी लगन, परिश्रम और शोध के बल पर वे इतनी महत्वपूर्ण खोज कर सके। शुरू में रमन ने सूर्य के प्रकाश को बैंगनी फिल्टर से गुजार कर प्राप्त बैंगनी प्रकाश किरण पुन्ज को द्रव से गुजारा।

प्रकाश पुंज मुख्यतः तो बैंगनी रंग का ही था, परन्तु इसे हरे फिल्टर से गुजारने पर इसमें बहुत कम मात्रा में हरी किरणों का अस्तित्व भी देखने में आया। 60 से ज्यादा विभिन्न द्रवों पर प्रयोग दोहराने के बाद यह सुनिश्चित हो गया कि सभी द्रव रमन स्पेक्ट्रम दर्शाते हैं। इसके लिए उन्होंने एक क्वार्टज स्पेक्ट्रोग्राफ का उपयोग किया, जिसके परिणाम मार्च 31, 1928 के इन्डियन जर्नल ऑफ फिजिक्स में प्रकाशित हुए।

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सीवी रमन ने जब यह खोज की थी तो उस समय काफी बड़े और पुराने किस्म के यंत्र थे। खुद रामन ने भी रमन प्रभाव की खोज इन्हीं यंत्रों से की थी। आज रमन प्रभाव ने प्रौद्योगिकी को बदल दिया है। अब हर क्षेत्र के वैज्ञानिक रमन प्रभाव के सहारे कई तरह के प्रयोग कर रहे हैं। इसके चलते बैक्टीरिया, रासायनिक प्रदूषण और विस्फोटक चीजों का पता आसानी से चल जाता है।

अब तो अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इसे सिलिकॉन पर भी इस्तेमाल करना आरंभ कर दिया है। ग्लास की अपेक्षा सिलिकॉन पर रमन प्रभाव दस हजार गुना ज्यादा तीव्रता से काम करता है। इससे आर्थिक लाभ तो होता ही है साथ में समय की भी काफी बचत हो सकती है।

खास बातें

– सर सीवी रमन ने 29 फरवरी, 1928 को प्रकाश सम्बन्धी खोज की घोषणा की थी इसीलिए भारत में प्रत्येक वर्ष ये दिन राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है।

– 1954 में सर सीवी रमन भारत सरकार द्वारा भारत रत्न की उपाधि से विभूषित किया गया।

– 1957 में सर रमन को लेनिन शान्ति पुरस्कार प्रदान किया था।

– चन्द्रशेखर वेंकटरमन का 82 वर्ष की उम्र में 21 नवम्बर 1970 में बंगलुरु में निधन हो गया।

वैज्ञानिक के तौर पर दुनियाभर में अपनी पहचान बनाने वाले सी. वी. रमन की गणित में जबर्दस्त रूचि थी और वर्ष 1907 में उन्होंने एमएससी की डिग्री प्राप्त की, फिर कोलकाता में भारत सरकार के वित्त विभाग में सहायक महालेखाकार के तौर पर कार्यभार संभाला, दफ्तर के काम से समय निकालकर वे द वह इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन साइंस की प्रयोगशाला में अपना अनुसन्धान करते रहते थे।

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया

1917 में रमन ने सरकारी सेवा से त्यागपत्र दे दिया और कोलकाता विश्वविद्यालय में भौतिकी के प्रोफेसर बन गए। इस दौरान भी उन्होंने आईएसीएस में अपना अनुसंधान बदस्तूर जारी रखा। रमन इफ़ेक्ट के लिए सर सी. वी. रमन को दुनिया आज भी याद करती है और जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

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इस खोज का प्रयोग विभीन केमिकल कंपाउंड्स की आंतरिक संरचना समझने के लिए किया जाता है, यह खोज उन्होंने अपने कुछ शिष्यों के साथ मिलकर वर्षों के अनुसंधान के बाद 28 फरवरी वर्ष 1928 को की थी, 21 नवम्बर 1970 की सुबह भारत के इस महान वैज्ञानिक का देहांत हो गया।

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