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भारत के महान क्रांतिकारी उधम सिंह, घर में घुसकर जनरल डायर को मारा

उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब में संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था। बचपन में उनका नाम शेर सिंह रखा गया था। छोटी उम्र में में ही माता-पिता का साया उठ जाने से उन्हें और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी।

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SumanBy Suman

Published on 26 Dec 2020 5:52 AM GMT

भारत के महान क्रांतिकारी उधम सिंह, घर में घुसकर जनरल डायर को मारा
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उधम सिंह के लंदन पहुंचने से पहले जनरल डायर बीमारी के चलते मर गया था. ऐसे में उन्होंने अपना पूरा ध्यान माइकल ओ’ ड्वायर को मारने पर लगाया. और उसे पूरा किया
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नई दिल्ली आज भी साल 1919 को पंजाब में हुए नरसंहार कांड को याद कर रूह कांप उठती है। जो अंग्रेजों ने किया था। उस वक्त पंजाब के गवर्नर रहे माइकल डायर के एक आदेश पर सैकड़ों लोगों को गोलियों से छलनी कर दिया। पंजाब के अमृतसर में हजारों की तादाद में लोग एक पार्क में जमा हुए थे। रॉलेट एक्ट के तहत कांग्रेस के सत्य पाल और सैफुद्दीन किचलू को अंग्रेजों ने अरेस्ट कर लिया था।

लोग वहां दोनों की गिरफ्तारी के खिलाफ शांति से प्रोटेस्ट कर रहे थे। जनरल डायर अपनी फौज के साथ वहां आ धमका। और घेर लिया पूरे बाग को उसने न तो प्रदर्शनकारियों को जाने के लिए कहा और न ही कोई वार्निंग दी। डायर ने बस एक काम किया, अपनी फौज को फायरिंग करने का ऑर्डर दिया।

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इस तरह बिता बचपन

उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब में संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था। बचपन में उनका नाम शेर सिंह रखा गया था। छोटी उम्र में में ही माता-पिता का साया उठ जाने से उन्हें और उनके बड़े भाई मुक्तासिंह को अमृतसर के खालसा अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। यहीं उन्हें उधम सिंह नाम मिला और उनके भाई को साधु सिंह। 1917 में साधु सिंह भी चल बसे। इन मुश्किलों ने उधम सिंह को दुखी तो किया, लेकिन उनकी हिम्मत और संघर्ष करने की ताकत भी बढ़ाई।

1919 में जब जालियांवाला बाग कांड हुआ तो उन्होंने पढ़ाई जारी रखने के साथ-साथ स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने का फैसला कर लिया। तब तक वे मैट्रिक की परीक्षा पास कर चुके थे। सरदार उधम सिंह ने भारतीय समाज की एकता के लिए अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है। 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया।

udham singh

डायर की करतूत से खौला खून

उधम सिंह के सामने ही 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग नरसंहार हुआ था। उन्होंने अपनी आंखों से डायर की करतूत देखी थी।वे गवाह थे, उन हजारों भारतीयों की हत्या के, जो जनरल डायर के आदेश पर गोलियों के शिकार हुए थे। जनरल डायर के इशारे पर हुए जलियांवाला कांड ने उधम सिंह को इस कदर हिला कर रख दिया कि उन्होंने यहां की मिट्टी हाथ में लेकर कसम खायी और क्रांतिकारी घटनाओं में उतर पड़े। सरदार उधम सिंह क्रांतिकारियों से चंदा इकट्ठा कर देश के बाहर चले गए।

जनरल डायर की साल 1927 में बीमारी से मौत

उधम सिंह के लंदन पहुंचने से पहले जनरल डायर की साल 1927 में बीमारी से मौत हो गई। ऐसे में उन्होंने माइकल डायर को मारने के संकल्प को पूरा किया। किसी तरह से वो छिपते-छिपाते साल 1934 में लंदन पहुंचे। वहां पर वे 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। उधम सिंह ने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवॉल्वर भी खरीद ली। और माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगे।

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21 साल बाद लिया बदला

उधम सिंह ने अंग्रेजों की सरजमीं पर जाकर उसका बदला लिया और बिना किसी डर के खुशी खुशी फांसी पर झूल गए। जिसकी वजह से उन्हें शहीद ए आजम की उपाधि से नवाजा गया। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हॉल में बैठक थी। यहां पर माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह को वह वक्त मौका मिला गया जिसका उन्हें इंतजार था।

फिर चढ गए हंसते- हंसते फांसी

उधम सिंह अपनी रिवॉल्वर को एक मोटी किताब में छिपा ली और इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था ताकि डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके। सभा के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ डायर पर धुआंधार गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकी मौत हो गई। लेकिन, वह उसी जगह पर खड़े रहे। उधम सिंह को फौरन गिरफ्तार किया गया और अदालत ने उन्हें फांसी दे दी।

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