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सरदार पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाता है देश

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 31 Oct 2017 1:39 AM GMT

सरदार पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाता है देश
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दीपक राजदान

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्रता के पश्चात् भारत की एकजुटता के लिए पुरजोर तरीके से काम किया। जिससे एक नए राष्ट्र का उदय हुआ। देश की एकता की रक्षा करने के समक्ष कई चुनौतियां स्पष्ट रूप से विद्यमान थीं। सरदार पटेल ने लाजवाब कौशल के साथ इन चुनौतियों का सामना करते हुए देश को एकता के सूत्र में बांधने के कार्य को पूरा किया और एकीकृत भारत के शिल्पकार के रूप में पहचान हासिल की। ऐसे में 31 अक्टूबर के दिन उनकी बहुमूल्य विरासत का जश्न मनाने के लिए देश उनकी जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाता है।

सरदार भारत के राजनीतिक एकीकरण के पिता रूपी नायक का नाम था। उन्होंने भारतीय संघ में कई छोटे राज्यों के विलय की व्यवस्था की। उनके मार्गदर्शन और सशक्त निश्चय के अंतर्गत कई राज्य संयुक्त रूप से बड़ी संस्थाओं में तब्दील होने के बाद भारतीय संघ में शामिल हुए। क्षेत्रवाद ने राष्ट्रवाद का मार्ग प्रशस्त किया, क्योंकि उन्होंने लोगों से बड़ा सोचने और मजबूत बनने का आह्वान किया था। आज भारत का प्रत्येक हिस्सा आजादी के बाद के शुरुआती दिनों में सरदार पटेल द्वारा किए गए कार्य का महोत्सव मनाता है।

राष्ट्र की एकता, अखंडता और सुरक्षा को संरक्षित और मजबूत करने के प्रति सरकार के समर्पण को दर्शाने के क्रम में 31 अक्टूबर को देशभर में एक विशेष अवसर के तौर पर एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। सरदार पटेल गणतंत्र भारत के संस्थापकों में से एक हैं, जिन्होंने अपने जीवनकाल में भारत के उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जैसी अहम जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है।

पिछले वर्ष 31 अक्टूबर 2016 को रन फॉर यूनिटी के अवसर पर प्रधानमंत्री ने कहा था कि आज हम कश्मीर से कन्याकुमारी, अटक से कटक और हिमालय से महासागर तक हर तरफ तिरंगा देख रहे हैं। आज हम देश के हर एक हिस्से में तिरंगा देख सकते हैं और इसका पूरा श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता है। प्रधानमंत्री ने कहा था कि ‘चाणक्य के बाद, केवल सरदार पटेल ही वह व्यक्ति थे, जो देश को एकता के सूत्र में बांध सके।’

गुजरात के आणंद के पास स्थित करमसाद गांव के एक साधारण भूस्वामी के यहां 31 अक्टूबर 1875 को जन्मे सरदार का नाम वल्लभभाई जवेरभाई पटेल रखा गया था। एक युवा वकील के रूप में अपनी कड़ी मेहनत के जरिए उन्होंने पर्याप्त पैसा बचाया ताकि वह इंग्लैंड में उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें। आगामी समय में वह एक निडर वकील के तौर पर बड़े हुए, जिसे जनहित के मुद्दों पर कड़े एवं निडर अधिवक्ता के रूप में जाना जाता था।

राजस्व दरों को लेकर 1928 में प्रधान कमांडर के रूप में बारदोली किसान आंदोलन के आयोजन के दौरान उन्होंने किसानों का आह्वïन किया था कि वे लंबे समय तक परेशानियां सहने के लिए तैयार रहें। अंतत: सरदार के नेतृत्व में चल रहा यह आंदोलन सरकार पर दबाव बनाने और परिवर्तित दरों को वापस कराने में सफल रहा। एक ग्राम सभा में एक किसान ने सरदार पटेल को संबोधित करते हुए कहा कि ‘आप हमारे सरदार हैं।’ बारदोली आंदोलन ने सरदार वल्लभभाई पटेल को राष्ट्रीय परिदृश्य पर पहचान दिलाई।

(लेखक साहित्यकार हैं)

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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