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मोदी-शिंजो : मेरा यार जापानी, मेरी रफ्तार जापानी, हमारी नई कहानी

मेरा जूता है जापानी और पतलून इंग्लिस्तानी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी... इसकी अगली पीढ़ी का नया गीत मोदी जी ने लिख दिया।

tiwarishalini

tiwarishaliniBy tiwarishalini

Published on 14 Sep 2017 11:50 AM GMT

मोदी-शिंजो : मेरा यार जापानी, मेरी रफ्तार जापानी, हमारी नई कहानी
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संजय तिवारी संजय तिवारी

मेरा जूता है जापानी और पतलून इंग्लिस्तानी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी... इसकी अगली पीढ़ी का नया गीत मोदी जी ने लिख दिया। मेरा यार जापानी , मेरी रफ़्तार जापानी ... ये है भारत की जवानी, हमारी नई कहानी।

इसे सपनो की उड़ान नहीं कह सकते लेकिन उम्मीदों की रफ़्तार तो मानना ही होगा। भारत के पीएम नरेंद्र मोदी और जापान के उनके समकक्ष शिंजो आबे की दोस्ती ने सच में इस उम्मीद को रफ़्तार दे दिया है।

भारत और जापान की यह प्रगाढ़ता केवल एक बुलेट ट्रैन तक ही सीमित नहीं है। लगभग पांच लाख करोड़ के करार में से बुलेट ट्रेन न तो केवल एक हिस्सा है। बाकी तो और भी बहुत कुछ है जो भारत को नयी उड़ान के लिए आवश्यक था। भारत और जापान का रिश्ता बड़ी तेजी से एक नए मुकाम की ओर बढ़ रहा है।

मोदी और आबे दोनों देशों के बीच जारी बहुस्तरीय सहयोग की समीक्षा करेंगे और भविष्य में इसे और बढ़ाने पर बात करेंगे। दोनों प्रधानमंत्रियों की मुलाकात में परमाणु ऊर्जा, रक्षा उपकरणों की खरीद-फरोख्त और भारत के बुनियादी ढांचे के सुधार में जापान के सहयोग का मुद्दा छाया रहेगा। पिछले कुछ समय में भारत-जापान मैत्री आर्थिक और सामरिक दोनों मोर्चों पर प्रगाढ़ हुई है। डोकलाम सीमा पर भारत और चीन के बीच चली तनातनी के दौरान भारत, जापान और अमेरिका ने साथ मिल कर सैन्य अभ्यास किया। जुलाई में भारत-जापान असैन्य परमाणु समझौता भी लागू हो गया, जिसके तहत जापान भारत में छह नए एटमी ऊर्जा संयंत्र लगाएगा।

पिछले डेढ़ दशकों में भारत के विकास में जापानी निवेश ने अहम भूमिका निभाई है। जापान की मदद से देश में कई परियोजनाएं चल रही हैं और कई प्रस्तावित हैं। भारत और जापान ‘एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (एएजेसी)’ पर काफी जोर-शोर से काम कर रहे हैं। आबे और मोदी की मुलाकात से इस प्रॉजेक्ट को रफ्तार मिलने की उम्मीद है। इस वृहद परियोजना में ईरान के चाहबहार बंदरगाह को विकसित करना भी शामिल है, जिसके जरिए अफगानिस्तान और मध्य एशियाई देशों तक भारत की पहुंच आसान हो जाएगी।

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यह एक तरह से चीन के ‘वन बेल्ट वन रोड’ प्रॉजेक्ट का जवाब भी होगा। एशिया में चीन की बढ़ती आक्रामकता को ध्यान में रखते हुए जापान और भारत, दोनों को अभी एक दूसरे की जरूरत है। जिस तरह शिंजो आबे ने पाकिस्तान को केंद्रित कर आतंकवाद पर आवाज़ बुलंद की है वह भारत के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। जहां तक बुलेट ट्रेन प्रॉजेक्ट का प्रश्न है तो इसका मकसद अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए यात्रियों को तेज यात्रा का एक विकल्प उपलब्ध कराना और देश की इकॉनमी को रफ्तार देना है।

इसमें रेलवे की सिर्फ जमीन लग रही है। 1.20 लाख करोड़ की कॉस्ट में से 88% जापान दे रहा है, वो भी 0.1 इंट्रेस्ट रेट पर। यह कहीं से भी महंगा सौदा नहीं है। रेलवे सिक्युरिटी पर अच्छा काम हो रहा है। सुरेश प्रभु के लिए बदकिस्मती की बात रही कि रेल हादसे ज्यादा हो गए।हलाकि मई व्यक्तिगत रूप से प्रभु को अभी भी इस बात के लिए बधाई देता हूँ की वर्षो से बेपटरी चल रही रेल को पटरी पर लाने की उन्होंने जीतोड़ कोशिश की , यदि सफल नहीं हुए तो इसके लिए केवल प्रभु नहीं बल्कि देश में रेल की जंग लगी व्यवस्था रही।

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ कंस्ट्रक्शन मैनेजमेंट एंड रिसर्च के डीन डॉ. जनार्दन कोनेर कहते है कि अगर अस्पतालों में बदइंतजामी होती है तो नए अस्पताल खोलना हम बंद नहीं कर देते। उसी तरह बुलेट ट्रेन में कोई बुराई नहीं है। इकोनॉमी के लिहाज से देखें तो इस प्रोजेक्ट की तुरंत जरूरत नहीं थी। आने वाले 10 साल में जरूरत जरूर थी। यह देखने वाली बात है कि दुनिया में जहां कहीं बुलेट ट्रेन शुरू हुई, वहां क्या असर दिखा? लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के डॉ. गैब्रियल अल्फेल्ड्‌ट ने अपनी रिसर्च में कहा है कि जिन शहरों से बुलेट ट्रेन गुजरी, वहां दूसरे शहरों के मुकाबले GDP ग्रोथ 2.7% ज्यादा थी। जापान में बुलेट ट्रेन चलाने वाली कंपनी शिंकान्सेन की रिसर्च बताती है जहां-जहां बुलेट ट्रेन के स्टेशन थे, उन शहरों की सरकारों का रेवेन्यू 155% बढ़ गया।

वहीं, ये ट्रेनें ट्रेडिशनल रेल या रोड ट्रांसपोर्ट के मुकाबले 70% वक्त बचाती हैं। बीसीडी कंसल्टिंग ग्रुप की स्टडी बताती है कि बुलेट ट्रेनों में सवार होने का बोर्डिंग टाइम सिर्फ आठ से दस मिनट है, जबकि हवाई सफर में बोर्डिंग, टैक्सी और टेक ऑफ टाइम में एक से डेढ़ घंटे का वक्त चला जाता है।

बुलेट ट्रेन चलने के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि करीब 40,000 मुसाफिर रोजाना इससे सफर करेंगे जो आंकड़ा आगे चलकर 1,56,000 का स्तर भी छू सकता है।

इसके और भी दूरगामी प्रभाव होंगे। मसलन बुलेट ट्रेन से महानगरों के बीच आवाजाही इतनी आसान हो जाएगी कि कामकाज के लिए लोगों को उसी शहर में नहीं रहना पड़ेगा। इसके व्यापक सामाजिक लाभ मिलेंगे यानी कोई व्यक्ति शहर में रहने की ऊंची कीमत चुकाए बिना ही शहरी तंत्र से जुड़े पूरे लाभ उठा सकता है। इसके साथ ही यात्रा के बीच पड़ाव में यह जिन शहरों में रुकेगी वहां भी आर्थिक-व्यापारिक हलचल बढ़ाने का काम करेगी। यूरोप में तेज रफ्तार रेल नेटवर्क प्रांतीय शहरों के लिए बड़ी सौगात लेकर आया है। परियोजना पूरी होने के बाद उसके परिचालन और रखरखाव के लिए प्रत्यक्ष रूप से 4,000 लोगों को रोजगार मिलेगा तो लगभग 16,000 लोगों को इससे अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलने की संभावना है।

रोजगार सृजन के अलावा इस परियोजना से बलास्टलेस ट्रैक निर्माण, संचार एवं सिग्नलिंग उपकरणों को लगाने और बिजली वितरण तंत्र से संबंधित हुनर और अनुभव भी मिलेगा। रेलवे तंत्र के रखरखाव के लिए आधुनिक और विश्वस्तरीय तौर-तरीके अपनाए जाएंगे जिससे भारतीय रेलवे द्वारा वर्तमान में अपनाई जा रही पद्धतियों में भी आमूलचूल बदलाव आएगा। ट्रेन के भीतर साफ-सफाई को लेकर भी भारत जापान से बहुत कुछ सीख सकता है। जापान में सिक्स सिग्मा पद्धति के जरिये स्टेशन पर खड़ी ट्रेन के अंदर पूरी सफाई महज सात मिनटों में पूरी हो जाती है। अगर इसे भारत में चल रही रेलगाड़ियों और मेट्रो ट्रेन में भी आजमाया जाए तो स्वच्छता की तस्वीर काफी सुधर सकती है। हाईस्पीड रेल (एचएसआर) सिस्टम आधारित तेज रफ्तार रेल के संभावित पर्यावरणीय लाभ भी हैं।

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यह सिस्टम ईंधन के लिहाज से विमानों की तुलना में तीन गुना और कारों के बनिस्बत पांच गुना अधिक किफायती है। सड़कों और हवाई अड्डों पर जाम के चलते समय और ईंधन की बर्बादी के कारण अमेरिका को हर साल 87 अरब डॉलर का नुकसान उठाना पड़ता है।

भारत की जीवन रेखा है रेल। अब यह एक की संस्कृति बन चुकी है। यहां तकरीबन पौने तीन करोड़ लोग रोजाना रेल में सफर करते हैं। भारत बुनियादी ढांचे की जिन समस्याओं से जूझ रहा है उन्हें सुलझाने का यह सही समय है। कहा जा रहा है कि जापान द्वारा इसके लिए बहुत आसान शर्तों पर और बहुत कम ब्याज पर कर्ज दिया जा रहा है। लेकिन यह कर्ज डॉलर में दिया जाएगा, तो डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट का रुझान देखते हुए कहीं हम अपने ऊपर कर्ज का बहुत ज्यादा बोझ तो नहीं लेने जा रहे हैं?

एक आशंका यह भी है कि खर्च की एक अलग मद सामने आ जाने के कारण कहीं संकटग्रस्त भारतीय रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्याएं और न बढ़ जाएं? लोग चाहते हैं कि बुलेट ट्रेन तो आए, लेकिन मौजूदा रेलवे ढांचे में यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्राथमिकता में कोई ढील न आने पाए। सरकार को देश की जनता को इस बात के लिए भी आश्वस्त करना होगा कि भारतीय रेल अपनी समयसारिणी से चले। अभी जो हालत है वह बहुत ही निराशाजनक है। अधिकाँश ट्रेने अपने समय से नहीं चलतीं। इसके कारण करोडो लोगो के समय और श्रम की भी बर्बादी होती है। मोदी सरकार के आने के बाद उम्मीद की जा रही थी की स्थितियां ठीक होंगी लेकिन कोई सुधार दिखा नहीं। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि अपनी ट्रेनों को अभी तक समय से न चला पाने वाली भारतीय रेल बुलेट ट्रैन कैसे चला सकेगी। सरकार को इस आशंका के प्रति भी आश्वस्त करना चाहिए।

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Excellent communication and writing skills on various topics. Presently working as Sub-editor at newstrack.com. Ability to work in team and as well as individual.

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