SC के फैसले से टेलीकॉम कंपनियों को लगा झटका, 23 जनवरी तक करना होगा भुगतान

टेलीकॉम कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है।एजीआर ( AGR) के मुद्दे पर टेलीकॉम कंपनियों की पुनर्विचार याचिका कोर्ट ने खारिज कर दी है। कंपनियों को अब केंद्र सरकार को 92 हजार करोड़ रुपये चुकाने होंगे। कोर्ट के फैसले के मुताबिक 23 जनवरी तक टेलीकॉम कंपनियों को बकाया चुकाना है।

Published by suman Published: January 17, 2020 | 10:38 am
Modified: January 17, 2020 | 11:16 am

नई दिल्ली  टेलीकॉम कंपनियों को सुप्रीम कोर्ट से झटका लगा है। एजीआर ( AGR) के मुद्दे पर टेलीकॉम कंपनियों की पुनर्विचार याचिका कोर्ट ने खारिज कर दी है। कंपनियों को अब केंद्र सरकार को 92 हजार करोड़ रुपये चुकाने होंगे। कोर्ट के फैसले के मुताबिक 23 जनवरी तक टेलीकॉम कंपनियों को बकाया चुकाना है। टेलीकॉम कंपनियों को गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने जोर का झटका दिया है। एजीआर के बकाये के भुगतान के मामले में पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी गई है, जिसपर मोबाइल सेवा संगठन सीओएआई (COAI) ने गहरी निराशा जताई है। संगठन ने कहा कि इससे सकंट में फंसे क्षेत्र की समस्या बढ़ेगी। न्यायालय ने दूरसंचार कंपनियों को 1.47 लाख करोड़ रुपये के वैधानिक बकाये की रकम 23 जनवरी तक जमा करने के अपने आदेश पर पुनर्विचार के लिए दायर याचिकाएं गुरुवार को खारिज कर दीं।

 

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सीओएआई के महानिदेशक राजन एस मैथ्यूज ने कहा, ‘हम समायोजित सकल राजस्व मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन दूरसंचार क्षेत्र में इससे गहरी निराशा है।’ उन्होंने कहा, ‘फिलहाल यह क्षेत्र 4 लाख करोड़ रुपये का कर्ज से जूझ रहा है। ग्राहकों को लाभ पहुंचाने, रोजगार के अवसर बढ़ाने, (सरकार के लिए) राजस्व सृजित करने आदि की दृष्टि से भारतीय अर्थव्यवस्था में इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है। यह क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 6.5 प्रतिशत का योगदान कर रहा है।’मैथ्यूज ने कहा कि कंपनियों के लिए पुनर्विचार याचिका ‘तिनके का सहारा था’, लेकिन इसके खारिज होने से वित्तीय संकट बढ़ेगा और इसका असर टेलीकॉम उद्योग पर पड़ेगा।

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बता दें कि टर्मिनेशन शुल्क के अलावा टेलीकॉम कंपनियों को मिलने वाले सभी राजस्व, रोमिंग शुल्क एजीआर का ही हिस्सा हैं. जबकि टेलीकॉम कंपनियों की दलील है कि गैर-दूरसंचार राजस्व जैसे किराया, इंटरनेट आय, लाभांश आय आदि को एजीआर से बाहर रखा जाना चाहिए। साल 2006 में टेलीकॉम कंपनियों के पक्ष में फैसला दिया था। इसके बाद इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। साल 2008 में कोर्ट ने TD SAT के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी थी और टेलीकॉम कंपनियों को नोटिस जारी किया था।