बड़ा आरोप : त्रिपुरा में जनजाति पार्टी को उकसाने के पीछे पीएमओ का हाथ

Published by Rishi Published: June 19, 2017 | 5:13 pm
Modified: June 19, 2017 | 5:15 pm

अगरतला : त्रिपुरा में सत्ताधारी मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने सोमवार को दावा किया कि ‘प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के निर्देश पर’ प्रदेश की एक क्षेत्रीय पार्टी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले समस्या खड़ी करने का प्रयास कर रही है। त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (टीटीएएडीसी) के तहत आने वाले इलाके को काटकर अलग राज्य के गठन की मांग करने वाली इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) ने अपनी मांगों के समर्थन में राज्य की जीवनरेखा राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-8 तथा प्रदेश की एकमात्र रेलवे लाइन को 10 जुलाई से अनिश्चिकालीन बंद करने का ऐलान किया है।

माकपा के राज्य सचिव बिजन धर ने कहा, “पीएमओ के निर्देश पर आईपीएफटी एक खतरनाक सड़क व रेल रोको आंदोलन शुरू करने जा रही है। आईपीएफटी के नेताओं ने नई दिल्ली में प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह से 17 मई को मुलाकात के बाद सड़क व रेल रोको आंदोलन का ऐलान किया है।”

उन्होंने कहा, “मणिपुर विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले भाजपा ने यूनाइटेड नागा काउंसिल (यूएनसी) को राज्य के अहम राष्ट्रीय राजमार्ग को अवरुद्ध करने के लिए मजबूर किया, ताकि तत्कालीन कांग्रेस सरकार को चिंतानजनक हालात में ला दिया जाए। इसका मकसद पार्टी को सत्ता से बाहर करना था। मणिपुर में भाजपा के सत्तासीन होने के 48 घंटों के भीतर कई महीने से चल रहा आंदोलन वापस ले लिया गया।”

उन्होंने कहा कि यूएनसी नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड (एनएससीएन-आईएम) का राजनीतिक संगठन है।

माकपा केंद्रीय कमेटी के सदस्य धर ने यह भी आरोप लगाया कि आईपीएफटी के अध्यक्ष नरेंद्र चंद्र देबबर्मा ने ऑल इंडिया रेडियो, अगरतला का स्टेशन निदेशक रहते हुए बांग्लादेश के उग्रवादी संगठनों के साथ बैठकें की और इन तथ्यों से केंद्र सरकार तथा राज्य की खुफिया एजेंसियां अवगत थीं।

उन्होंने कहा, “उग्रवादी संगठन नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (एनएलएफटी) ने हाल में अपने नेता को बदला और अगले विधानसभा चुनाव में आईपीएफटी के समर्थन का फैसला लिया। भाजपा का आईपीएफटी के साथ गुप्त समझौता है।”

वाम नेता ने कहा, “अगर इस छोटे से राज्य को तोड़कर एक अलग राज्य बनाया जाता है, तो त्रिपुरा का कोई अस्तित्व नहीं रह जाएगा। और तो और, दशकों पुरानी स्थानीय समरसता भी खत्म हो जाएगी।”

भाजपा तथा आईपीएफटी के नेताओं ने हालांकि आरोपों से इनकार किया है।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बिप्लब देव ने कहा, “माकपा का दावा बिल्कुल बेबुनियाद और काल्पनिक है। भाजपा ने त्रिपुरा के विभाजन का कभी समर्थन नहीं किया। वाम मोर्चा समस्या पैदा करने वाले व शांति भंग करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कानूनी व प्रशासनिक कार्रवाई कर सकता है।”

भाजपा नेता ने कहा, “माकपा के कुशासन के कारण त्रिपुरा में जनजाति समुदाय के लोग पिछड़े हैं।”

माकपा की केंद्रीय कमेटी के सदस्य गौतम दास ने भाजपा नेता की आलोचना की। उन्होंने कहा, “बिप्लब देब ने अपनी राजनीतिक पारी की अभी शुरुआत की है। उन्हें यह नहीं पता कि अलग राज्य की मांग सन् 1978 में माकपा के त्रिपुरा में सत्ता में आने के तुरंत बाद शुरू हुई थी। अब आईपीएफटी ने एक बार फिर उस मांग को दोहराया है, जो प्रतिबंधित एनएलएफटी का मुखौटा है।”

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