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बिहार में कांग्रेस को 'कैप्टन' नहीं मानेंगे साथी क्षेत्रीय 'खिलाड़ी'

Rishi

RishiBy Rishi

Published on 13 Sep 2018 2:13 PM GMT

बिहार में कांग्रेस को कैप्टन नहीं मानेंगे साथी क्षेत्रीय खिलाड़ी
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शिशिर कुमार सिन्हा, पटना

भारत बंद का मुद्दा ठोस था, जनता से जुड़ा था। कांग्रेस ने इसे शांतिपूर्ण रखते हुए ‘जनता का बंद’ साबित करने का हर संभव प्रयास किया था। लेकिन, बिहार में इस प्रयास को पलीता लग गया। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में लगी आग को नियंत्रित करने के लिए भाजपा पर दबाव बनाना था, लेकिन बिहार में हुए हंगामे के कारण कहीं न कहीं कांग्रेस ही परेशान है। इस ‘भारत बंद’ के क्षेत्रीय दलों से सहयोग के बहाने बिहार में कांग्रेस खुद को ‘कैप्टन’ साबित करना चाह रही थी, लेकिन शांतिपूर्ण बंद के आह्वान के बावजूद हुए हंगामे ने एक तरह से दिखा दिया कि क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के दिशा-निर्देश पर चलने को राजी नहीं है। बिहार कांग्रेस के नेता बार-बार कह रहे हैं कि बंद के दौरान हंगामा उनके सहयोगियों ने नहीं किया, लेकिन बड़ा सवाल है कि ‘भारत बंद’ के तहत महागठबंधन के बैनर तले हंगामा करने वालों पर कांग्रेस या सहयोगी नियंत्रण कैसे नहीं कर सके।

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हंगामे की आशंका थी, फिर भी कोई नहीं चेता

बिहार में भारत बंद के दौरान हंगामे की आशंका थी। कांग्रेस की ओर से बंद के आह्वान के बाद जैसे-जैसे क्षेत्रीय दलों ने सहयोग की घोषणा की, आशंका बढ़ गई। कांग्रेस का कहना है कि उसके बंद में भाजपा, बजरंग दल और आरएसएस के कार्यकर्ताओं के द्वारा हंगामे की आशंका थी, हालांकि उसके पास इस बात का जवाब नहीं है कि आशंका के मद्देनजर संगठन के स्तर पर पार्टी ने बचाव की क्या तैयारी रखी थी।

दूसरी तरफ, सरकारी सिस्टम को देखें तो इसे भी हंगामे की पूरी आशंका थी। कांग्रेस के बंद में जैसे ही राजद, हम, जाप जैसे दलों के कूदने की जानकारी सामने आई, सरकारी अधिकारियों के भी हाथ-पांव फूलने लगे थे। कई अधिकारियों ने तो निजी स्कूलों को बाकायदा चिट्‌ठी तक जारी कर दी कि स्कूल खोलना या बंद रखना आपका निर्णय है, लेकिन किसी अनहोनी की स्थिति में सरकारी तंत्र इसके लिए जिम्मेदार नहीं होगा। जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की जगह सरकारी तंत्र अगर बंद को लेकर झारखंड प्लान पर उतरा होता तो राष्ट्रीय स्तर पर बिहार में बंद की अराजक तस्वीरें शायद ही सामने आतीं। झारखंड में बंद की निगरानी कैमरे और ड्रोन से की जाती है और लोगों को जुटने या अराजकता फैलाने के पहले नियंत्रित करने की पर्याप्त व्यवस्था रहती है, लेकिन बिहार में अब तक सिर्फ विधानसभा, सचिवालय और मुख्यमंत्री-मंत्री आवास की सुरक्षा को लेकर ही पूरा सिस्टम काम करता दिखता है। यही कारण है कि भारत बंद के दौरान पटना समेत पूरे प्रदेश में विभिन्न क्षेत्रीय दलों के झंडे-बैनर वाले लोगों ने जमकर तोड़फोड़ की। तोड़फोड़ की इन तस्वीरों के अलावा जगह-जगह आगजनी, ठेले-खोमचों को बिखेरने और निजी वाहन से आवाजाही कर रहे लोगों के साथ अपमानजनक व्यवहार की सैकड़ों सूचनाएं प्रशासनिक तंत्र तक भी पहुंचीं।

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राजद ने किया हाईजैक, जाप ने गुस्सा उतारा

बंद का आह्वान कांग्रेस का था, लेकिन उसकी ओर से निर्धारित सिस्टम भी नहीं चला और नियम भी नहीं। कांग्रेस ने सुबह नौ बजे से बंद की घोषणा की थी, लेकिन तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल, जीतन राम मांझी के नेतृत्व वाली हम (से), पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी (जाप) के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के नेता सुबह से एक्टिव हो गए। सुबह सात बजे से ही हंगामे की सूचनाएं फिज़ा में इस तरह फैलने लगीं कि लोग डरे-सहमे घर में कैद हो गए। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जब तक बंद के लिए निर्धारित समय तक निकलते, तेजस्वी यादव-पप्पू यादव जैसे नेता सुर्खियां बटोर चुके थे। बिहार कांग्रेस के नेता बंद के पूरे फॉर्मेट से अलग जनसभा के अंदाज में रहे, जबकि इससे पहले, इस समय और इसके बाद भी पूरे बिहार में हंगामे का दौर चलता रहा।

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आशीष शर्मा ऋषि वेब और न्यूज चैनल के मंझे हुए पत्रकार हैं। आशीष को 13 साल का अनुभव है। ऋषि ने टोटल टीवी से अपनी पत्रकारीय पारी की शुरुआत की। इसके बाद वे साधना टीवी, टीवी 100 जैसे टीवी संस्थानों में रहे। इसके बाद वे न्यूज़ पोर्टल पर्दाफाश, द न्यूज़ में स्टेट हेड के पद पर कार्यरत थे। निर्मल बाबा, राधे मां और गोपाल कांडा पर की गई इनकी स्टोरीज ने काफी चर्चा बटोरी। यूपी में बसपा सरकार के दौरान हुए पैकफेड, ओटी घोटाला को ब्रेक कर चुके हैं। अफ़्रीकी खूनी हीरों से जुडी बड़ी खबर भी आम आदमी के सामने लाए हैं। यूपी की जेलों में चलने वाले माफिया गिरोहों पर की गयी उनकी ख़बर को काफी सराहा गया। कापी एडिटिंग और रिपोर्टिंग में दक्ष ऋषि अपनी विशेष शैली के लिए जाने जाते हैं।

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