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''सुहाग की निशानियाँ'' जरूरत या मजबूरी...

जी हाँ यह बहुत दूर तक जाने वाली या केवल एक बात पर खत्म हो जाने वाली बहस है। बहुत से लोग इसे भारत की संस्कृति और परंपरा कहकर चुप हो जाना चाहेंगे, तो कुछ कहेंगे कि यह झूठे नारीवाद का एक उदाहरण हो सकता है।

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NewstrackBy Newstrack

Published on 21 March 2021 3:05 AM GMT

सुहाग की निशानियाँ जरूरत या मजबूरी...
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priya-saini

Priya Saini

प्रिया सैनी

लखनऊ: समाज के आज-कल के बदलते स्वरूप को देखते हुए एक महिला का मासूम सा लगने वाला बेहद अहम सवाल....क्या ये सुहाग की निशानियां केवल हमारे लिए हैं? क्यों हमारे पति किसी ऐसी निशानी को नहीं अपनाते जिससे वे दूर से दिखाई दें कि वे भी शादीशुदा हैं?

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शादीशुदा होने का सबूत

जी हाँ यह बहुत दूर तक जाने वाली या केवल एक बात पर खत्म हो जाने वाली बहस है। बहुत से लोग इसे भारत की संस्कृति और परंपरा कहकर चुप हो जाना चाहेंगे, तो कुछ कहेंगे कि यह झूठे नारीवाद का एक उदाहरण हो सकता है। यह कोई नई बात कतई नहीं है, दरअसल महिलाओं के ऐसे सवालों को जिनका जवाब तलाशने में मुश्किल हो उन्हें ऐसे जवाबों से दबा दिया जाता है। लेकिन यह सब सुनने के बाद 27 साल की टीना अपनी बात पर अड़ी हुई हैं, वे कहती हैं कि जब तक मुझे कोई संतुष्ट कर देने वाला जवाब नहीं मिल जाता मैं हार नहीं मानुंगी।

टीना ग्रेटर-नोएडा (वेस्ट) की रहने वाली एक घरेलू महिला हैं

टीना ग्रेटर-नोएडा (वेस्ट) की रहने वाली एक घरेलू महिला हैं, और चार साल की काव्या की मां हैं। टीना कहती हैं कि वे एक ऐसे समाज में पली बड़ी हैं जहां लड़कियां पैदा होने का मतलब केवल यह है कि मां-बाप पर उस लड़की की शादी करने जिम्मेदारी आ चुकि है। यहां बेटियों को केवल उस सीमा तक पढ़ाया जाता है जिसपर उन्हें कोई लड़का या उसका परिवार यह कह कर नामंजूर न करदे कि लड़की अनपढ़ है। ऐसे समाज में रहते हुए इन्होंने बी.बा.ए. (स्नातक) किया है, और विरोधी आवाजों को अनसुना करते हुए अपनी मर्जी से शादी की है।

शादी के बाद टीना अपनी बदली हुई जिंदगी का अनुभव साझा करती हैं

शादी के बाद टीना अपनी बदली हुई जिंदगी का अनुभव साझा करती हैं। बतौर टीना वे समाज की बाकी शादीशुदा लड़कियों की तरह कम सजना सवरना पसंद करती हैं। वे मानती हैं कि शादी जैसी संस्था में आने के बाद कुछ नहीं बदलता सिवाय आपकी निजी जिंदगी के, लेकिन कुछ लोग शादी के बाद लड़की को पूरी तरह बदला हुआ देखना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने कुछ शर्तें या चीज़ें निश्चित की हुई हैं, जैसे- खास तरह के कपड़े (सलवार-सूट या साड़ी), मंगलसूत्र या पायल जैसे ज़ेवरात, सिंदूर और लाली जैसे सुहाग की अहम निशानी माने जाने वाले श्रंगार। अगर उन्हें शादीशुदा महिला इन शर्तों का पालन करती दिखाई नहीं देती हैं तो उनकी नजरों में या तो वह अपने पति के नियंत्रण में नहीं है या फिर उसे संस्कार नहीं सिखाए गए हैं।

वे समाज के ओर से स्थापित की गई कुछ शर्तों को मानने से परहेज करती हैं

इन दोनों ही शर्तों के बीच एक चीज़ खोई हुई नज़र आती है और वह है औरत की अपनी मर्जी, उसकी जीवन जीने की इच्छा। टीना कहती हैं कि वे समाज के ओर से स्थापित की गई कुछ शर्तों को मानने से परहेज करती हैं और इसपर लोगों की प्रतिक्रियाओं को सकारात्मकता से लेती हैं। टीना अपने साथ हुई एक घटना को याद करते हुए हंसती हैं और बताती हैं- कि एक बार वे अपनी मां के साथ बाजार में थीं तो उनके साथ एक वाका पेश आया। सामान खरीदते समय दुकानदार किसी बात पर बोला कि जब आपकी शादी हो जाएगी तब आपको पता लगेगा। टीना उसे बताती हैं कि 2 साल पहले ही उनकी शादी हो चुकि है।

दुकानदार कहता है कि लगती नहीं हैं आप... न मंगलसूत्र न सिंदूर..आपको देखकर कोई नहीं कह सकता कि आप शादीशुदा हैं। तभी वे दुकानदार से पूछती हैं कि क्या मंगलसूत्र और सिंदूर शादी का प्रमाणपत्र है या फिर समाज में महिलाओं की उपलब्धता का सबूत...?

शादीशुदा पुरुष घर के बाहर अवैध संबंध रखते हैं

टीना कहती हैं कि जिसने भी सिंदूर और मंगलसूत्र को हमारी परंपरा और संस्कार का हिस्सा बनाया क्या उसने पुरुषों के लिए कोई ऐसी निशानी निश्चित की जिससे बाकी महिलाएं पता लगा पाएं कि फलां पुरुष शादीशुदा है। आज कल समाज में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में से कुछ प्रतिशत केवल इस बात की देन हैं कि शादीशुदा पुरुष घर के बाहर अवैध संबंध रखते हैं। जब वे संबंध किसी मुकाम पर नहीं पहुंच पाते तो कोई न कोई अपराध जन्म लेता है जिसकी शिकार केवल महिलाएं ही होती हैं।

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टीना कहती हैं कि समाज में सभी औरतों को इस तरह की चीजों के बारे में गहराई से सोचना चाहिए। कोई भी ऊपरी श्रंगार हमारे अंदर की महिला को नहीं दर्शा सकता।

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