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Saraswathi Rajamani Life Story: आज़ादी की वो गुमनाम नायिका, जिसे देश की आजादी में अपना लहू बहाने के बदले मिली गुमनामी और बेरुखी

Saraswathi Rajamani History: देश को आजादी तो मिली लेकिन इस वीरांगना को अपना जीवन पाई-पाई के लिए मोहताज होकर बिताना पड़ा

Jyotsna Singh
Written By Jyotsna Singh
Published on: 26 Feb 2025 2:33 PM IST
Saraswathi Rajamani Life Story: आज़ादी की वो गुमनाम नायिका, जिसे देश की आजादी में अपना लहू बहाने के बदले मिली गुमनामी और बेरुखी
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Saraswathi Rajamani (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

Saraswathi Rajamani Kaun Thi: भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनगिनत वीरों ने अपनी जान की परवाह किए बिना अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया। स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा जब भी होती है, तो महात्मा गांधी, भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे बड़े नाम सामने आते हैं। लेकिन इतिहास में कुछ ऐसे गुमनाम नायक भी हैं जिनकी कहानियां उतनी प्रसिद्ध नहीं हुईं, जितनी होनी चाहिए थीं। ऐसी ही एक वीरांगना थीं सरस्वती राजामणि, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में जासूस बनकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जीवन साहस, निडरता और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। बचपन से ही वे बेहद निडर और स्वतंत्र सोच वाली लड़की थीं। जब उन्होंने अपने पिता से आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने की अनुमति मांगी, तो उनके पिता ने पहले विरोध किया, लेकिन उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति को देखकर अंततः सहमति दे दी। इनके अदम्य साहस और देशप्रेम के किस्से जो जुबां तक तो हैं लेकिन उन कागजों में दर्ज न हो सके जो इन्हें एक सच्चे देश भक्त होने का सबूत पेश करते हों।

देश को आजादी तो मिली लेकिन इस वीरांगना को अपना जीवन पाई-पाई के लिए मोहताज होकर बिताना पड़ा, जिसकी वजह सिर्फ ये थी कि इनके पास वो दस्तावेज मौजूद नहीं थे जो इन्हें एक स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण साबित करते थे। इसलिए इन्हें उस स्वतंत्रता सेनानी पेंशन से भी वंचित कर दिया गया जिसकी ये दावेदार थीं। मदद मिली सुनवाई भी हुई लेकिन तब तक ये जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंचकर बस इस देश की मिट्टी में मिल जाने को आतुर थीं।आइए जानते हैं इस निर्भीक, साहसी महिला देशभक्त की अमर गाथा से जुड़े किस्सों के बारे में :-

इनका आरंभिक जीवन और इनका जुड़ाव सुभाष चंद्र बोस के साथ कैसा था?

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

सरस्वती राजामणि का जन्म 1927 में मदुरै, तमिलनाडु के एक समृद्ध और राष्ट्रवादी परिवार में हुआ था। उनके पिता एक धनी व्यापारी थे, जिनका झुकाव स्वतंत्रता संग्राम की ओर था। बचपन से ही सरस्वती का पालन-पोषण एक ऐसे माहौल में हुआ, जहां देशभक्ति को सर्वोपरि माना जाता था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत थी, लेकिन उन्होंने कभी विलासिता में रुचि नहीं ली।

सरस्वती बचपन से ही तेज दिमाग और निडर स्वभाव की थीं। वे आम लड़कियों की तरह जीवन नहीं जीना चाहती थीं, बल्कि कुछ अलग और देश के लिए महत्वपूर्ण करना चाहती थीं। जब भारत में स्वतंत्रता संग्राम जोरों पर था, तब वे केवल एक किशोरी थीं, लेकिन उनके भीतर देश के लिए कुछ कर गुजरने की इच्छा प्रबल थी।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस से प्रेरणा और जुड़ाव

सरस्वती राजामणि का जीवन तब बदल गया जब उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का एक भाषण सुना। नेताजी ने जनता से कहा कि "अगर तुम मुझे अपना खून दो, तो मैं तुम्हें आजादी दूंगा।" इन शब्दों ने सरस्वती के मन पर गहरी छाप छोड़ी। उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें भी इस स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देना चाहिए।

उन्होंने तुरंत अपने पिता से नेताजी की आजाद हिंद फौज (INA) में शामिल होने की अनुमति मांगी। शुरुआत में उनके पिता ने मना कर दिया, क्योंकि वे अपनी बेटी को एक सुरक्षित जीवन देना चाहते थे। लेकिन जब सरस्वती ने जिद पकड़ी और कहा कि वे अपनी पैतृक संपत्ति स्वतंत्रता संग्राम में दान कर देंगी, तब उनके पिता उनकी देशभक्ति से प्रभावित हुए और अनुमति दे दी।

आजाद हिंद फौज में शामिल होना (Saraswathi Rajamani Aur Azad Hind Fauj)

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

महज 15 साल की उम्र में, सरस्वती राजामणि ने नेताजी के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज में शामिल होने का फैसला किया। वे महिलाओं के विशेष दस्ते में शामिल हुईं, जिसे नेताजी ने स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए बनाया था। नेताजी को सरस्वती का आत्मविश्वास और उनकी चतुराई बहुत पसंद आई। जब सरस्वती आजाद हिंद फौज में शामिल हुईं, तो नेताजी ने उनकी तेजी, बुद्धिमत्ता और हिम्मत को देखकर उन्हें जासूसी मिशनों के लिए चुना। नेताजी को जरूरत थी ऐसे लोगों की, जो ब्रिटिश सेना में रहकर महत्वपूर्ण सूचनाएं जुटा सकें। सरस्वती ने इस कार्य के लिए स्वेच्छा से आगे बढ़ने का निर्णय लिया।

नेताजी का उन पर विशेष विश्वास था, क्योंकि वे न केवल बहादुर थीं, बल्कि अपनी परिस्थिति को बदलने और दुश्मनों को मात देने की क्षमता भी रखती थीं। सरस्वती राजामणि का आरंभिक जीवन संपन्नता में बीता, लेकिन उनकी आत्मा एक सच्ची स्वतंत्रता सेनानी की थी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस से प्रेरणा मिलने के बाद, उन्होंने बिना किसी झिझक के अपने परिवार की सुरक्षा और संपत्ति को छोड़कर देश के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। वे आजाद हिंद फौज की सबसे युवा महिला जासूस बनीं और ब्रिटिश सेना के खिलाफ खुफिया जानकारी इकट्ठा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उनका नेताजी के साथ संबंध केवल एक नेता और अनुयायी का नहीं था, बल्कि वे उनकी विचारधारा और संघर्ष के प्रति पूर्णतः समर्पित थीं। नेताजी ने जिस आजाद भारत का सपना देखा था, उसे पूरा करने के लिए सरस्वती राजामणि ने अपने जीवन का हर क्षण अर्पित कर दिया।

गहने सौंपने की प्रेरणा

जब सरस्वती राजामणि ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का एक जोशीला भाषण सुना, जिसमें उन्होंने जनता से स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्थन और बलिदान की अपील की थी। उनके शब्दों ने सरस्वती के मन को झकझोर दिया। वे नेताजी के मिशन में योगदान देना चाहती थीं, लेकिन उनके पास कोई सैनिक अनुभव या धन नहीं था। इसलिए, उन्होंने अपने पास मौजूद सबसे मूल्यवान वस्तु-अपने गहनों को नेताजी को दान करने का निश्चय किया। चूंकि सरस्वती एक समृद्ध परिवार से थीं और उनके पास काफी कीमती गहने थे। उन्होंने बिना किसी झिझक के अपने सोने और चांदी के गहने नेताजी को सौंप दिए, ताकि उनका उपयोग आज़ाद हिंद फौज की गतिविधियों और स्वतंत्रता संग्राम के लिए किया जा सके।

जब उन्होंने नेताजी को गहने दिए, तो नेताजी उनकी इस देशभक्ति और त्याग की भावना से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने सरस्वती से पूछा कि क्या वे वास्तव में यह सब दान करना चाहती हैं, जिस पर सरस्वती ने पूरे आत्मविश्वास से कहा कि देश की आज़ादी के लिए यह बहुत छोटी कुर्बानी है।

सरस्वती राजमणि ने अपने गहने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को इसलिए सौंपे क्योंकि वे आज़ाद हिंद फौज (INA) के संघर्ष से अत्यधिक प्रभावित थीं और स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान देना चाहती थीं। साथ ही नेताजी को यह दिखाने के लिए भी गहने दिए कि वे केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने कृत्यों से भी आज़ादी की लड़ाई में योगदान देना चाहती थीं।

गांधी जी ने दी थी अहिंसा की सीख

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

उनकी एक बेहद दिलचस्प घटना तब की है जब उन्होंने महात्मा गांधी के सामने अपनी छोटी सी बंदूक रख दी थी, जिससे गांधीजी भी आश्चर्यचकित हो गए थे। घटना का विवरण कुछ इस तरह है जब जब गांधीजी उनके घर आए थे। सरस्वती राजामणि का परिवार बहुत अमीर था और वे स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े कई नेताओं का समर्थन करते थे। एक बार महात्मा गांधी उनके घर पर आए। सरस्वती उस समय बहुत छोटी थीं, लेकिन देशभक्ति और क्रांतिकारी विचारों से भरी हुई थीं। वे अपनी छोटी सी उम्र में ही अंग्रेजों से भारत को मुक्त कराने के लिए कुछ भी करने को तैयार थीं। जब गांधीजी जब उनके घर में आए, तो सरस्वती उनसे बातचीत करने पहुंच गईं।

उन्होंने गांधीजी से कहा कि "हम सिर्फ अहिंसा से आज़ादी कैसे पा सकते हैं?" वे चाहती थीं कि अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाए जाएं और प्रत्यक्ष युद्ध किया जाए। सरस्वती के इस विचार को गांधीजी शांतिपूर्ण तरीके से समझाना चाहते थे। लेकिन तभी सरस्वती ने अपनी छोटी सी बंदूक निकाली और गांधीजी के सामने रख दी। वे यह दिखाना चाहती थीं कि "अगर हमें आजादी चाहिए, तो हमें लड़ना पड़ेगा!"

गांधीजी उनके इस जोश को देखकर मुस्कुरा दिए और प्यार से उन्हें समझाने लगे कि अहिंसा का रास्ता भी उतना ही प्रभावी हो सकता है। हालांकि, सरस्वती का मानना था कि स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारी कदम उठाने जरूरी हैं। यह घटना दर्शाती है कि वे बचपन से ही निडर और क्रांतिकारी सोच रखती थीं।

उनका मानना था कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने के लिए केवल अहिंसा पर्याप्त नहीं होगी। बाद में बनीं जासूस सरस्वती का यही जुझारूपन आगे चलकर उन्हें आज़ाद हिंद फौज की सबसे युवा महिला जासूस बना गया।

गांधीजी और नेताजी के विचारों का टकराव

यह घटना उस समय के दो बड़े स्वतंत्रता संग्राम के विचारों को भी दर्शाती है—अहिंसा बनाम क्रांतिकारी संघर्ष।

गांधीजी अहिंसा और सत्याग्रह के पक्षधर थे, जबकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस सशस्त्र संघर्ष में विश्वास रखते थे।

सरस्वती नेताजी के समर्थक थीं, इसलिए वे गांधीजी की नीतियों से सहमत नहीं थीं।

जासूसी के दौरान का साहसिक किस्सा (Saraswathi Rajamani Ki Jasusi Ka Kissa)

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

सरस्वती राजामणि की जासूसी और बहादुरी की घटना की बात करें तो जिसे सुनकर बड़े बड़े सूरमाओं के पसीने छूट जाएंगे। असल में, जब सरस्वती राजामणि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज (INA) में शामिल हुईं, तो उन्हें और उनकी कुछ महिला साथियों को ब्रिटिश सेना में जासूसी करने का कार्य सौंपा गया। यह मिशन बेहद खतरनाक था, क्योंकि पकड़े जाने पर उन्हें तुरंत मौत की सजा दी जा सकती थी। लेकिन सरस्वती राजामणि ने अपनी निडरता और बुद्धिमानी से इस मिशन को सफल बनाया।

नेताजी ने उन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित किया और फिर उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों के बीच एक जासूस के रूप में काम करने के लिए भेजा। सरस्वती और उनकी टीम ने ब्रिटिश अधिकारियों के घरों में नौकरानियों का वेश धारण किया। इस disguise (छद्म रूप) में वे ब्रिटिश अफसरों की बातचीत सुनतीं और महत्वपूर्ण गुप्त जानकारियां आजाद हिंद फौज तक पहुंचातीं। ब्रिटिश अधिकारियों को ज़रा भी संदेह नहीं हुआ कि वे जिन नौकरानियों को अपने घरों में रखे हुए हैं, वे दरअसल नेताजी की जासूस हैं। इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण जानकारियां इकट्ठा कीं, जैसे: ब्रिटिश सेना की गुप्त योजनाएं और आजाद हिंद फौज के खिलाफ होने वाली रणनीतियां आदि।

जब जासूसी का भंडाफोड़ हुआ

सब कुछ योजना के अनुसार चल रहा था, लेकिन एक दिन उनकी एक साथी गलती से पकड़ी गई। ब्रिटिश अधिकारियों को जब इस बात का संदेह हुआ कि उनके अंदर कोई जासूस है, तो उन्होंने उनकी एक सहयोगी महिला को पकड़ लिया और उसे बंदी बना लिया। सरस्वती जानती थीं कि अगर ब्रिटिश अधिकारी उस महिला से जबरदस्ती उगलवा लेंगे, तो पूरी टीम खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए उन्होंने फैसला किया कि वे खुद अपनी साथी को बचाने जाएंगी।

साहसिक बचाव अभियान

रात के अंधेरे में, सरस्वती राजामणि ने एक ब्रिटिश सैनिक का रूप धारण किया, ताकि किसी को शक न हो। वे चुपचाप ब्रिटिश सेना की छावनी में घुसीं, जहां उनकी साथी को कैद किया गया था। उन्होंने अपनी बंदूक छिपाकर रखी और सतर्कता से आगे बढ़ीं। जब वे उस कमरे में पहुंचीं, जहां उनकी साथी को कैद किया गया था, तो उन्होंने दो ब्रिटिश सैनिकों को देखा जो वहां पहरा दे रहे थे। सरस्वती ने चुपके से एक पत्थर उठाया और उसे दूसरी दिशा में फेंका, जिससे पहरेदारों का ध्यान भटक गया।

जैसे ही सैनिकों का ध्यान हटा, उन्होंने तुरंत अपनी पिस्तौल निकाली और उन पर निशाना साधा। एक सैनिक को गोली लगी और वह गिर पड़ा, जबकि दूसरा सैनिक डर के मारे भाग गया। सरस्वती ने अपनी साथी को जल्दी से आज़ाद किया और दोनों वहां से भाग निकलीं। लेकिन इस दौरान ब्रिटिश सैनिकों ने पीछा करना शुरू कर दिया और उन पर गोलीबारी कर दी।

गोली लगने के बावजूद साहस नहीं खोया

भागने के दौरान सरस्वती राजामणि को दाहिने पैर में गोली लग गई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। वे दर्द सहते हुए अपनी साथी को घने जंगलों से होते हुए सुरक्षित स्थान तक ले गईं और अंततः वे आजाद हिंद फौज के सैनिकों तक पहुंचने में सफल हुईं। जब ब्रिटिश सैनिक उनका पीछा कर रहे थे, तब उन्होंने अपनी सूझबूझ और बहादुरी से खुद को छिपाने का तरीका ढूंढ लिया।

पेड़ पर चढ़कर बचाई थी जान

घने जंगल में पहुंचने के बाद, सरस्वती को महसूस हुआ कि अब और भागना मुश्किल होगा क्योंकि गोली लगने के कारण लगातार खून बहने से उनका पैर बुरी तरह घायल हो चुका था। उन्होंने तुरंत एक बड़े पेड़ पर चढ़ने का फैसला किया, ताकि ब्रिटिश सैनिक उन्हें न देख सकें।

वे घायल पैर के बावजूद धीरे-धीरे पेड़ पर चढ़ गईं और शाखाओं के पीछे छिप गईं। ब्रिटिश सैनिकों ने आसपास काफी खोजबीन की, लेकिन वे उन्हें ढूंढ नहीं पाए और अंततः वापस लौट गए। कुछ घंटों तक पेड़ पर रहने के बाद, उन्होंने नीचे उतरकर अपनी साथी के साथ सुरक्षित स्थान की ओर बढ़ना शुरू किया।

जब सरस्वती किसी तरह आजाद हिंद फौज के ठिकाने तक पहुंचीं, तो उनके पैर से खून बह रहा था और वे दर्द से कराह रही थीं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जब यह घटना पता चली, तो वे उनकी वीरता और हिम्मत से बेहद प्रभावित हुए।

नेताजी ने कहा: "तुम सिर्फ बहादुर नहीं, बल्कि एक सच्ची वीरांगना हो!"

उनके इस साहसिक कार्य के बाद, उन्हें आजाद हिंद फौज में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गईं। उन्होंने न केवल सरस्वती को सम्मानित किया, बल्कि यह भी कहा कि "भारत को आज़ाद कराने के लिए हमें ऐसी ही निडर महिलाओं की जरूरत है।" सरस्वती राजामणि की यह घटना हमें दिखाती है कि नारी शक्ति कितनी सक्षम और साहसी हो सकती है। भारत की आजादी के संघर्ष में महिलाओं की भी उतनी ही अहम भूमिका थी जितनी पुरुषों की। उनका निडर स्वभाव और बुद्धिमत्ता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।

सरस्वती राजामणि का यह साहसिक कार्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिला जासूसों की अहम भूमिका को दर्शाता है। उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अपनी साथी को बचाया और ब्रिटिश सेना को मात दी। उनका यह बलिदान हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता केवल पुरुषों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि भारत की बहादुर महिलाओं ने भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। उनका जीवन और वीरता आज भी हर भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

25 साल तक स्वतंत्रता सेनानी पेंशन से थीं वंचित (Swatantrata Sainik Samman Pension)

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

भारत की आजादी के लिए अपना सबकुछ कुर्बान करने वाली सरस्वती राजामणि, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज (INA) की सबसे कम उम्र की महिला जासूस थीं, को आजादी के बाद करीब 25 साल तक स्वतंत्रता सेनानी पेंशन नहीं मिली। यह उनके प्रति सरकारी उपेक्षा का एक बड़ा उदाहरण था।

कैसे रहीं पेंशन से वंचित?

भारत को 1947 में स्वतंत्रता तो मिल गई, लेकिन सरस्वती राजामणि को उनका हक नहीं मिला। स्वतंत्रता संग्राम के बाद वे चेन्नई में एक सामान्य जीवन जीने लगीं और धीरे-धीरे गुमनाम हो गईं। उन्हें सरकार की ओर से कोई मान्यता या सहायता नहीं मिली। सरकारी पेंशन न मिलने का कारण भारत सरकार ने स्वतंत्रता सेनानियों के लिए स्वतंत्रता सेनानी पेंशन योजना शुरू की थी, लेकिन सरस्वती राजामणि का नाम इसमें शामिल नहीं था। कई वर्षों तक उनकी बहादुरी और योगदान को कोई आधिकारिक मान्यता नहीं मिली।

उनके पास अपनी सेवाओं को प्रमाणित करने के लिए कोई दस्तावेज नहीं थे, क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई महत्वपूर्ण दस्तावेज या तो नष्ट हो गए थे या गुम हो गए थे। सरकार से संपर्क करने के बावजूद, लंबे समय तक उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई।

आर्थिक तंगी और संघर्ष

बिना किसी सरकारी सहायता के, सरस्वती राजामणि को अपने जीवनयापन के लिए संघर्ष करना पड़ा। वे एक छोटे से किराए के घर में गरीबी और उपेक्षा में जीवन बिता रही थीं। 2000 के दशक में उनकी स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि उनके पास इलाज के लिए भी पैसे नहीं थे।

इनकी पेंशन के लिए मीडिया और समाजसेवियों ने उठाई थी आवाज

जब कुछ पत्रकारों और इतिहासकारों को इस बात की जानकारी मिली कि आजाद हिंद फौज की यह बहादुर जासूस भयंकर गरीबी में जीवन बिता रही हैं, तो उन्होंने इस मुद्दे को मीडिया में उठाया। उनकी कहानी अखबारों और न्यूज चैनलों में छपने लगी। जब मामला चर्चा में आया, तब तमिलनाडु सरकार (जिसकी मुख्यमंत्री उस समय जयललिता थीं) ने उनकी मदद करने का फैसला किया। इसके बाद उन्हें राज्य सरकार से कुछ आर्थिक सहायता और स्वतंत्रता सेनानी पेंशन मिलने लगी। हालांकि, यह सहायता बहुत देर से आई, जब वे पहले ही जीवन की कठिनाइयों से जूझ चुकी थीं।

मिला सम्मान, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी

सरस्वती राजामणि ने 25 साल तक सरकारी उपेक्षा झेली, लेकिन जब तक उन्हें स्वतंत्रता सेनानी पेंशन मिली, तब तक वे वृद्धावस्था में पहुंच चुकी थीं और गंभीर आर्थिक संकट झेल चुकी थीं। 13 जनवरी 2006 को उनका निधन हो गया, और तब जाकर लोगों को उनकी बहादुरी की याद आई। सरस्वती राजामणि का जीवन यह दर्शाता है कि भारत की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले कई गुमनाम नायकों को स्वतंत्रता के बाद सरकार से वह सम्मान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे। उनकी यह कहानी हमें याद दिलाती है कि हमें अपने स्वतंत्रता सेनानियों को केवल याद ही नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें जीते-जी उनका हक भी देना चाहिए।

जय ललिता से इनका क्या संबंध था?

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

सरस्वती राजामणि और जयललिता (तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री) के बीच कोई प्रत्यक्ष पारिवारिक संबंध नहीं था, लेकिन दोनों तमिलनाडु से थीं और राष्ट्रवाद व समाजसेवा में उनकी भूमिका उल्लेखनीय थी।

कई लोगों को यह भ्रम होता है कि सरस्वती राजामणि और जयललिता का आपसी संबंध था, क्योंकि सरस्वती राजामणि ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में चेन्नई में काफी कठिनाइयों का सामना किया, और तब जयललिता तमिलनाडु की मुख्यमंत्री थीं। हालांकि, जयललिता सरकार ने उनके जीवन के अंतिम समय में उन्हें कुछ सहायता प्रदान की थी।

जब 2005 में मीडिया में यह खबर फैली कि आजाद हिंद फौज की यह वीरांगना गुमनामी और गरीबी में जीवन बिता रही हैं, तब तमिलनाडु सरकार ने उनकी मदद की थी। सरस्वती राजामणि ने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सबकुछ समर्पित कर दिया, लेकिन आजादी के बाद उन्हें कोई विशेष पहचान या सरकारी सहायता नहीं मिली।

सरस्वती राजामणि जैसी वीर स्वतंत्रता सेनानियों को जो सम्मान मिलना चाहिए था, वह उन्हें उनके जीवनकाल में नहीं मिला, लेकिन उनकी वीरता आज भी भारतीय इतिहास का एक अनमोल अध्याय है।



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