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यादव समाज के सबसे बड़े ‘मठ’ पर बीजेपी की नजर, क्या टूटेगा सपा का तिलिस्म? 

बताया जा रहा है कि चुनावी सीजन में बीजेपी ने बहुत सोच समझकर इस रास्ते को चुना है। यादवों की सबसे बड़ी गद्दी पर बीजेपी के शीर्ष नेताओं का आना महज इत्तेफाक नहीं है। इसके जरिए बीजेपी यादव समाज को एक संदेश देना चाहती है। बीजेपी चाहती है कि ओबीसी वर्ग में सबसे बड़ी हैसियत रखने वाले यादवों को अपनी ओर जोड़ा जाए।

Aditya Mishra
Updated on: 18 April 2019 3:36 PM GMT
यादव समाज के सबसे बड़े ‘मठ’ पर बीजेपी की नजर, क्या टूटेगा सपा का तिलिस्म? 
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वाराणसी: विवादित बयान पर चुनाव आयोग की चाबुक के बाद यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ भले ही सीधे तौर पर चुनाव प्रचार ना कर रहे हों, लेकिन शहर- शहर मंदिरों और मठ का दौरा कर वो अपने वोटरों को जरूर संदेश दे रहे हैं।

प्रतिबंध के तीसरे दिन वाराणसी पहुंचे योगी ने अपने दौरे की शुरूआत बजरंग बली के दर्शन से शुरू की। इसके बाद योगी आदित्यनाथ यादव समाज के सबसे बड़े मठ गढ़वाघाट पहुंचें। यहां उन्होंने गाय को हरा चारा और गुड़ खिलाया और आश्रम के महंत के साथ गुफ्तगू की। योगी के इस दौरे को यादव समाज को बीजेपी से जोड़ने की पहल के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि दलितों की तरह यादव समाज बीजेपी के पाले में आएगा?

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यादव समाज को जोड़ने की कोशिश:

बताया जा रहा है कि चुनावी सीजन में बीजेपी ने बहुत सोच समझकर इस रास्ते को चुना है। यादवों की सबसे बड़ी गद्दी पर बीजेपी के शीर्ष नेताओं का आना महज इत्तेफाक नहीं है। इसके जरिए बीजेपी यादव समाज को एक संदेश देना चाहती है। बीजेपी चाहती है कि ओबीसी वर्ग में सबसे बड़ी हैसियत रखने वाले यादवों को अपनी ओर जोड़ा जाए।

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यूपी के अंदर अभी तक यादवों पर समाजवादी पार्टी का एकाधिकार रहा है। बीजेपी को लगता है कि जिस तरह से उसने दलितों को अपने साथ जोड़ा, उसी तरह यादवों को भी जोड़ सकती है। साल 2014 में बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला लाते हुए दलितों के साथ पिछड़े वर्ग को अपने साथ जोड़ा। अब बारी खासतौर से यादव समाज की है, जो बीजेपी को ‘अछूत’ मानता है। लेकिन बीजेपी इस मिथक को तोड़ना चाहती है और उसकी उम्मीद टिकी है गढ़वाघाट आश्रम पर। बीजेपी को ये बात बखूबी मालूम है कि सपा-बसपा गठबंधन के तहत अगर यादव पूरी तरह से गोलबंद हो गए तो कई सीटों पर उसका समीकरण गड़बड़ा सकता है।

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आश्रम के महंत ने दिया राष्ट्रवाद का नारा:

योगी से मुलाकात के बाद गढ़वाघाट आश्रम के संत शरणानंद की जुबान भी राष्ट्रवाद की भाषा बोलने लगी है। मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि हर देशवासी के लिए देश पहले जरुरी है। हिंदुस्तान हिंदूवादी राष्ट्र है और इसकी अस्मिता की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। जानकार बता रहे हैं कि पूर्वांचल की राजनीति में गढ़वाघाट आश्रम बीजेपी के लिए नई प्रयोगशाला की तरह है।

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इस आश्रम के जरिए बीजेपी राजनीतिक रुप से मजबूत यादव समाज को अपने पाले में लाने की कोशिश करती है। क्योंकि गढ़वाघाट आश्रम में यादव समाज का अटूट विश्वास है। आश्रम की एक आवाज पर यादव समाज के लोग खड़े हो जाते हैं। हालांकि पार्टी के लिए ये आसान नहीं होगा। केंद्र की मोदी सरकार हो या फिर राज्य की योगी सरकार। यादव हाशिए पर हैं। योगी मंत्रीमंडल में सिर्फ गिरीश यादव को राज्यमंत्री का ओहदा हासिल हुआ है। इसके अलावा एक भी महत्वपूर्ण पद पर यादव समाज के नेता नहीं है। यही नहीं ट्रांसफर, पोस्टिंग को लेकर भी यादव समाज के लोग योगी सरकार से खफा हैं। उन्हें लगता है कि सपा से नजदीकियों की वजह से उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है।

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क्यों खास है आश्रम?

गढ़वा घाट भगवान कृष्ण के वंशजों का है। इस पीठ से कई बड़े राजनेताओं की आस्था इससे जुड़ी हुई है। राहुल गांधी से लेकर राजनाथ सिंह जैसे बड़े नेता यहां आते रहे हैं। गढ़वा आश्रम के अनुयायियों की संख्या करोड़ों में है, जिनमें ज्यादातर दलित और पिछड़े समाज में खासकर यादवों की हैं। वाराणसी में स्थित गढ़वा घाट आश्रम के बारे में कहा जाता है कि यादव वोट के लिए इनका इशारा ही काफी है।

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एसपी संरक्षक मुलायम सिंह यादव अक्सर यहां आते रहे हैं। 2017 में विधानसभा चुनाव के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी पहली बार गढ़वाघाट आश्रम पहुंचे थे।

Aditya Mishra

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