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तिरंगे से जुड़ा है इस लाल कोठी का 225 साल पुराना इतिहास

इतिहास के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि खूबसूरत लालकोठी का निर्माण सन् 1868-1901 में भोपाल रियासत की बागडोर संभालने वाली शाहजहां बेगम ने करवाया था। बेगम एक ऐसी शख्स थीं, जिन्हें इमारतें बनवाने का शौक था। इसके कोठी पर मुगलिया शासन का प्रतीक काला, सफेद, हरा तिरंगा लहराया करता था।

राम केवी

राम केवीBy राम केवी

Published on 26 Jan 2020 10:56 AM GMT

तिरंगे से जुड़ा है इस लाल कोठी का 225 साल पुराना इतिहास
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रामकृष्ण वाजपेयी

क्या आपको पता है कि भोपाल लालकोठी का क्या इतिहास है और इसका तिरंगे से क्या और कब से नाता है। लालकोठी ही आज मध्यप्रदेश का राजभवन है। जहां वर्तमान राज्यपाल लालजी टंडन निवास करते हैं। नवाबों की नगरी भोपाल और राजभवन यानी लालकोठी के इतिहास के साथ हम जानेंगे इससे जुड़ा तिरंगे का 225 साल पुराना इतिहास। जिस तरह अदब और तहजीब के लिए लखनऊ का नाम लिया जाता है इसी तरह से भोपाल भी अदब और तहजीब के लिए मशहूर रहा है।

शायद आपको यह जानकारी न हो कि आजादी से पहले या मध्यप्रदेश राज्य के गठन से पहले इसकी राजधानी भोपाल की स्थिति क्या थी। कैसे भोपाल वजूद में आया और भोपाल रियासत की लालकोठी इतिहास कि किस धरोहर को समेटे है। यहां से किसने और कहां तक और कब तक शासन किया।

लालकोठी को इन्होंने बनवाया था

इतिहास के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि खूबसूरत लालकोठी का निर्माण सन् 1868-1901 में भोपाल रियासत की बागडोर संभालने वाली शाहजहां बेगम ने करवाया था। बेगम एक ऐसी शख्स थीं, जिन्हें इमारतें बनवाने का शौक था। इसके कोठी पर मुगलिया शासन का प्रतीक काला, सफेद, हरा तिरंगा लहराया करता था।

बेगम शाहजहां ने भोपाल में लालकोठी यानी राजभवन का निर्माण करवाया, जिसमें पोलीटिकल एजेंट आकर ठहरा करते थे। उन्होंने इसके अलावा भी कई ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण करवाया। उनके जनहित में किए गए कार्यों की एक लंबी फेहरिस्त है।

कब हुई भोपाल रियासत की स्थापना

भोपाल रियासत की स्थापना 1723-24 में औरंगजेब की सेना के बहादुर अफगान योद्धा दोस्त मोहम्मद खान ने सीहोर, आष्टा, खिलचीपुर और गिन्नौर को जीत कर की थी।

1728 में दोस्त मोहम्मद खान की मृत्यु के बाद उसके बेटे यार मोहम्मद खान के रूप में भोपाल रियासत को अपना पहला नवाब मिला था।

मार्च 1818 में नजर मोहम्मद खान नवाब थे उस समय एंग्लो भोपाल संधि के तहत भोपाल रियासत भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य की प्रिंसली स्टेट हो गई।

1926 में भोपाल रियासत के नवाब बने हमीदुल्लाह खान। अलीगढ़ विश्वविद्यालय से शिक्षित नवाब हमीदुल्लाह दो बार 1931 और 1944 में चेम्बर ऑफ प्रिंसेस के चांसलर बने तथा भारत विभाजन के समय वे ही चांसलर थे। आजादी का मसौदा घोषित होने के साथ ही उन्होंने 1947 में चांसलर पद से त्यागपत्र दे दिया था, क्योंकि वे रजवाड़ों की स्वतंत्रता के पक्षधर थे।

नवाब हमीदुल्लाह 14 अगस्त 1947 तक ऊहापोह में रहे कि वो भारत के साथ जाने का निर्णय लें या आजाद रहें। जिन्ना उन्हें पाकिस्तान में सेक्रेटरी जनरल का पद देकर वहाँ आने की पेशकश दे चुके थे और इधर रियासत का मोह था। 13 अगस्त को उन्होंने अपनी बेटी आबिदा को भोपाल रियासत का शासक बन जाने को कहा ताकि वे पाकिस्तान जाकर सेक्रेटरी जनरल का पद सभाल सकें, किन्तु आबिदा ने इससे इनकार कर दिया।

भारत गणराज्य में शामिल होने वाली आखिरी रियासत

भोपाल का भारत में विलीनीकरण सबसे अंत में हुआ तो उसके पीछे एक कारण ये भी था कि नवाब हमीदुल्लाह जो चेम्बर ऑफ प्रिंसेस के चांसलर थे उनका देश की आंतरिक राजनीति में बहुत दखल था, वे नेहरू और जिन्ना दोनों के घनिष्ठ मित्र थे। मार्च 1948 में नवाब हमीदुल्लाह ने भोपाल के स्वतंत्र रहने की घोषणा की। मई 1948 में नवाब ने भोपाल सरकार का एक मंत्रिमंडल घोषित कर दिया था जिसके प्रधानमंत्री चतुरनारायण मालवीय थे।

नवाब के खिलाफ विद्रोह

लेकिन तब तक भोपाल रियासत में विलीनीकरण न करने को लेकर नवाब के खिलाफ विद्रोह पनपने लगा था। साथ ही विलीनीकरण की सूत्रधार पटेल-मेनन की जोड़ी भी दबाव बनाने लगी थी।

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अक्टूबर 1948 में नवाब हज पर चले गये और दिसम्बर 1948 में भोपाल के इतिहास का सबसे जबरदस्त प्रदर्शन विलीनीकरण को लेकर हुआ। नवाब की सरकार ने कई प्रदर्शनकारी गिरफ्तार किए, इनमें भाई रतनकुमार, ठाकुर लाल सिंह, डॉ शंकर दयाल शर्मा भी शामिल थे। पूरा भोपाल बंद रहा, पुलिस आंदोलनकारियों को नियंत्रित करने की कोशिश करती रही। 23 जनवरी 1949 को डॉ॰ शंकर दयाल शर्मा को आठ माह के लिए जेल भेज दिया गया।

इन सबके बीच वीपी मेनन एक बार फिर भोपाल आए। मेनन ने नवाब को स्पष्ट शब्दों में कहा कि भोपाल स्वतंत्र नहीं रह सकता, भोपाल को मध्यभारत का हिस्सा बनना ही होगा।

आखिरकार 29 जनवरी 1949 को नवाब ने मंत्रिमंडल को बर्खास्त करते हुए सत्ता के सारे सूत्र एक बार फिर से अपने हाथ में ले लिए। पंडित चतुरनारायण मालवीय इक्कीस दिन के उपवास पर बैठ चुके थे।

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वीपी मेनन पूरे घटनाक्रम को भोपाल में ही रहकर देख रहे थे, वे लाल कोठी (वर्तमान राजभवन) में रुके हुए थे तथा लगतार दबाव बनाए हुए थे।

अंततः विलय पर हस्ताक्षर

अंतत: 30 अप्रैल 1949 को नवाब ने विलीनीकरण के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। सरदार पटेल ने नवाब को लिखे पत्र में कहा -मेरे लिए ये एक बड़ी निराशाजनक और दुख की बात थी कि आपके अविवादित हुनर तथा क्षमताओं को आपने देश के उपयोग में उस समय नहीं आने दिया जब देश को उसकी जरूरत थी।

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अंतत: 1 जून 1949 को भोपाल रियासत, भारत का हिस्सा बन गई, केंद्र द्वारा नियुक्त चीफ कमिश्नर एनबी बैनर्जी ने कार्यभार संभाल लिया। बैनर्जी इसी लालकोठी में रुके।

भोपाल का विलीनीकरण हो चुका था। लगभग 225 साल पुराने (1724 से 1949) नवाबी शासन का प्रतीक रहा तिरंगा (काला, सफेद, हरा) लाल कोठी से उतारा गया और भारत संघ का तिरंगा (केसरिया, सफेद, हरा) चढ़ाया गया।

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