जब जमा पूंजी ही सुरक्षित नहीं

यह एक कठिन दौर है। आम आदमी के जमा पूंजी को महफूज रखने का सबसे आसान तरीका यह होता है कि वह उसे बैंक में जमा कर दे। अब अगर बैंकों में ही लोगों की जमा पूंजी सुरक्षित न रह सके तो वह कहां जाए। महाराष्ट्र में इन दिनों ऐसा ही हो रहा है। महाराष्ट्र में गत दिनों हुए चुनाव के नतीजे कबके आ चुके हैं लेकिन खंडित जनादेश के बाद जिस तरह से शिव सेना और भाजपा के बीच पेंच फंसा हुआ है वह कर्नाटक में बीते दिनों हुए राजनीतिक प्रहसन की याद दिलाता है। महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार के दौरान और आज भी जो मुद्दा लगातार अनुत्तरित रह गया है वह यही है कि आखिरकार एक सहकारी बैंक में हुए घोटाले का वास्तविक जिम्मेदार कौन है। क्या रिजर्व बैंक आफ इंडिया सरीखी संस्थाओं का काम महज चंद गाइड लाइन जारी कर देना मात्र है। अगर कोई सरकारी बैंक, अर्ध सरकारी बैंक, सहकारी बैंक, चिट फंड कम्पनी अथवा वित्तीय लेन देन का काम कर रही कम्पनी इन दिशा निर्देशों का उल्लंघन कर रही है तो इसका इलाज क्या है। राज्य सरकारों, केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, आरबीआई को क्या करना चाहिए।

आम जनता जिंदगी भर जो हाड़ तोड़ मेहनत करती है और पाई-पाई जोड़कर जिस रकम को जमा करती है अगर वही किसी बैंक घोटाले में डूब जाए, वह अपनी ही जमा रकम की निकासी न करा सके तो क्या बीतेगी उस पर। इसे महज सपनों का टूटना नहीं कहेंगे आप। यह तो एक आम आदमी के भविष्य पर लगा प्रश्न चिन्ह है। महाराष्ट्र की तर्ज पर एक अन्य मुद्दा इन दिनों उत्तर प्रदेश में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यूपी पावर कारपोरेशन के पीएफ घोटाले की गूंज है। पावर कारपोरेशन की एमडी और सचिव ऊर्जा को हटा दिया गया है। इनके अलावा पूर्ववर्ती सरकार में सर्वेसर्वा रहे एपी मिश्रा के खिलाफ भी कार्रवाई हुई है। अन्य अफसरों पर भी कार्रवाई हुई है। ईओडब्ल्यू इस मामले की जांच कर रही है। यह मामला संवेदनशील है। प्रमुख राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप में उलझे हैं। सवाल यह है कि अगर पूर्ववर्ती सरकारें और उस दौर में तैनात अफसर इन गड़बडि़यों के लिए जिम्मेदार थे तो इस समय जो सरकार और तंत्र है उसने समय रहते इसकी निगरानी क्यों नहीं बरती। हो सकता है कि इस मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए। अभी इस मामले में कई और रहस्य अनावृत होंगे।

आइये अब आम आदमी की तकलीफों से जुड़े सवालों पर चर्चा की जाए। क्या इस वक्त पावर कारपोरेशन के कर्मचारी महाराष्ट्र के पीएमसी बैंक के खातेदारों की तरह खुद को परेशान और सवालों से घिरा नहीं महसूस कर रहे होंगे। भविष्य निधि के पैसे अक्सर लोग रिटायर होने के बाद अपने गुजर बसर, बेटी-बेटों के शादी ब्याह तथा गंभीर बीमारी के दौरान इलाज आदि जरूरी मदों में ही खर्च करते हैं। ऐसे में अगर इसकी निकासी पर रोक लगा दी जाए तो उनपर क्या बीतेगी। क्या इससे रकम डूब जाने का डर और नहीं बढ़ेगा। आम आदमी करे क्या। तकलीफदेह महंगाई में अगर वह अपने जरूरी खर्चों में कटौती करके कुछ रकम बचाता है तो उसे कहां जमा करे। क्या मौजूदा माहौल में शेयर बाजार, म्युचुअल फंड, सरकारी बैंक, अर्ध सहकारी बैंक अथवा अन्य वित्तीय संस्थान सुरक्षित निवेश की गारंटी दे पा रहे हैं। एक दौर वह भी था जब देश की जनता पोस्ट आफिस की शाखाओं, किसान विकास पत्रों, जीवन बीमा निगम की योजनाओं और बैंकों की सावधि जमा योजनाओं में आगे बढ़कर निवेश करती थी। केंद्र व राज्य सरकारें भी इसे पर्याप्त बढ़ावा देती थीं। वक्त जरूरत लोगों को अपनी जमा की गयी रकम आकर्षक ब्याज के साथ वापस मिल जाती थी। मितव्ययिता का जीवन जीते हुए आम आदमी जो छोटी बड़ी रकम जुटाता था वह राष्ट्र निर्माण के काम आती थी। परस्पर भरोसा कायम था। क्रियाशील तंत्र सौ फीसदी फुल प्रूफ भले ही न रहा हो लेकिन उसकी मंशा पर सवाल नहीं उठाये जा सकते थे।

मामला बिगड़ना कहां से शुरू हुआ। जब राजनेताओं, अफसरों और प्रशासकों का एक नेक्सस बनता चला गया। इसने कम अवधि में दुगना तिगुना धन लौटाने की धांधली कर रहे लोगों को भोली भाली जनता को बेवकूफ बनाने दिया। उनपर नकेल नहीं कसी गयी। जनता का धन लूट कर भाग जाने वाले लोगों के खिलाफ कठोर कदम नहीं उठाये गए। कई लोगों ने अपने आर्थिक साम्राज्य खड़े कर लिए। इन्हें राजनेताओं, अफसरों और पुलिस का प्रश्रय हासिल हुआ। जिस बैंकिंग तंत्र को इनके खिलाफ कड़े कदम उठाने चाहिए थे उसी ने इन्हें फलने फूलने का पर्याप्त मौका दिया।

मुक्त अर्थव्यवस्था के दौर में जब बाजार से पूंजी जुटाने की होड़ ने आम जनता के समक्ष शेयर बाजार का तिलिस्म खड़ा किया तो कम्पनियों के शेयर रातोंरात उठने और गिरने लगे। ऐसे में शेयर मार्केट के घोटालों ने आम जनता के विश्वास को बुरी तरह से छला। कम समय में ज्यादा लाभ कमाने वाली योजनाओं से उसका भरोसा हटा। वह बैंकों तथा भविष्य निधि में निवेश सरीखी सुरक्षित योजनाओं की तरफ दुबारा लौटा। लेकिन जो मौजूदा घटनाक्रम है वह उसके विश्वास को तोड़ने वाला है। लाख टके का सवाल यही है कि दुबारा इस भरोसे की बहाली कैसे हो सकेगी। कौन इस दिशा में पहल करेगा। एक दूसरे को दोषी ठहराने से काम नहीं चलेगा। आम जनता का भरोसा अगर टूटा तो बहुत बड़ी मुश्किल आ खड़ी होगी। यह आम आदमी का यकीन ही है जो तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सामूहिक भरोसा जिलाए हुए है।

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