असमिया मास्क है असम की संस्कृति की ताकत

गांव-गांव में महिला कारीगर तीन-चार माह पहले से गमोछा तैयार करने में जुट जाती हैं। एक गामोछा की कीमत बीस रूपए से लेकर एक सौ रूपए तक होती है। कीमत गामोछा के आकार और उस पर की गई कसीदाकारी के अनुरूप तय होती है। गामोछा बनाने पर महिलाओं का एकाधिकार है।

रविशंकर रवि

असमिया मास्क तनाव में रचनात्मकता की क्षमता का प्रमाण है। असमिया गामोछा की तर्ज पर तैयार किए गए मास्क इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय समाज किस कदर अपनी संस्कृति से जुड़ा हुआ है। असमिया गामोछा के उत्पादन से लाखों परिवारों की आजीविका चलती है। लॉकडाउन की वजह से बिहू उत्सव नहीं हो पाया। इस उत्सव में लाखों गामोछा की मांग होती है। जब गामोछा नहीं बिका तो कारीगरों ने असमिया मास्क तैयार कर लिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में स्थानीय उत्पादों  की ब्रांडिंग पर जोर दिया है, क्योंकि संकट में स्थानीय उत्पाद ही काम आते हैं। कहीं ने कहीं स्थानीय बाजार में स्थानीय उत्पादों का सम्मान आत्मनिर्भर की दिशा में बड़ी कड़ी है। लेकिन असम पहले से उस दिशा में आगे बढ़ चुका है।

कोरोना संकट के बीच जब मास्क की जरूरत पड़ी तो वे बाजार में उपलब्ध नहीं थे, यदि कहीं थे भी तो उसकी कीमत आम आदमी की हैसियत से अधिक थी। हर कोई अपनी हिफाजत के लिए मास्क तलाश रहा था। ऐसे में कुछ असमिया ने खुद मास्क तैयार करने की योजना बनाई।

सांस्कृतिक सोच का प्रतीक गामोछा मास्क

मकसद सिर्फ मास्क बनाना नहीं था, उसके पीछे एक सांस्कृतिक सोच भी थी। मास्क को असमिया गामोछा की आकृति दी गई। यानी असमिया संस्कृति मास्क में भी प्रवाहित होनी लगी। बाजार में बिकने वाले सामान्य मास्क बाहर से आते हैं, लेकिन असमिया मास्क का उत्पादन स्थानीय समूह कर रहे हैं। यानी मास्क की बिक्री के सारे पैसे राज्य में ही रहेंगे।

इससे दो बड़ा काम हुआ। एक तो लॉकडाउन की वजह से बेकार बैठे कारीगरों को रोजगार के साथ सृजन का मौका मिला और असमिया मास्क को असमिया संस्कृति से जोड़ दिया गया। दूसरी बात स्थानीय मास्क सभी के लिए उपलब्ध हो गए। इनकी धुलाई की जा सकती है और बार-बार उपयोग किया जा सकता है।

कारीगरोंं को मिला जीने का आधार

लॉकडाउन के बावजूद आज हजारों कारीगरों को जीने का आधार मिल गया है। असमिया मास्क धारण करने से जो अनुभूति होती है, वह बाजार से खरीदे गए मास्क में नहीं हो सकती है। यही अपनापन इस मास्क की ताकत है। लोगों को लगता है कि असमिया मास्क उन्हें पूर्ण सुरक्षा दे  सकता है, क्योंकि वह उनका अपना है। यही इस मास्क की सबसे बड़ी ताकत है।

दरअसल असमिया गामोछा असमिया संस्कृति की एक पहचान है। यह सिर्फ एक वस्त्र नहीं है। यह एक सम्मान है, संस्कृति का एक आधार है। इस बार कोरोना संकट की वजह से रंगाली बिहू का आयोजन सीमित तरीके से किया गया।

हर मंगल कार्य और उत्सव में असमिया गामोछा अनिवार्य है। सभी का स्वागत असमिया गामोछा से किया जाता है। यह गामोछा असमिया परंपरा का एक हिस्सा है। लेकिन जब कोरोना संकट की वजह से बिहू का सार्वजनिक उत्सव नहीं हो पाया तो असमिया गामोछा तैयारे करने वाले कारीगर परेशान हो गए।

कोरोना संकट और गामोछा कारीगर

असमिया गामोछा दुकानों या गोदामों में धरे रह गए। यह कारोबार लाखों लोगों की आजीविका से जुड़ा हुआ है। असम की अधिकांश असमिया महिलाएं गामोछा तैयार करना जानती हैं।

यही वजह है कि जब कोरोना संकट से बचने के लिए मास्क की जरूरत पड़ी तो सृजन में विश्‍वास करने वाले कारीगरों ने असमिया गामोछा की कलात्मकता मास्क में डाल दी। और उबाऊ दिखने वाले मास्क का सौंदर्य खिल उठा।  इससे स्थानीय कारीगरों की व्यस्तता बढ़ गई है। वे उत्साहित हैं।

दरअसल असमिया समाज की सबसे बड़ी ताकत उसकी रचनात्मकता है। वह संकट में भी अपने संस्कृति के साथ चलने का प्रयास करता है। अब यह जिम्मेदारी सरकार की है कि ऐसे आत्मनिर्भर समूहों को कैसे बाजार की जरूरत के अनुसार तैयार करे।

प्रेमिका प्रियतम के लिए बुनती है

प्रख्यात गायक भूपेन हजारिका का एक प्रसिद्ध गीत है-‘‘ दिल हूम-हूम करे..’’ यानि दिल धड़कने लगता है। बसंत का मौसम आते ही असमिया युवतियों का यही हाल होता है। उनकी धड़कनें बढ़ जाती है और वे अपने प्रियतम के लिए प्यार का धागा बुनने लगती है।

इस वक्त यदि असम के किसी गांव में जाने का मौका मिले तो युवतियों को करघे पर बैठकर प्यार का धागा बनते हुए देखा जा सकता है। क्योंकि बसंत का उत्सव बीहू करीब है। यह उत्सव है मस्ती का, जीवन में उत्साह भरने का और उन स्मृतियों को समेटकर रखने का।

बीहू के  दौरान युवतियां अपने प्रियतम को प्रेम स्वरूप गामोछा (गमछा) भेंट करती हैं। जिसे असमिया में बीहूवान भी कहते हैं। यह सामान्य गामोछा नहीं होता। यह बाजार से नहीं खरीदा जाता। युवतियां खुद यह गामोछा तैयार करती हैं और बीहू के दौरान अपने प्रियतम को भेंट करती हैं।

इसलिए उस गामोछा के एक-एक सूत में प्यार की महक  बसी होती है। एक-एक सूत प्रेमिका के साथ स्पर्श होता हुआ करघे से गुजरता है और गमोछा का आकार लेकर बाहर निकलता है। उस पर लिखा नाम दिखता नहीं है, उस बस महसूस किया जा सकता है।

गामोछा और बिहू

करघे से बाहर आने के बाद लाल किनारे वाले उस गमोछा पर लाल सूत से कसीदाकारी की जाती है। उस पर पक्षियों के चित्र उकेरे जाते हैं। उसी गमोछे को सर पर बांधकर प्रियतम मदमस्त होकर बीहू नृत्य करता है। वाद्ययंत्र बजाता है और उसकी प्रियतमा उन वाद्ययंत्रों की धुन पर जब थिरकती है तो लगता है कि कामदेव प्रकट हो गए हैं।

यदि बीहू नृत्य को ध्यान से देखा जाए तो उसकी एक-एक अदा में आमंत्रण होता है। अदाओं के माध्यम से प्यार का इजहार होता है। भविष्य को एक साथ बिताने का आमंत्रण होता है और ढेर सारे रंगीन सपने होते हैं। युवतियां गाने लगती हैं,‘बीहू-बीहू लागिसे’। कहने का मतलब यही है कि मन मदहोश हो, उसे प्यार चाहिए।

यदि प्यार के इजहार का इकरार हो गया तो वह युवती अगले बीहू में अपने प्रियतम के लिए प्यार के धागे से गमोछा तैयार करके भेंट करती है और यदि इनकार हो गया तो प्रेमी किसी और को रिझाने का प्रयास करता है।

यानी वह प्यार के धागे का बना गमोछा स्वीकृति का प्रतीक है। इसलिए असम में युवक-युवतियों के लिए बीहू का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व तो है ही, उनके जीवन का आधार भी यह रंगीन उत्सव है।

प्रेमी भी प्रेमिका को लुभाता है

सिर्फ युवतियां ही गमोछा तैयार नहीं करती हैं। अपनी प्रेमिका लिए कपौ फूल की तलाश में युवक जंगल-झाड़ियों में जाते हैं। कपौ फूल लेकर अपनी प्रेमिका को देते हैं। उसी कपौ फूल को अपने जूड़े में बांधकर प्रेमिका बीहू नृत्य करती है।

यानी प्रेमिका अपने प्रियतम को खुद का बनाया गमोछा भेंट करती है, जिसे प्रियतम अपने माथे पर बांधकर और प्रियतम के दिए गए कपौ फूल को जूड़े में लगाकर प्रेमिका बीहू नृत्य करते हैं। ऐसे में उनके प्यार का धागा बेहद मजबूत हो जाता है।

भले ही कई वर्षों तक उनका विवाह नहीं पाए, लेकिन पति-पत्नी बनकर दांपत्य जीवन के आरंभ तक उनका प्यार जीवित रहता है।  लेकिन जब तक शादी नहीं होती, प्रेमिका हर रंगाली बीहू में अपने प्रियतम के लिए गमोछा बनाते रहती है और प्रियतम अपनी प्रेमिका के लिए कपौ का फूल तलाशता रहता है।

असम में बसंत काल बीहू उत्सव के दौरान बीहू नृत्य आम तौर से अलग-अलग रूपों में सभी जनजातियों में किया जाता है। उनके वाद्य यंत्रों में कुछ बदलाव भले ही रहता है, उनकी भाषा भी अलग रहती है, लेकिन  बीहू नृत्य की भाव भंगिमाएं एक रहती है, भावनाएं एक रहती हैं। जो मदमस्त कर देने वाली होती हैं।

इस नृत्य के माध्यम से मादकता की बरसात हो जाती है। इसे समूह में किया जाता है। कई दिनों तक चलने वाले इस के दौरान युवक-युवतियां काफी करीब आ जाते हैं। उसके बाद प्यार का बीज बढ़ने लगता है।

सम्मान से भी जुड़ा है गामोछा

युवक माथे में गमोछा लपेट कर बिहू नृत्य करने लगता है। वह युवती मूगा का स्वर्ण रंग वाला मेखला और चादर (असमिया महिलाओं का पारंपरिक वस्त्र) धारण कर उसका अनुसरण करती है औ दोनों गा उठते हैं- बिहू-बिहू लागि से, तुमाके मरम कोरा मन गोय से (बिहू-बिहू लगता है, तुम्हें प्यार करने को जी चाहता है।)

युवतियां जब गमोछा बनाने बैठती हैं तो अपने प्रियतम के लिए तो प्यार के धागे को आकार देती ही हैं, कुछ अतिरिक्त गमोछा तैयार कर लेती हैं। जिसे घर के अन्य लोग अपने अतिथियों को भेंट करते हैं, लेकिन वह युवती अपने हाथ से गमोछा सिर्फ अपने प्रियतम को प्रदान करती है।

असम के किसी भी घर में आप अतिथि के रूप में जाएं, विदा करते वक्त आपको को गमोछा पहनाकर विदा किया जाएगा। वह गमोछा कोई सामान्य गमोछा नहीं होता है। ये आमतौर से घर में ही बनाए जाते हैं।

बिना गामोछा के बिहू नहीं

सफेद रंग के गमोछा का किनारे लाल रंग के सूते से कसीदा किया होता है। गमोछा को दोनों किनारे में में लाल-लाल फूल बने होते हैं। क्योंकि लाल रंग प्यार का प्रतीक होता है। असम का सबसे बड़ा उत्सव बिहू तो बिना गमछे के होता ही नहीं है।

बिहू के दौरान हर असमिया, चाहे औरत हो मर्द, नया गमोछा लेकर चलते हैं। इसलिए उस दौरान गमोछा की मांग बढ़ जाती है। अन्य मौके पर भी इसकी मांग रहती है। इसलिए गमोछा की जरूरत ने एक बाजार तैयार कर लिया है और यह ग्रामीण महिलाओं की आजीविका का एक बड़ा आधार भी बन गया है।

गांव-गांव में महिला कारीगर तीन-चार माह पहले से गमोछा तैयार करने में जुट जाती हैं। एक गमोछा की कीमत बीस रूपए से लेकर एक सौ रूपए तक होती है। कीमत गमोछा के आकार और उस पर की गई कसीदाकारी के अनुरूप तय होती है। गमोछा बनाने पर महिलाओं का एकाधिकार है।

इसलिए कोरोना और लॉकडाउन की वजह से गामोछा की मांग दब गई तो लोगों ने असमिया मास्क तैयार कर लिया।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं