खत्म होना ही चाहिए यह भ्रष्टाचार

रतिभान त्रिपाठी

राजनीति में कितनी अंधेरगर्दी और भ्रष्टाचार है, इसका ताजा उदाहरण बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती के भाई और पार्टी के उपाध्यक्ष आनंद कुमार की बेशुमार दौलत के रूप में सामने आया है। वैसे तो आनंद कुमार के पास अकूत दौलत होने के चर्चे तो बरसों से चलते रहे हैं लेकिन यहां की राजनीति और जनमानस का एक माइंडसेट है कि जब तक सरकारी एजेंसियां वह दौलत या भ्रष्टाचार पकड़ न लें, तब तक उस पर कुछ कहना – बोलना गुनाह माना जाता है। आनंद कुमार के बारे में यही माइंडसेट काम करता रहा है। वह तो आयकर विभाग ने नोएडा में जब 400 करोड़ रुपए की कीमत का सात एकड़ का एक प्लॉट पकड़ लिया, तब घोषित तौर पर स्वीकार किया गया है कि उसने भ्रष्टाचार करके दौलत बटोरी है। ऐसे में अब इस बात पर बहस छिड़ गई कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का यह दायरा बढ़ेगा या फिर इतने में ही सिमटकर रह जाएगा।

सन् 2007 तक नोएडा प्राधिकरण में एक मामूली क्लर्क की नौकरी करने वाले आनंद कुमार ने इतनी दौलत किस धंधे से बटोरी इसका कोई मुकम्मल हिसाब नहीं है लेकिन ऐसा कहा गया कि उसकी ओर से बनाई गईं नकली कंपनियों के अघोषित कारोबार से यह आमदनी हुई है। जब्त किए गए प्लॉट में आनंद कुमार के साथ उसकी पत्नी विचित्र लता भी साझीदार है। जिस दौर में यह बेनामी खड़ी की गई, उस समय इन दोनों के वित्तीय सलाहकारों को भी इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा कि वह जो सलाह दे रहे हैं और जिस तरह की कंपनियों के जरिए अकूत दौलत का कारोबार करा रहे हैं, एक दिन उसका खुलासा होगा। कौन नहीं जानता कि एक मामूली क्लर्क सात साल में इतनी रकम अपने बलबूते तो नहीं कमा सकता। जाहिर है कि इसके पीछे उसकी बहन मायावती ही हैं, जो उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्यमंत्री रही हैं। दुनिया में शायद ऐसा एक भी रोजगार या कारोबार नहीं जिसके जरिए कोई भी संपत्ति सात साल में 18 हजार गुना बढ़ा ली जाए। यदि ऐसा नहीं है तो मायावती सरेआम यह बात क्यों नहीं कहतीं कि भाई आनंद कुमार और भाभी विचित्र लता के कारोबार और दौलत से उनका कोई रिश्ता-नाता नहीं। सरकार जो कर रही है, ठीक कर रही है।

अभी तो जानकारी यह भी आ रही है कि आयकर विभाग के पास आनंद कुमार की कुछ और बेनामी संपत्तियों की जानकारी है, जिसे भविष्य में जब्त किया जा सकता है। यह भी तय है कि आनंद कुमार के खिलाफ चल रही कार्रवाई की आंच मायावती तक पहुंचनी है। आयकर के अलावा प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) भी तो इस मामले में जांच कर रहा है। आनंद कुमार की बेनामी संपत्ति 1300 करोड़ के आसपास बताई जा रही है।

सच्चाई तो यही है कि देश-प्रदेश के अनेक नेताओं के पाए ऐसी ही बेनामी संपत्ति है। उत्तर प्रदेश के संदर्भों में बात करें तो यहां तीन बार मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव और उनके पुत्र अखिलेश यादव पर आय से अधिक संपत्ति का मुकदमा भी चला। यह बात दीगर है कि कानूनी दांव-पेच में पिता-पुत्र फिलहाल बच निकले हैं। मायावती भी आय से अधिक संपत्ति के मामले में बच निकली हैं लेकिन हकीकत कौन नहीं जानता। कानूनी बारीकियों से खुद को बचा ले जाना और जनता की नजर में बचे रहने में फर्क होता है।

राजनीति में नैतिकता की बात करने वाले नेताओं से जब ऐसे नेताओं के भ्रष्टाचार की बात की जाए तो वह सब इनका समर्थन करने लगते हैं। एक भारी भरकम समाजवादी नेता से मैंने खुद कई मौकों पर उनकी पार्टी के शीर्ष नेताओं के भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए थे तो वह उनका बचाव करते थे। कहा करते थे कि अगर पैसा नहीं होगा तो राजनीति कैसे होगी। प्रतिप्रश्न पर कि क्या यह जरूरी है कि जिस रास्ते में भ्रष्टाचार हो, उस पर चला जाए तो इसका जवाब उनके पास नहीं होता था। फिर वह कांग्रेसियों का भ्रष्टाचार बताने लगते थे।

बहरहाल, मायावती के भाई के बहाने से ही सही, उत्तर प्रदेश के नेताओं के भ्रष्टाचार की पोल खुलने लगी है। यह तो शुरुआत है। इसकी आंच अभी दूसरे नेताओं तक भी पहुंचनी है। यह सुखद संकेत है कि भ्रष्टाचार पर हमला किया जा रहा है लेकिन इसे कुछ नेताओं विशेष तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। चाहे वह विरोधी पार्टियों के नेता और उनेक रिश्तेदार हों या फिर सत्ताधारी पार्टी के, जांच सबकी होनी चाहिए। नेताओं के अलावा नौकरशाहों ने भी अकूत दौलत बटोरी है। अखंड प्रताप सिंह, नीरा यादव जैसे नौकरशाह भ्रष्ट आचरण के कारण ही जेल भेजे गए थे लेकिन उनके परिजन तो उस दौलत का सुख उठा ही रहे हैं। इस पर भी सरकार और उसके तंत्र का ध्यान जाना चाहिए। तंत्र अगर चुनिंदा लोगों को ही निशाने पर लेगा और कार्रवाई करेगा तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल होंगे। वह आरोपों से बच नहीं पाएगा। ऐसे में उसकी जवाबदेही बनती है कि सत्ता पक्ष के भ्रष्ट लोगों पर भी चाबुक चलाए।

कौन नहीं जानता कि सैकड़ों ऐसे नौकरशाह हैं जिन्होंने अपनी आय से अधिक संपत्ति अर्जित की है। जांच उसकी भी हो। न केवल जांच हो, वरन ऐसी संपत्ति जब्त होनी चाहिए, ताकि भ्रष्टाचारियों को सबक मिले। लेकिन जो हालात हैं, उन्हें देखकर ऐसा लगता नहीं कि तंत्र इस दिशा में सक्रियता दिखाएगा। ऐसे में सरकार में बैठे लोगों की जिम्मेदारी बनती है कि अपने तंत्र को इस दिशा में भी सक्रिय होने को कहें। वरना मायावती के भाई और भाभी तक जांच पड़ताल को सीमित करने, संपत्ति जब्त करने से सरकार की मंशा पर सवाल उठेंगे। सत्ताधारियों को मायावती के समर्थकों का कोपभाजन भी बनना पड़ सकता है। कम से कम भ्रष्टाचार में जिन लोगों का नाम जगजाहिर है, उन्हें तो इस दायरे में घेरना ही चाहिए।

मायावती के करीबी रहे बाबू सिंह कुशवाहा, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, अपराध जगत में नाम कमाकर राजनीति में आए मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद जैसे पचासों नाम मिलेंगे जिनकी दौलत जांच के दायरे में आनी चाहिए। इसका समाज में सकारात्मक संदेश जाएगा। अगर ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई हुई तो राजनीतिक भ्रष्टाचारी और नौकरशाह अकूत दौलत इक_ा करने से पहले सौ बार सोचेंगे। चूंकि फिलहाल डबल इंजन वाली सरकार है। सरकार में बैठे लोग भय, भूख और भ्रष्टाचार मुक्त भारत की बात करते हैं तो अपनी बात को अमल में लाकर दिखाएं। उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार में लालू यादव और उनका परिवार, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और उनके इर्द-गिर्द बैठे लोग, महाराष्ट्र में शरद पवार, कर्नाटक में बीएस येद्दियुरप्पा, तमिलनाडु में करुणानिधि के वंशज और जयललिता के उत्तराधिकारी भी जांच के दायरे आने चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बहनोई राबर्ट वाड्रा के खिलाफ जांच तो चल ही रही है। सच्चाई है कि हमारे देश का सबसे बड़ा नासूर भ्रष्टïाचार है। इसे चाहे जैसे हो, खत्म करना ही चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)