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कल्याण सिंह और मेरी पहली मुलाकात, बातचीत का सिलसिला कुछ ऐसे शुरू हुआ...

Kalyan Singh: कल्याण सिंह जी ने बातचीत का सिलसिला कुछ इस तरह शुरू किया," योगेश जी! आपको शत शत वंदन। आपका अभिनंदन । मैंने आपको सहारा में पढ़ा । बहुत रोया कि कोई आदमी दूर से हमें इतना क़रीब से जानता है। आप बहुत अच्छा लिखते हैं।"

Yogesh Mishra

Yogesh MishraWritten By Yogesh MishraShreyaPublished By Shreya

Published on 21 July 2021 1:11 PM GMT

शिखर पुरुष- कल्याण सिंह
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कल्याण सिंह (डिजाइन फोटो- न्यूजट्रैक)

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Kalyan Singh: कल्याण सिंह से मेरा परिचय एक अविश्वसनीय घटना है। मैं राष्ट्रीय सहारा अख़बार (Rashtriya Sahara Newspaper) में काम करता था। वहाँ मेरे पास संपादकीय पृष्ठ का दायित्व था। अपने मित्र व आज के नामी साहित्यकार अखिलेश के सुझाव व सहयोग के चलते हमने साहित्य का एक सृजन पेज निकालना शुरू किया।

विश्वविद्यालय के दिनों में जो कंपीटिशन में असफल हो जाते थे। वह या तो कोचिंग पढ़ाने लगते थे या फिर सिविल सेवा की हर नौकरी के लिए जुटे रहते। एक बार सिविल में असफल होने के बाद मेरे पिताजी मेरी कुंडली लेकर गोरखपुर के एक पंडित कृष्ण मुरारी मिश्र जी के यहाँ गये। कृष्ण मुरारी जी को हमारे पिताजी के एक दोस्त त्रिपाठी चाचा जानते थे। वह नारंग चीनी मिल घुघली में हम लोगों के पड़ोस में ही रहते थे। पारिवारिक दोस्ती सी हो गयी थी। पिताजी चाहते थे कि मैं राज्य की सिविल व अधीनस्थ परीक्षाएँ भी दूँ। पर मैं तैयार नहीं था। यही पंडित जी के यहाँ जाने का कारण बना।

कृष्ण मुरारी जी ने कुंडली देखते ही कहा, "मिश्रा जी आपका बेटा सरकार में चपरासी भी नहीं हो सकता। " फिर मैंने पूछा आख़िर करूँगा क्या? पंडित जी का उत्तर था, " टीचर बनोगे या पत्रकार।" पिताजी आबकारी विभाग में काम करते थे। पत्रकारों को लेकर उनके बहुत रिज़र्वेशन थे। वह पत्रकार को अच्छा नहीं मानते थे। पर वह कर ही क्या सकते? निराश मन से हम सब वापस मोहद्दीपुर स्थित किराये के घर आ गये। पर चलते समय पंडित जी ने पिताजी को तसल्ली के लिए यह कहा कि मिश्र जी आपके बेटे का यश रहेगा। इसकी शादी चौबीस से सत्ताइस नवंबर के बीच होगी। जिस दिन होगी उस दिन वृहस्पतिवार होगा।

बात आयी गयी। लेकिन जब मेरी शादी चौबीस नवंबर को हुई । रिशेप्सन सत्ताइस नवंबर को रखा गया। शादी का दिन भी वृहस्पति था। तब मेरे कान खड़े हुए। हमें लगा कि कर्म के अलावा कुछ और भी हैं जो आदमी की सफलता में बड़ी भूमिका अदा करता है। वह है- भाग्य, नियति। हालाँकि आज तो मैं यह मानने लगा हूँ कि आदमी की सफलता में माँ बाप व बड़ों का आशीर्वाद, भगवान की कृपा, बराबर व छोटे उम्र के लोगों की शुभकामनाएँ, भाग्य और फिर कर्म की जगह है।

असफलता ने ऐसे किया प्रेरित

पर यह ज़रूर हुआ कि मैं कृष्ण मुरारी जी के बहुत क़रीब आ गया। गोरखपुर जाने के हर अवसर पर मैं उनसे मिलना नहीं भूलता। उनकी राय मानने लगा। इस बीच पत्रकार हो गया। कंपीटिशन की असफलता ने हमें पत्रकारीय जीवन में रोज़गार का पन्ना अवसर नाम से निकालने के लिए प्रेरित किया। सृजन व अवसर दोनों पन्ने बहुत लोकप्रिय हुए।

मैं डेस्क पर काम करता था। इसलिए पत्रकारों सरीखे ग्लैमर व रिश्तों की कोई आशा नहीं थी। इस बीच कृष्ण मुरारी जी ने मेरी कुंडली देखकर कहा कि आपके किसी बड़े नेता से करीबी संबंध बनेंगे। डेस्क पर होने की वजह से इस पर भरोसा करने लायक़ कुछ नहीं था। पर कृष्ण मुरारी जी की भविष्यवाणी पर अविश्वास की वजह भी नहीं थी। कल्याण सिंह के सचिवालय में कई मेरे मित्र भी थे। एक दोस्त ने हमें कल्याण सिंह की कविताएँ देते हुए कहा कि इसे मैं सृजन पेज पर छाप दूँ। हमने एक पीस लिखा जनतंत्र को निहारती कविताएँ।

कल्याण सिंह (फाइल फोटो साभार- सोशल मीडिया)

जब लेख को पढ़कर आया कल्याण सिंह जी का फोन

राष्ट्रीय सहारा में 14 फ़रवरी, 1998 की तारीख़ को मेरा यह पीस प्रकाशित हुआ। दूसरे दिन कल्याण सिंह जी ने पढ़ा। उस समय अनूप पांडेय जी सूचना निदेशक थे। उनके मार्फ़त हमारे घर का नंबर जुटाया गया। उस समय मैं अलीगंज के सेक्टर के में रहता था। घर पर मैं नहीं था। कल्याण सिंह जी के यहाँ से मेरे बेसिक फ़ोन पर फ़ोन आया। पत्नी से बात हुई। दूसरी ओर से कहा जा रहा था, "कल्याण सिंह जी बात करेंगे।" पत्नी ने पूछा कौन कल्याण सिंह। क्योंकि डेस्क का पत्रकार होने के नाते उम्मीद नहीं थी मुख्यमंत्री से भी संबंध बन सकते है। उधर से बताया गया मुख्यमंत्री कल्याण सिंह।

उस समय उषा कंपनी का बड़ा सा मोबाइल फ़ोन चलन में आया ही था। मेरे दोस्त राजेंद्र सिंह उसके हेड थे। उन्होंने भाव बनाने के लिए हमें इस निर्देश के साथ दिया था कि कम से कम उपयोग करूँ। उस समय लोग अपना मोबाइल नंबर सार्वजनिक नहीं करते थे। इनकमिंग व आउटगोइंग दोनों पर बराबर पैसा लगता था। पत्नी ने मेरा मोबाइल नंबर नोट करा छुट्टी पा ली। मैं राजेंद्र भौनवाल जी के साथ बैठा था। वह आबकारी विभाग में ही सचिव थे। तब तक मेरा फ़ोन बजा। मैं सोचने लगा उठाऊँ या न।

कुछ सोचकर हमने फ़ोन उठाया। उधर से अवधेश जी बोल रहे थे। हमारी बात उनने कल्याण सिंह जी से कराई। कल्याण सिंह जी ने बातचीत का सिलसिला कुछ इस तरह शुरू किया," योगेश जी! आपको शत शत वंदन। आपका अभिनंदन । मैंने आपको सहारा में पढ़ा । बहुत रोया कि कोई आदमी दूर से हमें इतना क़रीब से जानता है। आप बहुत अच्छा लिखते हैं।"

हमारा जवाब था," यदि किसी प्रजा के कर्म से राजा को रोना आ जाये तो प्रजा की खैर नहीं। मेरा दंड बताइये।" उनका जवाब था," मैं आपसे दोस्ती करना चाहता हूँ।" मैंने कहा, "प्रस्ताव बहुत आकर्षक है। मैं ख़ुद को आम में ख़ास बना कर रहता हूँ। आपके यहाँ यह ख़ासपन डाल्यूट न हो जाये।"

उन्होंने भरोसा दिलवाया कि आप मिलेंगे तो आपको अच्छा लगेगा। हमारे कान में कृष्ण मुरारी जी के बात की घंटी बजने लगे। जब मैं पहली बार कल्याण सिंह जी से मिलने गया तो मेरी स्कूटर मुख्यमंत्री आवास के पोर्टिको तक जाने दी गयी। उस दिन कल्याण सिंह तबके आबकारी मंत्री रहे सूर्य प्रताप शाही व तबके आबकारी प्रमुख सचिव एस पी आर्या के साथ मुख्यमंत्री आवास पर ही मीटिंग कर रहे थे। इसलिए बाहर, जहां मैं बैठा था, निकलने में देर हो गयी। मेरे सामने चाय व कुछ बिस्कुट व नमकीन परोस दिये गये थे। थोड़ी देर में कल्याण सिंह बाहर निकलकर आये। उनका वाक्य था," योगेश जी आपका नमन। आपकी उम्र तो बहुत कम है। अच्छा लिखते हैं।"

फिर हम लोग एक दूसरे कमरे में चले गये। कल्याण सिंह जी मेरी पढ़ाई लिखाई, पारिवारिक पृष्ठ भूमि के बारे में पूछते रहे। हमने बताया। उन्होंने अपने साहित्य से लगाव के बारे में बताया। पूछा मेरी कविताएँ आपको कहाँ से मिली। उन्होंने अपने बारे में बताया कि वह सुबह की चाय खुद बनाते हैं। चाय वह अच्छी बना लेते हैं। वह मट्ठा छौंकना भी जानते हैं।

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

बचपन की घटना से कराया रूबरू

बचपन की एक घटना भी उनने बताई कि वह छोटे थे तो गाँव में एक पंडित आये थे। उसके पास इनकी माँ कल्याण सिंह जी को लें गयी थीं। पंडित ने कहा था कि यह लड़का एक दिन जहाज़ से गाँव में आयेगा। यह भी बताया कि पहली बार उनने अपने लिए सेकेंड हैंड साइकिल ख़रीदी थी। जिस पर सवार होकर जब गाँव में घूमते थे तो गाँव के कई लोग इनके पिता से कहते थे कि तुम्हारा बेटा जहाज़ से चल रहा है। उनकी माँ को यह बात अच्छी नहीं लगती थीं। वह सोचती थी कहीं बेटे के जहाज़ से गाँव उतरने की पंडित की कही बात गाँव वालों की बात से कट न जाये।

कल्याण सिंह जी ने बताया कि जब मुख्यमंत्री बनने के बाद वह पहली बार सरकारी हेलिकॉप्टर से अपने ज़िले व गाँव गये तो उस पंडित की याद उन्हें बहुत आई। कल्याण सिंह को प्रदेश की हर विधानसभा के बारे में ख़ूब ठीक से पता रहता है। वह केवल यह नहीं बताते कि किस विधानसभा से भाजपा किसे टिकट दें बल्कि यह भी बता देते हैं कि दूसरी पार्टियाँ किसको उतारेंगी। या किस बिरादरी का उनका उम्मीदवार होगा। कल्याण सिंह जी के जीवन में कुसुम राय का कालखंड निकाल दिया जाये तो उनका मूल्यांकन एक ईमानदार, नतीजे देने वाले, कर्मठ व सभी जातियों में लोकप्रिय नेता के रूप में करना भी कम होगा।

अफसरों के बारे में रखते हैं पुख्ता जानकारी

उन्हें प्रदेश के हर ठीक-ठीक अफसर के बारे में पुख़्ता जानकारी रहती रही है। एक बार भदोही में तैनात एक अफ़सर को हटाने के लिए तब भाजपा में रहे बाद में बसपा में चले गये नेता जी ने ग्रीन कार्ड लाकर कल्याण सिंह जी के सामने रख दिया। ग्रीन कार्ड के प्रायोजक की क़ालीन की कंपनी थी। उसके मालिक कांग्रेस के नेता थे। नेताजी यह बताना चाहते थे कि पुलिस कप्तान कांग्रेस का प्रचार कर रहा है। कल्याण सिंह जी ने उन्हीं नेता के सामने पुलिस कप्तान को फ़ोन मिलाया और कहा कि तुम डीजीपी को कोई तीन पोस्टिंग के ऑप्शन बता दो। नेताजी तुम्हें वहाँ रहने नहीं देंगे। फ़ोन रखने के बाद नेता जी को कहा कि पुलिस के पास इन मदों के लिए कोई पैसा नहीं होता है। यह सब प्रायोजित ही करवाना पड़ता है।

एक बार पश्चिम के एक पुलिस कप्तान ने विधायक जी के चाचा की गाड़ी चालान कर दी। विधायक जी शिकायत लेकर कल्याण सिंह जी के पास पहुँचे। कल्याण सिंह जी ने पुलिस कप्तान को फ़ोन मिलाया। पूछा विधायक जी के चाचा की गाड़ी का चालान क्यों किया? कप्तान का जवाब था कि सघन चेकिंग के दौरान उस गाड़ी के पेपर नहीं थे। कल्याण सिंह ने पुलिस कप्तान से पूछा कि कोई और गाड़ी बताओ जिसका चालान किया हो। कप्तान किसी दूसरी गाड़ी व उसके नंबर के बारे में नहीं बता पाया। कल्याण सिंह जी ने तुरंत उसे हटाने का आदेश दे दिया।

एक बार एक बड़े प्रतिष्ठित डिग्री कालेज के प्राचार्य असलहा के लाइसेंस की सिफ़ारिश करने आ धमके। कल्याण सिंह जी ने उनकी बात सुनी। कहा यदि आपको लड़कों के बीच जाने के लिए सुरक्षा चाहिए तो आप इस्तीफ़ा दे दें। मैं आपके लाइसेंस के लिए कह दूँगा। एक बार एक डॉक्टर ने अपने तबादले के लिए दस पंद्रह विधायकों का पत्र लगवाया। कल्याण सिंह जी ने उसे बुलवाकर नसीहत दी कि इतने विधायक आपके साथ हैं तो आप डॉक्टरी छोड़ राजनीति कीजिये।

कल्याण सिंह (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

भर्ती को ईमानदारी से कराने के लिए ली राय

मुझे याद है कल्याण सिंह का कार्यकाल में व्यापक पैमाने पर समूह ग की भर्ती हो रही थी। वह चाहते थे कि पूरी की पूरी भर्ती बेहद ईमानदारी से हो। इसके लिए वह लोगों से राय ले रहे थे। एक राय आई कि उत्तर पुस्तिका की दो कॉपी हो। एक कॉपी लड़का ले जाये। दूसरी कॉपी परीक्षकों दी जाये। लड़के अपने पास की उत्तर पुस्तिका से उत्तर मिला सके। उन्होंने इस परीक्षा में इंटरव्यू केवल दस नंबर के रखे। उसमें सात या आठ नंबर देना अनिवार्य था।

यह पूरी भर्ती न केवल ईमानदारी से हुई बल्कि इसका पालन आज भी परीक्षाओं में किया जाता है। हाल फ़िलहाल अब इसका भी लोगों ने तोड़ निकाल लिया है। एक बार मैं उनके साथ रात को बैठा था उन्होंने तंबाकू खा रखी थी। उन्हें बहुत हिचकी आ रही थी। मैंने उन्हें राय दी कि वह पानी पी लें। हिचकी बंद हो जायेगी। उनका जवाब था। तंबाकू खाने का आनंद हिचकी आने में ही हैं। वह चाय अच्छी बताते हैं। सुबह की चाय प्राय: खुद बनाते थे। मैंने उनके साथ छौंका हुआ मट्ठा पहली बार पिया था।

एक मीडिया समूह के उर्दू अंक का विमोचन करने के लिए लखनऊ के सांसद व तत्कालीन प्रधानमंत्री का समय इस समूह ने ले लिया था। पर कल्याण सिंह नहीं चाहते थे। सो उन्होंने उसे रद करा कर ही साँस ली। कल्याण सिंह को अटल जी केंद्र में कृषि मंत्री बनाने को तैयार थे। पर कल्याण सिंह नहीं चाहते थे। अटल जी को कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाने में पसीने छूट गये। उन्हें पार्टी के टूट जाने का डर था। सो कल्याण सिंह को तैयार किया गया कि वह इस्तीफ़ा दे दें। इसके लिए कल्याण सिंह की यह शर्त मानी गयी कि राजनाथ सिंह जी उनके उत्तराधिकारी नहीं होंगे। कल्याण सिंह को हटने, हटाने का जब सिलसिला चल रहा था तब बिठूर में संघ की बैठक चल रही थी। संघ की बैठक में कल्याण सिंह जी को डिशओन किया गया। इस बात का उन्हें हमेशा मलाल रहा।

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया

कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। अपनी पार्टी बनाई। लेकिन भाजपा को तोड़ने की कोई साज़िश नहीं की। वह जब हटाये जा रहे थे तब मुलायम सिंह का यह प्रस्ताव था कि पार्टी तोड़ें सपा के सहयोग से सरकार बनाये। पर यह कल्याण सिंह को नामंज़ूर था। जब राम प्रकाश गुप्ता का नाम मुख्यमंत्री के लिए तय हो गया। वह अपने बेटे राजीव लोचन के साथ मुख्यमंत्री आवास गये तो नाराज कल्याण सिंह समर्थक भाजपाई राम प्रकाश गुप्ता जी के ख़िलाफ़ नारे लगाने लगे। कल्याण सिंह घर के अंदर अपने कुछ लोगों के साथ मंत्रणा कर रहे थे। वह बाहर निकले। राम प्रकाश गुप्ता जी का हाथ पकड़ कर अंदर ले गये।

नहीं चढ़ा भगवा रंग

कल्याण सिंह को पार्टी में वापस लाने की क़वायद जब चल रही थी। तब वह पूरे मन से तैयार नहीं थे। मुझसे बातचीत में वह कहा करते थे, उनकी ख्वाहिश थी कि भाजपा के झंडे में लिपट कर जाये। मैंने कहा कि इसी ख्वाहिश को पूरा करने के लिए घर वापसी करें। घर वापसी के बाद पार्टी में उनकी चलनी शुरू हो गयी। पर पता नहीं क्यों उन पर भाजपा का रंग नहीं चढ़ा। पार्टी आफिस में केवल उनकी नंबर प्लेट सादी थीं।

हमने एक खबर लिखी कल्याण सिंह पर नहीं चढ़ रहा भगवा रंग। उनके नेम प्लेट का चित्र लगाया। पढ़ कर उनने बस यही कहा कि बहुत पैनी नज़र रखते हो। उन्हें मायावती के साथ सरकार बनाने का फ़ार्मूला पसंद नहीं था। वह मिली जुली जो सरकार बना व चला रहे थे। उसके भी वह ख़िलाफ़ थे। वह उस समय चुनाव में जाना चाहते थे। पर उनकी नहीं चली। कल्याण सिंह के जीवन का शीर्ष प्रदर्शन उनके स्वास्थ्य मंत्री का कार्यकाल था। उसमें उनने बहुत शोहरत कमाई।

उनमें ह्यूमन टच अंदर तक घर कर गया था। वह मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी समस्या को हल करने में कई बार बहुत लंबा समय लगा देते थे। ईमानदारी दो तरह की होती है- फ़ाइनेंशियल व प्रोफेशनल । कुसुम राय प्रकरण को हटा दें तो उनमें दोनों तरह की ईमानदारी पायी जा सकती है। प्रशासन व शासन को जानने समझने की उनमें गहरी इच्छा थी ताकि वह अच्छा से अच्छा कर सकें। उनके पास वित्त मंत्रालय भी था।

उस बार का बजट उनके अफ़सर डी. के कोटिया ने बनाया था। कोटिया जी को वह एक अच्छा अफ़सर मानते थे। कोटिया जी उनके प्रिय अफ़सरों में भी थे। लेकिन उन्होंने बजट का ड्राफ़्ट तीन बार एक एक शब्द पढ़ा। पाँच बार कोटिया जी से डिस्कस किया। बाद में कलम से काफ़ी कुछ लिखा व जोड़ा भी। काम करने की लगन व मेहनत वह एक्स्ट्रा आर्डिनरी है उनमें।

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

सबको सुनने के बाद लेते थे निर्णय

ऑफ़िसर के साथ मीटिंग में वह सबको अपना विचार रखने की पूरी स्वतंत्रता देते थे। सबको सुनने के बाद अपना निर्णय लेते थे। पर निर्णय ले लेने के बाद उसे लागू करने के सिवाय कुछ भी सुनने को तैयार नहीं रहते थे। फ़ाइलों पर वह नहीं चाहते थे कि उनकी मर्ज़ी से नोट लिखा जाये। बल्कि वह हर स्तर के अधिकारी को अपने हिस्से का नोट लिखने की पूरी स्वतंत्रता देते थे। बाद में अपने स्तर पर वह जो चाहते थे बदल कर वह लिख देते थे। उन्हें 'लेस ऑफ पालिटिशियन, मोर ऑफ ब्यूरोक्रेट' भी कहा जा सकता है। डमी नोट के बावजूद वह कोई भी फाइल पूरा पढते थे।

एक दिन से ज़्यादा फ़ाइल रोकने में उनका कोई यक़ीन नहीं था। वह शाम को भेजी गयी फ़ाइलों को दूसरे दिन सुबह अपनी टिप्पणी के साथ वापस कर देते थे। वह सिस्टम पर विश्वास करने वालों में शुमार किये जाते है। एडहाकिज्म में उनका कोई यक़ीन नहीं था। वह कहीं दौरे पर जाते तो वहाँ की समस्या के बारे में अध्ययन करके जाते। इस बात की तहक़ीक़ात कर लेते की वहाँ की जनता बतौर मुख्यमंत्री उनसे क्या घोषणा सुनना चाहेगी। उस घोषण का शासनादेश साथ लेकर जाते थे। इसके लिए वित्त व संबंधित विभागों से सहमति भी ले लिया करते थे।

यदि कोई नई घोषणा उन्हें करनी पड़ी तो वापस आते ही शासनादेश बनवाते थे। उनने प्रशासन में जातीय एलीमेंट के लिए कोई जगह नहीं रखी थी। हर फ़ैसले के लेने और उसे स्वीकारने का उनका चलन बहुत क़ाबिले तारीफ़ था। यही वजह है कि जब अयोध्या का विवादित ढाँचा गिरा तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने ही नहीं फ़ाइल पर अपनी ज़िम्मेदारी ओन की थी। इसी के बाद वह राम मंदिर के नायक के तौर पर उभरे। वह उत्तर प्रदेश से बाहर जाते तो महिलाएँ वह जिस रास्ते से होकर गुजरे होते थे उसकी माटी सिर लगाती थी। उन्होंने पहली बार भगवा को विकास से जोड़ा। यह प्रयोग कल्याण सिंह ने शुरू किया जिसे बाद में मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने गुजरात में परवान चढ़ाया।

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