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Kavita: गाढ़ गम्हिर गिरीश पुकारत, हे गुरुदेव तोहर दोहाई

Kavita : ये कविता लेखक गिरीश श्रीवास्तव द्वारा रचित है।

Girish Srivastava
Updated on: 14 Jun 2021 2:12 AM GMT
Kavita: गाढ़ गम्हिर गिरीश पुकारत, हे गुरुदेव तोहर दोहाई
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होत निहाल मना मन ही मन,मोद भरा निरखी हरषाई।

दिव्य छटा घनघोर घटा नेहिंया बरसैइ मनवां सुख दाई।
भूखि पियास भुलाइग आश्रम, तृप्ति गुरू कैइ दर्शन पाई।
गाढ़ गम्हिर गिरीश पुकारत, हे गुरुदेव तोहर दोहाई।

बुद्धि विवेक द अऊ दृढ़ टेक द,छाड़ि के मोह सदा गुन गाई।
शक्ति द भक्ति द काटि द बन्धन, मुक्ति द नेह के गंग नहाई।
साध अगाध इहैइ मन में,सेवकाई करी गुरुदास कहाई।
गाढ़ गम्हिर गिरीश पुकारत हे गुरुदेव तोहर दोहाई।

धीर धरैइ नहिं चैन परैइ अकुलाई हिया कइसे समुझाई।
साधन हीन अनाथ अपंग,अगोरत राह ल पास बुलाई।
साध अगाध मोरे मन में ,धुरिया गोड़वा कइ मूड़े लगाई।
गाढ़ गम्हिर गिरीश पुकारत, हे गुरुदेव तोहर दोहाई।

आस भरोस श्री नख कैइ, नहिं दूजा कोई जग में बा सहाई।
हे अविकारी विकार मिटाइ द,जोति जराई द नाथ अघाई।
हे शक्तेसगढ़ी जग जानत,गीता यथार्थ क पाठ पढ़ाई।
गाढ़ गम्हिर गिरीश पुकारत है गुरुदेव तोहर दोहाई।

घेरी घटा घनघोर घने तम,तोम मनैइ मन में अकुलाई।
छाड़ि दुआरि तोहार प्रभु, असहाई बताव कहाँ हम जाई।
दास के आस भरोस न आनि,गोहार सुना गहि ल प्रभु धाई।
गाढ़ गम्हिर गिरीश पुकारत ,हे गुरूदेव तोहार दोहाई।

सूरज चाँद प्रकाशित शासित,तोरे कृपा कैइ का गुन गाई।
विघ्न विनाशी,सदा सुखरासी,हे पूरनमासी कहाँ तम छाई।
हे अविनाशी विकार हर,परमानन्द शिष्य गुहार लगाई।
गाढ़ गम्हिर गिरीश पुकारत, हे गुरूदेव तोहर दोहाई।

साध अगाध मोरे मन कैइ नित,सांझ सबेरे क दर्शन पाई।
पानउ फूलउ अक्षत माथे पे ,भाव क चंदन रोरी लगाई।
छांउ द ठांउ द पांउ परी,बहियाँ गहि ल प्रभु गंग नहाई।
गाढ़ गम्हिर गिरीश पुकारत, हे गुरूदेव तोहार दोहाई।

वेद पुराण बखान करैइ, महिमा करुणा निधि की गुन गाई।।
शेष महेश गनेश दिनेशहूं,हारी गयें पर पार न पाई।
आदिन अन्तन मध्य प्रभु, जग जाहिर बा तोहरी प्रभुताई।
गाढ़ गम्हिर गिरीश पुकारत हे गुरुदेव तोहार दोहाई।

मेटि द शाप के काटि द पाप के,भार अपार प्रभू गरूआई।
सूझत नाईं बा राह मना, भटकैइ दिन-रात कहाँ सुख पाई।
आस भरोस कृपा गुरुदेव क,नेह झरैइ हमहूँ मुसकाई।
गाढ़ गम्हिर गिरीश पुकारत हे गरुदेव तोहार दोहाई।

शब्द समर्थ कहाँ जग में,सत शारद हारी गई गुन गाई।
साध अगाध मोरे मन में,पद पंकज धोई के माथे चढ़ाई।
को नहिं जानत है महिमा करूणा कर की करूणा रज पाई।
गाढ़ गम्हिर गिरीश पुकारत हे गुरूदेव तोहार दोहाई।

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Shivani

Shivani

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