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क्या है मन !

Kya Hai Mann: कई दिल को मन मान लेते हैं। यह ग़लत है। दिल की बिमारी को दवा से ठीक किया जा सकता है। पर मन की बिमारी तभी ठीक हो सकती है जब उसकी वाली कर दी जाये।

Yogesh Mishra

Yogesh MishraWritten By Yogesh MishraShivaniPublished By Shivani

Published on 3 Aug 2021 9:34 AM GMT

Kya Hai Mann
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क्या है मन 

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Kya Hai Mann : मन के हारे हार है। मन के जीते जीत। सबने सुना होगा- मन उदास होता है, मन खुश होता है। मन संदेशों से , मौसम से नियंत्रित होता है। मन पर नियंत्रण की कला साधक सिखाते हैं। हमारी आपकी समूची स्थितियाँ मन पर निर्भर करती है। मन को लेकर सबसे अधिक कहावतें व मुहावरे हैं। मन से देखने की बात भी हर किसी के जीवन में आयी होगा। यह भी आपने कई बार कहा होगा कि यह काम करने को मन नहीं कर रहा है। ऐसे में यह सवाल कि आख़िर आँख की जगह मन से क्यों देखें? मन काम करने या नहीं करने को क्यों कहता है? मन शरीर में कहाँ रहता है? इसका आकार क्या है?

मन से प्रत्येक व्यक्ति परिचित है । मन ही सभी शक्तियों-कल्पना शक्ति तथा इच्छा शक्ति का स्रोत है।मन हमारे भीतर की शक्ति है , जो इन्द्रियों एवं मस्तिष्क के द्वारा देखता है,सुनता है,सूंघता है,स्वाद लेता है। स्पर्श की अनुभुति करता है। मन ही शरीर को सुख-दुख का अनुभव कराता है। व्यक्ति जब बेहोशी की अवस्था में होता है , तब मन का संपर्क शरीर से टूट जाता है ।

कई दिल को मन मान लेते हैं। यह ग़लत है। दिल की बिमारी को दवा से ठीक किया जा सकता है। पर मन की बिमारी तभी ठीक हो सकती है जब उसकी वाली कर दी जाये। दिल धड़कता है। दिल दिखता है। पर मन तो अदृश्य है। मन धडक नहीं सकता है। फड़क सकता है।

दुनिया का पहला सबसे बड़ा ब्रेन मैप

कई मस्तिष्क को ही मन समझ लेते हैं। गूगल ने दुनिया का पहला सबसे विस्तृत ब्रेन मैप बनाया । इससे इंसानी दिमाग़ में मौजूद न्यूरॉन के बीच कनेक्शन स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। इस ब्रेन मैप में 50 हजार सेल्स थ्री डी में भी दिखाए गए हैं। मैप दिखाता है कि सेल्स किस तरह लाखों करोड़ों टेनड्रिल यानी नसों से जुड़े होते हैं। सेल्स और टेनड्रिल के संजाल से 13 करोड़ कनेक्शन बनते हैं , जिन्हें साइनप्स कहा जाता है।

इस मैप ने ब्रेन के मात्र एक मिलीमीटर हिस्से को छुआ है। इतने ही हिस्से में 1.4 पेट्राबाइट डेटा नापा गया है। जो एक औसत कंप्यूटर की स्टोरेज डेटा क्षमता से करीब 700 गुना ज्यादा है। वैज्ञानिक वीरेन जैन के मुताबिक़ यह ब्रेन डेटा इंसानी जीनोम जैसा है । इस पर अनुसंधान 20 साल से जारी है।

ब्रेन मैपिंग कब शुरू हुई (Brain Mapping kab Shuru hui)

ब्रेन मैपिंग का काम तब शुरू हुआ जब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के जेफ लिशमैन के नेतृत्व में एक टीम को 45 साल की एक महिला के मस्तिष्क का एक टुकड़ा हासिल हुआ। इस महिला को मिर्गी की शिकायत थी। इसके चलते उसके मस्तिष्क का ऑपेरशन किया गया था। ऑपेरशन से मस्तिष्क का वह हिस्सा निकाल दिया गया जिसकी वजह से मिर्गी के दौरे पड़ते थे। लेकिन इस हिस्से को निकालने के क्रम में सर्जनों को मस्तिष्क के कुछ स्वस्थ टिश्यू भी हटाने पड़े।

जेफ लिशमैन की टीम ने स्वस्थ टिश्यू को तत्काल प्रिजर्वेटिव के घोल में सुरक्षित रख लिया गया। इसके बाद इसमें खास कलर मिलाए गए ताकि हर सेल की बाहरी झिल्ली इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से देखी जा सके। इसके बाद उसे ऐसे पदार्थ में डाला गया जिससे टिश्यू सख्त हो कर प्लास्टिक जैसा हो गये। वैज्ञानिकों ने इसके बाद उस टुकड़े को 30 नैनोमीटर यानी इंसानी बाल के एक हजारवें भाग की अति महीन मोटाई में काट दिया। अब हर टुकड़े को इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप में देखा गया। वीरेन जैन की टीम ने 2 डी टुकड़ों को थ्री डी चित्र में बदल दिया। इससे टेनड्रिल, न्यूरॉन, आदि थ्रीडी में दिखाई देने लगे। मन के साथ हम बहुत कोशिशों के बाद भी ऐसा नहीं कर सकते। ऐसा नहीं कर पाये। मन का कोई चित्र आज तक नहीं बनाया जा सका। न ही यह पता लगाया जा सका कि मन नियंत्रित किससे होता है। मस्तिष्क द्वारा शरीर पर नियंत्रण रखा जाता है। मस्तिष्क शरीर व मन को जोड़ने का कार्य करता है। जो लोग मन और दिमाग को एक ही समझ रहे हैं , उनके लिए -वैज्ञानिक यह साबित कर चुके हैं कि मन और दिमाग एक ही चीज नहीं हैं।बहुत सी ऐसी चीजे हैं जो मन और दिमाग को पूरी तरह से अलग कर देती हैं।

कई लोग मन को आत्मा मान बैठते हैं। यह भी ग़लत है। क्योंकि मन कई बार मरता है। मन मारना पड़ता है । पर आत्मा को हम मार नहीं सकते हैं । गीता दर्शन के हिसाब से यह अजर,अमर है। मन व चेतना में भी अंतर है। मन अनेक होते हैं। मन समाज का उपोत्पाद है।

मन की चार प्रवृत्तियां

मनोवैज्ञानिक मन की चार प्रवृत्तियां- वर्तमान मन, अनुपस्थित मन, एकाग्र मन, और दोहरे मन बताते हैं।व्यक्ति प्राय: वर्तमान मन के साथ रहता व जीता है। आत्मा हमारा साथ छोड़ती है तो हम शव हो जाते हैं। वह एक बार ही साथ छोड़ती है। पर मन कई बार साथ छोड़ता है। जब वह साथ छोड़ता है तब हमें केवल निश्चेष्ट होते हैं। प्रज्ञा व संज्ञा शून्य नहीं होते। एक दम व्यर्थ नहीं हो उठते।

मन शांत नहीं होता। मौन नहीं होता।मन का स्वभाव ही है तनावग्रस्त होना। उलझन में पड़ रहना है। उत्पात करना है। उपद्रव करना है। मन अपने आप में एक समस्या है। मन कभी भी स्पष्ट नहीं होता। क्योंकि मन स्वभाव से उलझन है। अस्पष्टता है। स्पष्टता तभी संभव है जब मन ना हो। मौन तभी संभव है जब मन ना हो। इसलिए कभी भी शांत मन को पाने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए । कई पीढ़ियों से हमें योग के ध्यान, धारणा व समाधि तथा विपश्यना के मार्फ़त मन पर नियंत्रण की कला सिखाई जा रही है। पर कोई भी इसमें पारंगत नहीं हो पाया। जो हुआ वह इहलोक लायक़ नहीं रह गया।

हमारे आस-पास जो भी घट रहा है उन सब की जड़ें मन में हैं। मन ही सदा हर विचार व घटना का कारण होता है। यदि कुछ क्षण के लिए भी मन ठहर जाए। हम क्षण भर के लिए भी इस बात के प्रति सचेत हो जायें कि मन नहीं है। मन मिट गया है। पिघल गया है। भाप बन कर उड़ गया है। हम बस एक शुद्ध अस्तित्व--एक श्वास, एक ह्रदय की धड़कन, पूर्णता क्षण में, ना अतीत, ना भविष्य इसलिए वर्तमान भी नहीं रह जाते।

हम मन का प्रयोग तब तक नहीं कर सकते जब तक कि यह न पता चल जाए कि मन के बिना कैसे हुआ जाए। केवल वे ही लोग जो मन के बिना होना जान लेते हैं, मन का उपयोग करने में सक्षम हो जाते हैं। नहीं तो मन ही हमारा उपयोग करता रहता है। यह मन ही है जो हमारा उपयोग कर रहा है। पर मन बहुत चालाक है। वह समझाता चला जाता है कि,"तुम मेरा उपयोग कर रहे हो।"

मन मालिक बन गया है। हम उसके गुलाम हैं। मन वह हिस्सा है जो हमारा नहीं है। दिया गया है। उत्पन्न किया गया है। गढ़ा गया है। मन का अर्थ है वह जो समाज ने हम में भर दिया है। वह हम नहीं हैं। मन के चलते ही मनोवृत्तियाँ हैं। मनोविकार हैं। मन की गति का कोई सानी नहीं हैं। वह पल भर में कहीं से कहीं की यात्रा कर सकता है। वह सपने बुन सकता है। वह सपनों में रंग भर सकता है। वह सपनों को सफ़ेद श्याम भी छोड़ सकता है। किसी भी कला के लिए मन चाहिए । विस्तृत मन चाहिए । इश्क के लिए मन चाहिए । संवेदनशील मन चाहिए । कुछ भी करना हो या छोड़ना हो तो उसके लिए मन ही चाहिए । इस संदर्भ में बहुत से लोग इच्छा शक्ति को मन मान बैठते हैं। पर यह भी सही नहीं है। इच्छा मन से एकदम अलहदा होती है। इच्छाएँ तृप्त होती हैं। अतृप्त भी रह जाती हैं। पर मन के साथ ऐसा नहीं होता। वह जो चाहता है हमें करना पड़ता है। पर इच्छाओं के साथ ऐसा नहीं। कुछ खाने की इच्छा हो जाये तो आप छोड़ भी सकते हैं। पर मन कर जाये तो नहीं छोड़ सकते हैं। हर्ष व विषाद के चित्र मन ही गढ़ता है। मन हमारे होने की पहचान है। हमारी संज्ञा व विशेषण की पूर्णता का आधार भी मन ही बनाता है। गढ़ता है। चित्त वृत्ति का निरोध मन के बिना नहीं हो सकता। यह शक्ति है। ताक़त है। हमारी कमजोरी भी है।कबीर ने लिखा है-"..मन का मनका फेर।"

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं ।)

Shivani

Shivani

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