ये बचपन भी थोड़ा अजीब है, मजदूरी बनी अभिशाप है…

ये बचपन भी थोड़ा अजीब है
कंधों पर किताबों का नहीं जीवन का बोझ है।
ना कोई उल्लास है ना कोई रोमांच है,
आंखों में नींद नहीं, पेट में अजब सी आग है
हाथों में खिलौने हैं ना आंखों में खेलने  की ललक
इन्हें तो अपने समान ही बच्चों को खिलाने का काम है।
बाल मजदूर इनका नाम है।
ना घर, ना बार है,ना मां-बाप ना रिश्तेदार
सबको बस अपने काम की परवाह है
प्यार उसको मिला नहीं, आंखे खोली तो खुद को सड़क पर पाया
पेट की आग को शांत करने के लिए खुद से जूझता रहा है।
कहीं काम मिला, कहीं धिक्कार और फटकार
सड़क को उसने बिस्तर बनाया, आसमां को चादर
कभी जूठन तो कभी पानी पीकर उसने भूख को शांत किया
बाल मजदूर बनकर क्या उसने पाप किया
नियमों के बंधन में बंधकर बाल मजदूर को ना मिला काम
पेट की भूख को मिटाने के लिए उसने किया पढ़ाई का त्याग
कल का भविष्य आज है बेहाल
इस बेहाली को मिटाना है तो बाल मजदूरी को मिटाना होगा
उसकी आंखों में सपने दिखाना होगा,
खिलौने बनाने वाले हाथों में खिलौने थमाना होगा
ये बचपन थोड़ा अजीब है
बाल मजदूरी बनी अभिशाप है।