‘आस्था के प्रश्न तथा अम्फान एवं कोरोना का साहचर्य’

सब कुछ उसी दैवी सत्ता या प्रकृति या सृष्टि के नियमों पर छोड़कर समय की प्रतीक्षा करने के अलावा कुछ नहीं बचता। हम प्रकृति का और प्रकृति को संचालित करने वाली शक्तियों का धन्यवाद एवं आभार प्रकट करते हैं और प्रकट करना चाहिये, यही मानवीय वृत्ति है।

डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र

जैसा की विदित है, अनेक लोगों के मन में अनेक प्रकार के प्रश्न इस समय चल रहे हैं। ये प्रश्न इसलिये भी हैं, क्योंकि पूजास्थलों के दरवाजे और उसमें विराजमान या अधिष्ठित शक्तियाँ आखिर क्या कर रही हैं? जब भारत और दुनिया भर में कोविड-19 ने सबके सामने आपद स्थिति उत्पन्न कर रखी है।

लोग महामारी की विभीषिका से न केवल पीड़ित हैं; बल्कि आक्रान्त भी हैं। भय और आक्रान्त का यह वातावरण व्यक्ति के मन में स्वाभाविक रूप से अनेक प्रश्न खड़े कर रहा है। लेकिन प्रश्न चाहे जो हों, प्रकृति अपने निर्णय अपने अनुसार ही करती है। ये निर्णय सत्य से भी अधिक निर्मम व क्रूर होते हैं।

भरसक प्रकृति, व्यक्ति और जीव को तथा जैविक एवं अजैविक सभी तत्वों को गलतियां न करने के पर्याप्त अवसर प्रदान करती है; जितना ही जो कम गलतियां करता है, उसको उतना ही कम दण्ड मिलता है।

बावजूद इसको समझे, मानव अपने अनेक प्रकार के उद्वेलनों एवं आशंकाओं के साथ साथ अनेक प्रकार के प्रश्नों से भी गहराई से जुड़ता जाता है और वे प्रश्न बहुत बार वास्तव में प्रश्न न होकर संशय और अविश्वास अधिक होते हैं।

आस्था और अनास्था

यह भी स्पष्ट है कि ईश्वरीय सत्ता और कुछ नहीं, प्रकृति सृष्टि सौर्यमण्डल तथा पृथ्वी और इनके समेकित घटनाक्रम का निर्माण निर्धारण संचालन एवं परिणाम देने का कार्य करती है। ऐसी शक्ति को आप जो नाम देना चाहें, दे सकते हैं और उसके अनुसार अपनी आस्था प्रकट कर सकते हैं। ऐसी परिस्थिति में अनास्था का भी सवाल खड़ा होता है और उस अनास्था के दो रूप होते हैं।

एक, जिनको प्रकृति सृष्टि सौरमण्डल या पृथ्वी के अस्तित्व एवं इनसे जुड़े घटनाक्रमों पर विश्वास नहीं होता है, उनके मन में और अनास्था उत्पन्न होती है और दूसरे वे अनास्थावान होते हैं, जो आस्था प्रकट करते करते या तो थक जाते हैं या उनको पता नहीं होता कि आस्था कैसे प्रकट की जाती है या आस्था होती क्या है?

आस्था के साथ कर्तव्य भी जरूरी

व्यक्ति केवल आस्थावान होकर अपने आस्था का प्रतिफल नहीं प्राप्त कर सकता, उसे आस्था के अनुरूप कर्तव्य भी करने होते हैं और वह कर्तव्य व्यक्ति के सकारात्मक दिशा में रचनात्मक और भरसक त्रुटि रहित होने चाहिये। इसे प्रकृति और उसके नियन्ता की शर्त मानकर चलना चाहिये।

प्रकृति का यह भाव और विचार जो ठीक से समझ पाता है, सही अर्थों में वही आस्थावान होता है और वही प्रकृति तथा उसके नियन्ता तथा प्रकृति के अवयवों के कार्य व्यवहार और परिणाम को ठीक से समझ सकता है। अन्यथा स्वाभाविक रूप से वह संशय भ्रम और अविश्वास में जाता ही है।

तापमान में परिवर्तन

पिछले लगभग पैंसठ दिन से भारत में कोविड-19 को और पिछले लगभग 50 दिन से जो अनुभव भारतवर्ष के अधिकांश भागों में तापमान को लेकर लोगों के द्वारा महसूस किया जा रहा है। उससे यह स्पष्ट होता है कि अप्रैल और 10-12 मई तक का जो तापमान था, वह तापमान इस कालखण्ड के वास्तविक औसत मासिक तापमान जैसा नहीं था।

अर्थात 10 एवं 12 मई के आसपास तक लोगों को चद्दर ओढ़कर एवं बिना एसी और कूलर के सोना पड़ा है। तात्पर्य यह कि तापमान की सघनता जिस प्रकार अप्रैल के दूसरे तीसरे सप्ताह एवं मई के पहले दूसरे सप्ताह में होनी चाहिये थी या जैसी अन्य वर्षों में होती है, वैसी रही नहीं।

अगर थोड़ा पहले आता चक्रवात

यदि तापमान इन समयों में पूर्व वर्षों की भाँति रहा होता, तो निश्चित रूप से अम्फान नाम का चक्रवाती तूफान अप्रैल के तीसरे सप्ताह में विशाखापट्टनम से लगभग एक हजार किलोमीटर पूर्व-दक्षिण में सक्रिय होकर भारत के पूर्वी तट पर अपनी क्रूरतम दस्तक दे चुका होता।

इतना ही नहीं गोवा से लेकर त्रिवेंद्रम विशाखापट्टनम तथा भुवनेश्वर एवं कोलकाता होते हुए भारत के आन्तरिक हिस्सों में भी लगभग 400 से 500 किलोमीटर अन्दर तक स्थलीय भागों में भयंकर तबाही एवं व्यापक जन धन हानि कर चुका होता।

तूफान का केन्द्र विशाखापट्टनम से लगभग 1000 किलोमीटर और भुवनेश्वर से लगभग 1100 किलोमीटर पूर्वी-दक्षिणी छोर पर बंगाल की खाड़ी में मई के दूसरे सप्ताह में आरम्भ हुआ; यह भूमध्य रेखीय क्षेत्र है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि उष्ण कटिबन्ध में उत्पन्न होने वाला यह तूफान भारत में व्यापक तबाही मचाता; लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

अगर सीधे भारत में आता अम्फान

एक अनुमान के अनुसार यदि यह तूफान अप्रैल के तीसरे सप्ताह में आया होता तो, इसकी गति 250 से 300 किलोमीटर प्रति घण्टे की होती और यह इस गति के साथ जो अम्फान भारत के तटों पर टकराता, न्यूनतम लगभग एक लाख लोगों की न केवल जान लेता, बल्कि अन्य जीव-जन्तुओं वनस्पतियों, संसाधनों तथा धन भवन अवस्थापनात्मक सुविधाओं का भी दूरगामी एवं व्यापक नुकसान करता।

साथ ही साथ यह अम्फान यदि अप्रैल के तीसरे सप्ताह में कोरोना का भारत में साहचर्य पा जाता तो, दोनों मिलकर भारत की स्थिति को बहुत ही दुर्दम्य पीड़ादायक एवं असह्य बना देते। भारत की आर्थिक सामाजिक राजनीतिक सभी प्रकार की गतिविधियों को नष्ट कर देते और देश न्यूनतम 40 से 50 वर्ष पीछे की स्थिति में पहुंच जाता।

यदि यह तूफान आता तो कोई सड़क पर चलते हुए, कोई रात को सोते हुए, कोई भोजन करते हुए, कोई भोजन कराते हुए, कोई बच्चे को स्कूल छोड़ते हुए, कोई बच्चे को स्कूल से लाते हुए, कोई पत्नी को अस्पताल ले जाते हुए, कोई अपने मां-बाप की दवा लाते हुए और न जाने कब कैसे कितना जल्दी लोगों को भूकम्प और सुनामी की तरह काल के गाल में लेकर चला जाता।

होशियारी चालाकी से बात नहीं बनेगी

किसी को किसी के ऊपर दोष मढ़ने, दोष देने, अपनी राजनीति करने का कोई अवसर यह तूफान नहीं देता। प्राकृतिक आपदा जब आती है तो, वह अपने साथ इसी प्रकार की विद्रूप एवं वीभत्स स्थिति ले आती है। इसलिये यहां दो बातें स्पष्ट हैं कि व्यक्ति को किसी भी प्राकृतिक आपदा या वैश्विक आपदा या महामारी को लेकर किसी भी प्रकार की राजनीति होशियारी एवं चालाकी नहीं करना चाहिये, चाहे वह पक्षी हो या विपक्षी हो!

केवल और केवल मानवीय व्यवहार एवं कार्य को प्रश्रय देना चाहिये। इस बात को भी किसी को दोष नहीं देना चाहिये कि, अमुक राजनीति कर रहे हैं, इसलिये मैं भी राजनीति कर रहा हूँ। राजनीति करना अपने आप में एक सहज, किन्तु सामान्य एवं सहज समय में किया जाने वाला कार्य है। इसको असहज एवं असामान्य स्थिति परिस्थिति में नहीं करना चाहिये।

दूसरा, जब भी इस प्रकार की विपत्ति आती है, चाहे वह भूकम्प हो या ज्वालामुखी हो या चक्रवात, प्रतिचक्रवात वाताग्र अथवा भूस्खलन ही क्यों न हो; व्यक्ति को सहज एवं सामान्य व्यवहार करते हुए उसको स्वीकार करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होता।

दैवी शक्तियों का कृतज्ञ होना चाहिए

कम से कम वर्तमान परिस्थिति में प्रकृति ने भारतवर्ष का बहुत साथ दिया है। बहुत सहयोग किया है और भारत को प्रकृति का और प्रकृति को नियन्त्रित करने वाली दैवी शक्तियों का आभार प्रकट करना चाहिये एवं कृतज्ञ होना चाहिये।

भारत एवं भारतीय लोगों की आस्था के कारण ही हम बहुत बड़े संकट से बच सके हैं। अब हमारे सामने केवल ऐसा ही संकट है कि उस संकट का हम एक निश्चित समय में न केवल समाधान प्राप्त कर लेंगे; बल्कि सभी दृष्टियों एवं पक्षों से उससे उबर भी पायेंगे।

इस सम्बन्ध में यह कहना कि मन्दिरों आदि में बैठे देवी देवता क्या कर रहे हैं? यदि उनमें शक्ति है तो कोरोना से मर रहे लोगों की रक्षा क्यों नहीं कर रहे हैं? इस अम्फान नामक प्राकृतिक आपदा ने यह प्रमाणित कर दिया है कि, वे कितनी और कैसी मदद कर सकते हैं और प्रकृति के नियम के अनुसार उन्हें कितना और कैसा सहयोग करना चाहिये।

यही है मानवीय वृत्ति

कोरोना और अम्फान के सहसम्बन्ध ने यह भी प्रमाणित कर दिया है कि यदि दोनों एक साथ कोरोना के पहले या दूसरे चरण में होते तो प्राकृतिक आपदा और महामारी का गुणक प्रभाव होता; परिणामस्वरूप उस विभीषिका को भारत एवं निकटवर्ती क्षेत्र में सम्भालना किसी सरकार या स्वयंसेवी संस्थाओं के वश में चाहकर भी नहीं होता।

सब कुछ उसी दैवी सत्ता या प्रकृति या सृष्टि के नियमों पर छोड़कर समय की प्रतीक्षा करने के अलावा कुछ नहीं बचता। हम प्रकृति का और प्रकृति को संचालित करने वाली शक्तियों का धन्यवाद एवं आभार प्रकट करते हैं और प्रकट करना चाहिये, यही मानवीय वृत्ति है।

 

असोसिएट प्रोफेसर, भूगोल
बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर।
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