अफवाहबाज-ब्लैकमेलर्स ने हथियाए आमजन के हथियार

आरटीआई, आई जी आर एस, जनहित याचिकाओं, सोशल मीडिया, ए.आई. और 156(3) का हुआ जमकर दुरुपयोग, आम नागरिकों के अधिकार कमजोर, संस्थाएं दबाव में, सख्त कार्रवाई की जरूरत।

Naved Shikoh
Published on: 10 Nov 2025 4:13 PM IST
Misuse of RTI, IGRS and Social Media Fuels Blackmail Networks
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Misuse of RTI, IGRS and Social Media Fuels Blackmail Networks (Social Media)

आम नागरिक, सरकारी विभाग, पुलिस, न्यायधीश, सूचना आयोग.. सब के सब ब्लैकमेलर्स अफवाह बाज शिकायती गिरोहों से परेशान हैं। सूचना आयुक्त और सरकारी विभागों ने साफ कहा है कि सूचना के अधिकार और मुख्यमंत्री शिकायत पोर्टल (आई जी आर एस) का खूब दुरुपयोग हो रहा है। इसी तरह आम समाज की ताकत सोशल मीडिया/ए. आई. भी अफवाह बाजों का हथियार बन गई है। जनहित याचिकाओं के बेजा इस्तेमाल से न्याय-व्यवस्था परेशान हैं। जिसके होते झूठी और फर्जी तथ्यहीन आरोपों पर बार-बार याचिकाएं दाखिल करने वालों को अर्थदंड का प्रावधान लागू किए जाने पर मजबूर होना पड़ा है। सोशल मीडिया के साथ ए.आई. (आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस) की आधुनिक तकनीक को अफवाह बाजों ने कोढ़ में खाज बना दिया है। अभी कुछ दिन पहले ही ए. आई. जनरेट तस्वीर ने सोशल मीडिया के माध्यम से अफवाह फैला दी कि लखनऊ के पॉश कॉलोनी में शेर घूम रहा है। ऐसी तस्वीर बनाकर वायरल करने वाले युवक को गिरफ्तार कर लखनऊ पुलिस ने इस अफवाह पर विराम लगाया। इसी तरह ए. आई. तकनीक से एक फर्जी वीडियो में दिखाया गया कि देश की प्रतिष्ठित महिला पत्रकार गृह मंत्री के जूते साफ कर रही हैं। अफवाह बाजी की ऐसी एक नहीं सैकड़ों-हजारों कहानियां हैं।

ब्लैकमेलर और अफवाह बाज सूचना का अधिकार कानून और सोशल मीडिया का खूब दुरूपयोग कर रहे हैं। एजेंडा धारी स्वार्थवश झूठे एजेंडे चला रहे हैं। साइबर अपराध खूब फल फूल रहा है।

सूचना का अधिकार,जनहित याचिका हो,आई जी आर एस या सोशल मीडिया,आम नागरिकों के ये जायज हथियार नाजायज तरीके से हथिया लिया जा रहा है। वैसे ही जैसे देश की हिफाजत करने वाले सैनिकों का हथियार आतंकवादियों के हाथ आ जाए।

पिछले दो दशक में बहुत कुछ बदला है। तकनीक का तेजी से विस्तार हुआ और इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी आगे बढ़ी। सोशल मीडिया और सूचना का अधिकार का सदुपयोग भी हो रहा इसमें कोई शक नहीं, किंतु दुरुपयोग अधिक हो रहा ये अत्यंत चिंता का विषय है। जरुरत इस बात की है कि आम नागरिक अपनी ताकत की पहरेदारी करें, कानून, शासन-प्रशासन इन विसंगतियों पर सख्त हो। नागरिक सोशल मीडिया के झूठ और सच को समझें, जरुरत के लेहाज़ से इसका अधिक से अधिक सकारात्मक और रचनात्मक उपयोग करें। नहीं तो खुले गुड़ पर मक्खियों की तरह शरीफ आमजन की ताकत को बदमाश ब्लैकमेलर, अफवाह बाज,समाज-विरोधी,एजेंडा धारी दबंग हथियाए ले रहे हैं।

सोशल मीडिया सूचनाओं, जानकारियों,ज्ञान, सकारात्मक कंटेंट, प्रतिभाओं, झूठ के खिलाफ सच्चाइयों को आसानी से परोसने और आगे बढ़ाने का बेहतरीन माध्यम है। सूचना का अधिकार सूचनाएं, जानकारियां प्राप्त करने, पार्दर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ आम जनता का अधिकार है और ताकतवर हथियार भी। सोशल मीडिया के हथियारों के साथ जनहित याचिकाओं और शिकायत के अधिकारों का दुरपयोग करने वाले शिकायती गिरोहों की ब्लैकमेलिंग के धंधे जितना परवान चढ़ रहे हैं आम नागरिकों का अधिकार कमजोर पड़ रहा है। ये चिंता का विषय है और इसपर लगाम बेहद जरूरी है।

ब्लैकमेलिंग के माफिया आम इंसानों की ताकत और अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण कर उनके अधिकारों को निरंतर कमजोर कर रहे हैं। आरटीआई की साइट पर जाइए और शिकायतों के विवरण पर गैर कीजिए तो पता चलेगा कि चंद नाम निरंतर दर्जनों सूचनाएं मांगे जा रहें हैं और ऐसा ही मुख्यमंत्री शिकायत पोर्टल पर भी कुछ शिकायतकर्ता या तो बार-बार शिकायत कर रहे हैं या फिर फर्जी नामों या डमी नामों से शिकायतें खूब की जा रही हैं।

ऐसे ही ब्लैकमेलिंग के इरादे से शिकायती गिरोह का एक एक सदस्य आधा आधा दर्जन जनहित याचिकाएं दाखिल किए हैं। और बाद में अधिकांश याचिकाओं की पैरवी बंद कर दी जाती है। यानि समझौता, सफल निगोशिएशन या यूं कहिए कि ब्लैकमेलिंग का ऑपरेशन लेन-देन सफल और याचिकाएं,शिकायतें, सूचनाएं डंप या वापस ले ली जाती हैं।

राज्य सूचना आयुक्त और लखनऊ विकास प्राधिकरण सहित कई सरकारी विभागों के अनुसार एक व्यक्ति दर्जनों/सैकड़ों बार सूचनाएं मांगता और शिकायतें करता हैं। ये लोग संगठित तौर पर पैरवी और अपील में भी डटे रहते हैं। ऐसे में आम इंसान की जायज शिकायत या मांगी गई सूचना धंधेबाजों की भीड़ में बहुत पीछे हो जाती है। खबर के लिए सूचनाएं मांगने और भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार भी ब्लैकमेलरों के संगठित गिरोहों से परेशान हैं।

ब्लैकमेलिंग, रंगदारी और वसूली के गिरोह आरटीआई और आईजीआरएस (मुख्यमंत्री शिकायत पोर्टल) पर फर्जी नामों से भी शिकायतें करते हैं। इसके लिए इनके पास कुछ डमी कैंडीडेट्स की आईडी होती है। शिकायत में डमी नाम से करते हैं और पैरवी,अपील और सूचना/शिकायत का प्रचार प्रसार खुद करते हैं। ऐसे गैंग बाकायदा सिस्टेमैटिक ढंग से काम करते हैं। एक विंग के लोगों की आईडी या सिग्नेचर /फर्जी सिग्नेचर से सूचनाएं मांगी जाती हैं। आई जी आर एस ( मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत) की जाती है। जनहित याचिकाएं मांगी जाती हैं। ये धमकी भरे नोटिस भेजने और धोखाधड़ी से फर्जी एफआईआर/ 156(3) कराने में भी माहिर होते हैं। आरटीआई के तहत मांगी गई सूचनाओं और शिकायतों को सोशल मीडिया पर वायरल करने का विंग अलग होता है। गिरोह का तीसरा विंग जनहित याचिकाएं/एफआईआर/आईजीआरएस/शिकायत वापस लेने के निगोशिएशन के लिए होता है।

चिंता की ये ज्यादा बात नहीं कि लोग ब्लैकमेलिंग का शिकार हो रहे हैं।‌ अधिकांश वहीं शिकार होते हैं जिनकी कमियों को ब्लैकमेलर जान जाते हैं। अधिक चिंता की बात ये हैं कि आम नागरिकों का जायज़ हथियार छीन कर नाजायज़ तरीके से चलाया जा रहा है।

वैसे ही जैसे गरीबों की झोपड़ियों और बस्तियों पर भू-माफियाओं की नजर रहती है। गुंडे-बदमाश,माफिया,दबंग.. ये ऐसी प्रजाति है जो अपनी दंबगई,गुंडई और माफियागिरी गरीबी और शरीफों पर पहले हाथ साफ करती है। ताकतवर सत्ताधारियों से भिड़ना इनके लिए मुश्किल होता है क्योंकि सत्ताधारी नेता होता है और अधिकांश नेता दबंगई, दादागिरि और बाहुबल की प्रयोगशाला से गुजर कर नेता बनते हैं। लोहा लोहे को काट देता है इसलिए आपराधिक प्रवृत्ति का लोहा लकड़ी जैसी सॉफ्ट धातु पर चलाया जाता है।

आम जनमानस, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अधिकार रूपी सशक्त हथियारों को ब्लैकमेलिंग की शिकायती गिरोहबाजी से मुक्त कराना कानून, शासन-प्रशासन,पत्रकारिता और जनता सभी का फ़र्ज़ हैं।

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Ramkrishna Vajpei

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