सांसद क्या मात्र अनमोल रत्न बन कर रह गए?

मदन मोहन शुक्ला

गरीबी, अशिक्षा ,बेरोजगारी बीमारियों व सामाजिक कुरीतियों से जूझ रहा हमारा देश एक ऐसे मुहाने पर खड़ा है जहां एक तरफ खाई तो दूसरी तरफ पहाड़ है। डगर कठिन है। अब समय आ गया है कि विकास की ऐसी नीति अपनाई जाए जिससे जन सक्रियता सुनिश्चित हो और लोकहित के कर्तव्यों को पूरा करने के लिए ऐसा शासनतंत्र हो जिसमें जिम्मेदारी का भाव समाहित हो। लेकिन अफसोस ऐसा कोई भाव हमारे माननीय सांसद नहीं ला पाए हैं। वो बस अपनी कमी का ठीकरा अपने विरोधियों पर फोड़ते रहते हैं।

इस भाव को नाना जी देशमुख ने बहुत पहले पढ़ लिया था तभी तो 24 दिसम्बर 2004 के युवाओं को लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए हमारा संघर्ष काफी यातनापूर्ण रहा। परन्तु इस सबके बावजूद इसकी परिणीति खंडित भारत के रूप में हुई। नानाजी ने लिखा कि हमने संसदीय लोकतंत्र को चुना और मानव अधिकार के मूल तत्वों को अपने संविधान में शामिल किया। इसी संविधान ने केंद्र तथा राज्यों में विधायिका की व्यवस्था दी जो देश भर में एक संवेदनशील तथा उत्तरदायी शासन सुनिश्चित कर सके। दुर्भाग्य से इसकी परिणीति एक ऐसे राजनीतिक नेतृत्व के रूप में हुई जिसने लोकतंत्र की मूल भावना से ही धोखा किया। यह राजशाही के संस्थानों की याद दिलाता है। स्थिति शायद उससे भी बुरी बनी है। हमारे राजनीतिक नेतागण, विशेषकर चुने हुए प्रतिनिधि, अधिकाधिक धनवान बनते जा रहे हैं। इसने निश्चित रूप से हमारे लोकतंत्र को मिट्टी में मिलाया है।

एडीआर की एक रिपोर्ट के अनुसार 2009 से 2019 के लोकसभा चुनावों के बीच करीब 30 फीसदी करोड़पति सांसद बढ़े हैं। जो 2009 में 58 फीसदी थे वे बढक़र 2019 में 88 फीसदी हो गए है। जिनकी औसत संपत्ति 20 करोड़ से ऊपर है। इसी तरह 2009,2014 एवं 2019 चुनावों में आपराधिक छवि वाले सांसदों में 44 फीसदी तक की वृद्धि हुई।

इन सांसदों की कारगुजारी की अगर बात करें तो 2018 के 14वें सेशन में लोकसभा की कार्यवाही को बाधित करने एवं वाकआउट में 1.98 अरब रुपए बर्बाद हो गए। 2012 में यूपीए सरकार में संसदीय कार्य मंत्री रहे पवन कुमार बंसल के अनुसार संसद के प्रति मिनट संचालन पर 2,50,000 रुपए का खर्चा आता है।। सांसदों की सुख सुविधा, वेतन, भत्ते आदि पर 2015-16 में करीब 1.77 अरब रुपए खर्च हुए थे। सवाल उठता है कि क्या हमारे सांसदों की संपत्ति और सुख सुविधा क्या मात्र जनता की तथाकथित सेवा में ही दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ जाती है?

एक दुखद पहलू यह भी है कि 1954 में सांसदों के वेतन और भत्तों के लिए जो कानून बना उसमें 2018 तक 39 संशोधन हो चुके हैं लेकिन इसकी वैधानिकता की कभी समीक्षा नहीं की गयी। आम आदमी की समस्याओंं और जनकल्याण से जुड़े मामले पर विभिन्न राजनीतिक दलों में भले एक राय न बनती हो ,परन्तु वेतन-भत्ते-सुविधाओं का एक ऐसा विषय है जिस पर सारे दल एक सुर में बोलते हैं। इससे गन्दा मजाक लोकतंत्र के साथ और क्या हो सकता है?
नाना जी देशमुख मानते थे कि साठ के दशक में भारत सरकार ने प्रीवी पर्स को औचित्यहीन मानते हुए बंद कर दिया था। आज सांसदों, पूर्व सांसदों,पूर्व प्रधाममंत्री,पूर्व राष्ट्रपति,पूर्व उपराष्ट्रपति को मिलने वाली सुख सुविधा भत्ते प्रीवी पर्स का नया अवतार है।

इस संदर्भ में सुझाव है कि सांसदों को पेंशन नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि राजनीति कोई नौकरी या रोजगार नहीं बल्कि निशुल्क सेवा है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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