महात्मा गांधी की अस्थियों का ये राज, जानकर हो जाएंगे हैरान

इसी तरह महात्मा गांधी की कुछ अस्थियों का विसर्जन प्रमुख तीर्थों में किया गया था। प्रयागराज संगम में बहुत विशाल आयोजन किया गया था जिसमें लाखों लोगों की मौजूदगी में यह विसर्जन हुआ था जिसमें स्वयं जवाहर लाल नेहरू भी उपस्थित रहे थे।

गांधी की अंतिम यात्रा

रामकृष्ण वाजपेयी

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर को और शहीद दिवस 30 जनवरी को पूरे विश्व में मनाया जाता है। यह तो आपको पता ही होगा लेकिन क्या आपको पता है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के न रहने पर उनकी अस्थियों का क्या हुआ। क्या राष्ट्रपिता की सारी अस्थियां विसर्जित कर दी गई थीं या उनकी अस्थियां आज भी मौजूद हैं।

आम तौर पर किसी व्यक्ति का निधन होने पर उसकी अस्थियां नदी, सरोवर, गंगा या संगम में प्रवाहित कर दी जाती हैं। कोई भी उस व्यक्ति की अस्थियां नहीं रखता है। लेकिन महात्मा गांधी इतने विराट व्यक्तित्व थे कि उनकी अस्थियां आज भी संरक्षित रूप से रखी हुई हैं और गाहे ब गाहे ये खबरें भी आती रहती हैं कि उनकी अस्थियों का कलश मिला है। जैसे कुछ समय पहले दक्षिण अफ्रीका में एक व्यक्ति के पास गांधी जी का अस्थिकलश रखा था। बाद में 2010 में इन अस्थियों का विसर्जन किया गया। इसी तरह गुजरात में स्टेट बैंक में एक लाकर में गांधी जी की अस्थियां होने की बात सामने आयी थीं बाद में काफी लिखा पढ़ी करने के बाद इस लाकर से अस्थियां निकालकर इनका विसर्जन हुआ।

गांधी के अस्थि कलश

अभी भी पूरे देश में गांधी स्मृतियों में गांधी जी के अस्थिकलश रखे हुए हैं। जहां लोग अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं ये अस्थि कलश आज भी गांधी जी की मौजूदगी का अहसास कराते रहते हैं।

इसी तरह महात्मा गांधी की कुछ अस्थियों का विसर्जन प्रमुख तीर्थों में किया गया था। प्रयागराज संगम में बहुत विशाल आयोजन किया गया था जिसमें लाखों लोगों की मौजूदगी में यह विसर्जन हुआ था जिसमें स्वयं जवाहर लाल नेहरू भी उपस्थित रहे थे।

लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रमुख तीर्थों में गांधी जी की अस्थियों का यह विसर्जन एक साथ एक ही दिन हुआ था। और वह तारीख थी 12 फरवरी। गांधी जी की अंतिम विदाई की यह तारीख आज भी अपना महत्व रखती है।

ग्वालियर के श्योपुर के रामेश्वर त्रिवेणी संगम तट पर प्रतिवर्ष 12 फरवरी को गांधीवादी एकत्रित होते हैं और बापू को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। इस आयोजन को बापू स्मृति दिवस का नाम दिया गया है। बापू की अस्थियां 12 फरवरी 1948 को रामेश्वर त्रिवेणी संग में भी विसर्जित की गई थीं और तभी से अनवरत रूप से यहां हर वर्ष गांधीवाद नेताओं व उनके अनुयायियों का इकट्ठा होते हैं।