अनबूझी प्रहेलिका हैं सोनिया

जार्ज के आक्रोशित उद्गार थे : “मुझे लगता है कि इसे किसी गुलाम की औलाद ने लगाया है| कोई सभ्य आदमी ऐसा कतई नहीं करता| किस आधार पर लगा दी है? क्या देश क्या इन लोगों ने खरीदा है ? नेहरू खानदान ! लूटपाट वाला खानदान ?” इसपर रिपोर्टर ने पूछा– “सोनिया की फोटो को क्या हटवाना चाहिए?”

के. विक्रम राव

एक शीर्ष-स्तरीय शासकीय जांच, ढाई दशक पुरानी, अभी तक पूरी नहीं हुई| प्रकरण है कि सोनिया गाँधी क्या हैं ? प्रधान मंत्री पर सवासेर हैं अथवा राष्ट्रपति के समकक्ष हैं? मसला मोदी राज के पहले का है | भविष्य में फिर उठ सकता है, अगर सोनिया-कांग्रेस सत्ता पर लौट आई तो| यदि आज की पचहत्तर-वर्षीया सोनिया गाँधी चार साल बाद के चुनाव में प्रधान मंत्री बन गईं तब?

अम्बेडकर की फोटो की जगह सोनिया

इस कयास की शुरुआत हुई थी 15 अक्तूबर 2004 में| दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब (विट्ठलभाई भवन से लगा हुआ) के स्पीकर्स सभागार में उसी दिन पड़ोसी बर्मा में लोकतंत्र की स्थापना हेतु वैश्विक परिचर्चा हो रही थी| मंच पर सांसद और पूर्व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नान्डिस भी बैठे थे| उनकी नजर पड़ी सामने की दीवार पर टंगी फोटो पर| प्रथम थी संविधान सभा के अध्यक्ष और बाद में राष्ट्रपति चुने गए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की| उनसे लगी फोटो थी संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गाँधी की| सर्वविदित था कि पहले यहाँ सात-सदस्यीय संविधान निर्मात्री समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर की फोटो लगी थी| हटा दी गयी |

जार्ज की नाराजगी

सवाल मुंह बा रहा था कि अम्बेडकर की फोटो भेजी कहाँ गई ? पता लगा की भीतर कि दीवार पर टांगी गई है| जार्ज को यह बात अखरी| नागवार गुजरी| उसी की श्रमिक बोली में, मानो हलवाहे की मेहनत से लहलहायी फसल को भूस्वामी झपट ले| नियमानुसार हॉल की दीवार पर फोटो उसी राष्ट्रपुरुष की स्पीकर्स लगनी थी, जिन्होंने गणतंत्र का संविधान बनाया था|

जब भारत की संविधान सभा विचार यज्ञ में व्यस्त थी (1948) तो उस कालखण्ड में सोनिया मायनो सवा दो साल की थीं| (9 दिसम्बर 1946 की पैदाइश है)| तब अपने पुराने गाँव विसेंजा (वेनेतो प्रदेश, इटली) में गुड़ियों से वह खेल रही होंगी या कंचों से गुच्चुक के निकट| इतालवी अल्फ़ाबेता (ककहरा) तो आता ही नहीं होगा|

पिता स्टीफानो मायनों तब फासिस्ट नेता बेनिटो मुसोलिनी की सेना में सिपाही बनकर एडोल्फ हिटलर की नाजी सेना के साथ स्टानिग्राड पर हमले करने गए थे| पकडे गए और पांच वर्ष सोवियत जेल में बिताये| पिता की पुचकार पाये बिना ही बच्ची बड़ी हुई| अम्बेडकर की छवि को हटाकर ऐसे व्यक्ति की फोटो से दीवाल सुशोभित की गई|

 

और उतर गई सोनिया की फोटो

सम्मेलन खत्म होते जार्ज के कामरेडजन ने सोनिया की फोटो उतारकर टेबल पर डाल दी| अधिकारियों से शिकायत भी की गई| सवाल था : “संप्रग की अध्यक्ष किन अर्हताओं के कारण स्पीकर्स हॉल की दीवार पर प्रथम राष्ट्रपति के पास जगह पा गयीं (अथवा हथिया ली) ? पंद्रह सौ किलोमीटर दूर कोलकाता में अपने घर पर आराम फरमा रहे अस्सी साल के स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने फ़ोन पर कहा कि वे जांच करवाएंगे कि अम्बेडकर की फोटो कैसे हटी ? सोनिया गाँधी की फोटो किसने लगायी ? इस मार्क्सवादी कम्युनिस्ट सांसद के पिता निर्मलचन्द्र चटर्जी (जो हिन्दू महासभा के संस्थापक अध्यक्ष थे) का भी संविधान में योगदान रहा था|

वाजिब था आक्रोश

जार्ज का आक्रोश वाजिब था| वे बोले कि संवेदनहीनता की इंतिहा हो गई| असल बात तो यह है कि विगत सोलह सालों में लोकसभा के चार स्पीकर आये| माकपा के सोमनाथ, जिन्हें सोनिया गाँधी की अनुकम्पा से नामित किया गया था, को मिलाकर| मगर संवैधानिक शुद्धता के चहेते आक्रोशित पार्टी महासचिव प्रकाश करात ने सोमनाथ चटर्जी को माकपा की विश्वसनीयता घटाने के अपराध में निष्कासित कर दिया|

तब बाबू जगजीवन राम की पुत्री चौंसठ वर्षीया मीरा कुमार अध्यक्ष (3 जून 2009) नामित हुईं| उनके बाद 2014 में भाजपा की इंदौर से सांसद सुमित्रा महाजन बनीं| फिर आये कोटा के भाजपायी ओम बिड़ला जी| पर किसी ने भी आज तक फैसला नहीं दिया कि संविधान निर्मात्री समिति के सभापति के लिए आवंटित जगह पर विदेश में जन्मीं सोनिया मायनो गाँधी की फोटो कब, कैसे, किसके निर्णय पर टांगी गई थी? उस पूरे दौर में (2004 से 2014 तक) सोनिया की जी हुजुरी करने वाले सरदार मनमोहन सिंह प्रधान मंत्री थे|

संजय बारू ने सोनिया कांग्रेस का मुखौटा कहा

इन्हें उनके मीडिया सलाहकार और हम सबके पत्रकार साथी रहे संजय बारू ने सरदार जी को “सोनिया-कांग्रेस का मुखौटा” कहा था| (एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर, पेंगुइन वाईकिंग प्रकाशन, 2014, पृष्ठ 891)| यही विशेषण राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विचारक के. एन. गोविन्दाचार्य ने भाजपायी प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लिए प्रयोग किया था| कारण था कि नेहरू-प्रशंसक अटल जी इस प्रथम कांग्रेसी प्रधान मंत्री की फोटोकॉपी माने जाते थे|

अटल जी ने नजरअंदाज की ये बातें

इसी सन्दर्भ में उल्लेख हो जाए अटल जी द्वारा लोकसभा में बड़े प्रभावी तरीके से वर्णित घटना का| जब वे विदेश मंत्री बने थे तो साऊथ ब्लाक के कार्यालय में प्रथम विदेश मंत्री रहे जवाहरलाल नेहरू की तस्वीर हटा दी गई थी| सियासी फेरबदल का नतीजा था| अटल जी के पूछने के कुछ ही घंटों बाद मानो अपने आप नेहरू की फोटो लौट आई| अर्थात अपनी अनावश्यक उदारता की झोंक में अटल जी नजरंदाज कर गए कि नेहरू ने पटेल की, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की, आचार्य कृपलानी की, डॉ. लोहिया की, जयप्रकाश नारायण की तथा इतिहास में अपने अन्य प्रतिस्पर्धी साथियों की यादें मिटाने की निरंतर साजिश की थी|

सवाल मोदी से

तो सवाल नरेंद्र दामोदर दास मोदी से है| यह सोलह साल पुरानी जांच अपने तार्किक निष्कर्ष पर कभी तो पहुंचायी जाए? मुद्दा है कि सोनिया गाँधी शासकीय पटल पर क्या हैं ? विपक्षी पार्टी की साधारण सांसद हैं ? वयस्क बेटा-बेटी की माताश्री हैं ? अभियुक्त जामाता की श्वश्रू हैं ? या भावी सुपर प्रधानमंत्री ?

सभा के अंत में भली हरकत हुई| जब जार्ज और उनके साथियों से रहा नहीं गया| आखिरकार मौका मिलते ही उन्होंने सोनिया की तस्वीर को उतार कर ही दम लिया| जार्ज के आक्रोशित उद्गार थे : “मुझे लगता है कि इसे किसी गुलाम की औलाद ने लगाया है| कोई सभ्य आदमी ऐसा कतई नहीं करता| किस आधार पर लगा दी है? क्या देश क्या इन लोगों ने खरीदा है ? नेहरू खानदान ! लूटपाट वाला खानदान ?” इसपर रिपोर्टर ने पूछा– “सोनिया की फोटो को क्या हटवाना चाहिए?”

जार्ज – “बिल्कुल हटवाना चाहिए| काहे के लिए (लगाया गया है) ? कैसे ? कौन से आधार पर ? गोरी हैं इसलिए?”

K. Vikram Rao
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