चीन की बौखलाहट का कारण

इसलिए इस तरह के हरकतों से वह मनोवैज्ञानिक तरीके से भारत पर दबाव डालना चाहता है । लेकिन चीन को अब यह समझ लेना होगा कि 1962 से अब तक चीन के पीली नदी व भारत के गंगा नदी में काफी पानी बह चुका है । अब 2020 है । वर्तमान का भारत 2020 का भारत है 1962 का भारत नहीं है ।

डा. समन्वय नंद

भारत व चीन के बीच लदाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा  पर तनाव की स्थिति है । चीन न लदाख की सीमा पर अपनी सैनिकों की संख्या बढा कर स्थिति को तनावपूर्ण कर दिया है । भारत ने भी चीन को उसी  के भाषा में जवाब देने का निर्णय किया  है। वर्तमान की घटना कुछ साल पूर्व की डोकलाम की घटना की याद दिलाती है जब भारत व चीन की सेनाएं आमने सामने थी। केवल इतनी ही नहीं  चीन ने नेपाल में उनके समर्थक माओवादी पार्टी के सरकार द्वारा  सीमा को लेकर विवाद तैयार करने का भी प्रयास किया।  लेकिन प्रश्न यह है कि चीन ऐसा क्यों कर रहा है।

इतिहास क्या कहता है

चीन के वर्तमान के इस व्यवहार के बारे में जानने के लिए हमें इतिहास में जाना पडेगा  । उस दौर में जाना होगा जब भारत सरकार चीन सरकार के साथ पंचशील संधि  पर हस्ताक्षर किये जाने को लेकर खुशियां मना रही थी  और भारत में चीन समर्थक कम्युनिस्ट  लाबी हिन्दी – चिनी भाई – भाई के नारों के साथ झूम रही थी  ।

इस संधि के  बाद चीन भारत पर हमला करने की योजना बनाता रहा और इधर भारत के तत्कालीन नेतृत्व चीन को अपना  मित्र समझता रहा  । चीन ने अपना वास्तविक रुप दिखा दिया । 1962 में उसने भारत पर हमला कर दिया ।

अभी भी भारत की हजारों हैक्टयर भूमि चीन के कब्जे में है। 14 नवंबर 1962 को भारत की संसद ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया कि  भारत की एक एक इंच की जमीन जो चीन के कब्जे में है उसे वापस न लेने तक चैन से नहीं बैठेंगे ।  यह तो था  भारतीय संसद के संकल्प की बात लेकिन इस युद्ध में भारत की पराजय ने भारत के मन में एक भय की मानसिकता बैठा दी ।

मनोवैज्ञानिक प्रभाव

इसके बाद से ही यानी 1962 से ही चीन भारत की सीमा तक सडकों व अन्य  अव संरचना का निर्माण का काम तेजी से शुरु किया । भारत ने अपने सीमावर्ती इलाकों में सडकें- पुल व संचार व्यवस्था के साथ साथ  अन्य अवसंरचनाओं का विकास नहीं किया और चीन से काफी हद तक पिछडा रहा।

इसके कई कारण हो सकते हैं । एक कारण हो सकता है कि 1962 के हार का भारत सरकार पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव । दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि देश के तंत्र में बैठे चीन समर्थक कम्युनिस्ट लाबी का प्रभाव  जो यह कतई नहीं चाहता कि भारत चीन का मुकबला करने की दिशा में कदम उठाये ।

2914 के भारत ने गति पकड़ी

लेकिन धीरे धीरे स्थितियां बदलीं व भारत ने अपने उत्तरी सीमांत पर सडक, पुल के साथ साथ अन्य अव संरचनाओं के निर्माण पर जोर दिया । खास कर 2014 में नयी सरकार बनने के बाद इन मार्गों को विकसित करने का काम तेजी से हुआ । एक उदाहरण के जरिये इस बात को ठीक ढंग से  समझा जा सकता है ।

1997 में भारत सरकार द्वारा गठित चाइना स्टडी  ग्रुप द्वारा भारत –चीन के वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास 4643 किमी के सडक निर्माण करने का प्रस्ताव दिया गया था  । इन सडकों को इंडिया चाइना बोर्डर रोड (आईसीबीआर) कहा गया तथा इनके इस रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सडकों के निर्माण का मूल उद्देश्य एलएसी के पास भारतीय सैनिकों की आबाजाही को सुगम बनाना था ।

इसके बाद वाजपेयी की नेतृत्व वाली  सरकार में 1999 में भारत – चीन सीमा पर रणनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण 61 सडकों (लगभग 3346 किमी) के सडकों का निर्माण करने को कैविनेट कमेटी आन सिक्युरिटी द्वारा मंजूरी दी गई थी । इनका काम बोर्डर रोड आर्गनाइजेसन (बीआरओ) को दिया गया व शेष 12 सडकों का निर्माण का काम अन्य एजेंसियों को दी गई।

समय सीमा बढ़ती गई

बीआरओ को दी गई इन परियोजनाओं  को पूरा करने के लिए पहले 2003 की समय सीमा रखी गई थी । लेकिन काम पूरा न होने के कारण इसे बढा कर 2006 व बाद में 2012 तक समयसीमा को बढाया गया । लेकिन इसके बाद भी रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इन सडक परियोजनाओं का काम पूरा नहीं किया जा सका ।

2014 में नयी सरकार बनने के बाद सालों से लंबित परियोजनाओं को न केवल तेजी से पूरा करने के लिए निर्णय लिया गया बल्कि रणनीतिक दृष्टि  से महत्वपूर्ण और परियोजनाओं को भी हाथ में लिया गया । इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक धनराशि मुहैया करायी गई और प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा इन परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की जाती रही ।

इसका परिणाम यह हुआ है भारत भी अपनी सीमा पर सडक व अन्य अव संरचनाओं के विकास में चीन से पीछे नहीं रहा ।   इसके अलावा अन्य परियोजनाओं पर भी काफी तेजी से कार्य हो रहा है ।  चीन की बौखलाहट का यह एक प्रमुख कारण है । चीन नहीं चाहता कि भारत उसकी बराबरी करे व भारत की वास्तविक नियंत्रण रेखा के इस पार सडक व अन्य अव संरचनाओं का विकास करे ।

कारण और भी हैं

चीन के बौखलाहट का और एक कारण भी है । पाक अधिक्रांत कश्मीर (गिलगित) होते हुए चीन बलूचिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक चीन पाकिस्तान इकोनामिक कारिडर की निर्माण कर रहा है । इसमें चीन भारी मात्रा में पूंजी निवेश कर रहा है ।

इधर मोदी सरकार ने अपना प्रवल इच्छा शक्ति का परिचय देते हुए जम्मू कश्मीर से धारा -370 को हटा दिया है। इससे चीन विचलित है । अब भारत ने आधिकारिक रुप से गिलगित व बाल्तिस्तान  के लिए मौसम की सूचना भी देने लगा है ।

चीन के मन में यह भय है कि आगामी दिनों में भारत पाक अधिक्रांत कश्मीर के गिलगित व बाल्तिस्तान को पुनः प्राप्त कर सकता है (जिसकी संभावना है) । ऐसा होने पर इस कारिडर में चीन द्वारा किये गये पूंजीनिवेश से उसे काफी नुकसान हो सकता है । यह भय चीन के मन हैं । चीन के बौखलाहट का यह भी एक कारण है ।

चीन समर्थक लाबी अब भी भारत में सक्रिय  हैं और चीन की पैरबी कर रहे हैं । चीन वर्तमान में यह सोच रहा है कि आज भी 1962 का माहौल है ।

इसलिए इस तरह के हरकतों से वह मनोवैज्ञानिक तरीके से भारत पर दबाव डालना चाहता है । लेकिन चीन को अब यह समझ लेना होगा कि 1962 से अब तक चीन के पीली नदी व भारत के गंगा नदी में काफी पानी बह चुका है । अब 2020 है । वर्तमान का भारत 2020 का भारत है 1962 का भारत नहीं है ।

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