कोरोना के मुकाबले को वक्त है मौलिक कर्तव्यों के निर्वहन का

आज जब पूरी दुनिया सहित हमारा देश कोरोना के संकट की चपेट में है, सरकारें कई तरह के उपाय करने को कह रही है, तब मौलिक कर्तव्य की बात करना और ज़रूरी हो जाता है। जिस महामारी से निपटने की कोई दवा दुनिया के किसी देश में नहीं है।

योगेश मिश्र

वर्ष १९७५ में ४२वें संविधान संशोधन के द्वारा नागरिकों के मूल कर्तव्यों का एक नया अनुच्छेद ५१ (क) संविधान में समाहित किया गया। आज जब पूरी दुनिया सहित हमारा देश कोरोना के संकट की चपेट में है, सरकारें कई तरह के उपाय करने को कह रही है, तब मौलिक कर्तव्य की बात करना और ज़रूरी हो जाता है। जिस महामारी से निपटने की कोई दवा दुनिया के किसी देश में नहीं है। जिस महामारी के बारे में दुनिया के हर विकसित देश में शोध निरंतर जारी है। जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था को दस खरब डॉलर यानी ७४ लाख करोड़ की चपत लगाई हो।

वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन की भागीदारी १९ फ़ीसद है। दवाओं के कच्चे माल की आपूर्ति चीन से भारत को होती है। एक ऐसी बीमारी जिसकी भयावहता के चलते उसके टीके और दवाओं का मनुष्य पर सीधा परीक्षण हो रहा हो। यह दुनिया में पहली बार हो रहा है कि दवाओं का अनुमंडल ट्रायल नहीं हो रहा है।

ऐसे में इस बीमारी के बारे में सही ढंग से और डाक्टरों तथा शोधार्थियों के नज़रिये से समझने की ज़रूरत है। नहीं तो सोशल मीडिया पर पसरी नसीहतें भय और परेशानी को और बढ़ाती रहेंगी।

द लासेंट जर्नल के मुताबिक़ जो लोग उम्रदराज़ है, हाईब्लड प्रेशर एवं डायबिटीज़ के रोगी हैं, कोरोना से उनकी जान को ख़तरा ज़्यादा है। इनके अलावा जिनको साँस की दिक़्क़त है, जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है वे भी कोरोना के सॉफ़्ट टारगेट हैं। ज़्यादा धूम्रपान करने वालों को भी कोरोना से बचना चाहिए क्योंकि धूम्रपान के कारण साँस संबंधी संक्रमण का ख़तरा ज़्यादा होता है।

सभी महाद्वीपों में संक्रमण

अंटार्कटिका को छोड़ दिया जाये तो कोरोना का संक्रमण सभी महाद्वीपों में हो चुका है। १६८ देश कोरोना के संक्रमण के शिकार हैं। इससे पहलें सार्स, बर्ड फ़्लू, स्वाइन फ़्लू, इबोला तथा जीवा वाइरस की वजह से मानव जाति को मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

कोरोना के चलते स्थिति आज और गंभीर है। चीन, अमेरिका जैसे देश विवश नज़र आ रहे हैं। इसके अलावा इटली, ईरान, दक्षिण कोरिया भी हलकान है। भारत में भी सोशल डिस्टेंसिंग का फ़ार्मूला अपनाया जा रहा है।

दिसंबर में डाक्टर ली ने आगाह किया था

चीन के डाक्टर ली. वेनलियांन्ग ने ३० दिसंबर २०१९ को अपने डॉक्टरों के ग्रुप पर संदेश डाल कर इस वायरस के संभावित ख़तरे की बात कही। इससे बचाव के लिए करने की बात कही। कहा कि ख़ास क़िस्म के हिफ़ाज़ती कपड़े पहने जायें। पर चीन के अधिकारियों ने डॉ.ली पर ग़लत जानकारी देने का आरोप लगाते हुए उनसे कुछ ऐसे काग़ज़ों पर दस्तखत कराये जिसमें डॉ. ली. ने गुनाह क़ुबूला हो। ली समेत ८ लोगों के खिलाफ अफ़वाह फैलाने की जाँच होने लगी। इन सब ने चीन के सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म वीबो पर जनवरी २०२० में यह पोस्ट डाल दी।

जनवरी के दूसरे सप्ताह में वुहान के अफ़सरों की ओर से सफ़ाई आई कि जो लोग ऐसे जानवरों के संपर्क में थे, जिन्हें कोरोना था, वही कोरोना से संक्रमित पाये गये। लेकिन चीन सरकार की पोल पट्टी तब खुली जब २० जनवरी,२०२० को कोरोना के कारण आपात स्थिति घोषित करनीं पड़ी ।

क्या कहते हैं डा. राजन शर्मा

आज कोरोना को लेकर नसीहतों की बाढ़ है। हर आदमी नीम हकीम है। सबके पास दुनिया के न जाने किस देश के किस लैबोरेटरी का रिसर्च पेपर है। सबसे सावधान रहिये।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के डॉ. राजन शर्मा बताते हैं कि बच्चों पर इसका असर नहीं है। नोएडा के स्कूल में पांच बच्चे क्रमित व्यक्ति के संपर्क में आये थे। पर उनका टेस्ट निगेटिव मिला। ५८ साल से अधिक उम्र के लोग इससे डरें। गाँव में इसके फैलने की आशंका कम है।

इन बातों का वास्तविकता से नहीं है रिश्ता

चिकन और अंडा खाने से कोरोना के संक्रमण का कोई रिश्ता नहीं है। लोग कह रहे हैं कि आइसक्रीम खाने या ठंडी चीजें कोरोना के लिए घातक हैं। कुछ जगहों पर कोरोना से निपटने के लिए ब्रूफेन या पैरासिटामाल को दवा बताया जा रहा है। ये दोनों दवाएँ बुख़ार कम करने और फ़्लू के लक्षणों से निपटने में कारगर हैं। पर कोरोना साधारण फ़्लू नहीं है।

यह ध्यान देने की बात है कि ब्रूफेन खाने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। इन दोनों दवाओं को लेकर कोई रिसर्च सामने नहीं आई है। कहा जा रहा है कि गर्मी में कोरोना वायरस से निजात मिल सकती है। पर यह सही नहीं है क्योंकि अध्ययन बताते हैं कि ७० डिग्री तापमान पर यह नष्ट होता है।

शोध बताते हैं कि कोरोना और एचआईवी वायरस दोनों का एक जैसा मालिक्यूलर स्ट्रेचर है। इसीलिए जयपुर के सवाई मान सिंह अस्पताल के डॉक्टरों ने एचआईवी  की एंटी ड्रग रिटोनावीर और लोपिनावीर देकर कोरोना का ट्रीटमेंट कर के नाम कमाया।

कोरोना की हकीकत

यह कहा जाता है कि हाथ मिलाने से संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाता है। पर अमेरिकन नेशनल इंस्टीट्यूट के अपने शोध पत्र में हक़ीक़त यह बताई गई है कि कोई भी संक्रमित व्यक्ति खाँसता या छींकता है। तो बेहद बारीक कण हवा में फैलते हैं।

एक बार में ३००० ड्रापलेट्स (सूक्ष्म कण) शरीर से बाहर आते हैं। जो नाक, कान और मुँह के रास्ते शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। थूकने या खाँसने से निकले वायरस आसपास गिर भी जाते हैं। जो आमतौर पर तीन चार घंटे तक जीवित रहते हैं।

धातुओं पर इनकी उम्र ४८ घंटे तक होती है। कोरोना वापस नरम सतह पर लंबे समय तक जीवित नहीं रहता। जहां छींक या खाँसने के बाद वायरस के सूक्ष्म कंण जहां गिरे होते हैं। उसको छूने के बाद यदि आपने हाथ नहीं धोया तो वे आपके हाथ के माध्यम से मुँह, नाक, कान आदि के माध्यम से शरीर के दूसरे के अंगों में पहुँच जाते हैं।

इसलिए जरूरी है कर्तव्य पालन

जिस देश में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जीडीपी का एक अनिवार्य हिस्से का निवेश ज़रूरी है। पर देश करने की स्थिति में नहीं है। जहां दिल से संबंधित बीमारियों के चलते २४ लाख लोग मर जाते हों। केवल एक लाख लोगों के दिल का आपरेशन हो पाता हो पाता है। वहाँ कोरोना जैसी महामारी से निपटने के लिए हमें अपने नागरिक कर्तव्य पर ज़्यादा ज़ोर देना होगा, क्योंकि हमारे संविधान में दर्ज हम भारत के लोग बताता है कि यह हमारे लिए निर्मित और हमें ही आत्मार्पित भी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)